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वास्तु विज्ञान का रहस्य और भ्रम

वास्तु विज्ञान का रहस्य और भ्रम वास्तु विज्ञान का रहस्य और भ्रम

आजकल परम्परागत भारतीय वास्तु विद्या की धूम आयुर्वेद की तरह मची हुई है। लोग रहस्यमय कौतुहल के साथ इसे जानना-समझना चाहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते है कि क्या सचमुच इसका प्रभाव जीवन पर पड़ता है? पड़ता है, तो क्यों? इसका वैज्ञानिक आधार क्या है? यहाँ हम इन्ही प्रश्नों एवं रहस्यों का उत्तर दे रहे है;जो अब तक वास्तु विद्या के सम्बन्ध में विश्व में कहीं भी, किसी भी भाषा में उपलब्ध नहीं है।
भारतीय वास्तु विज्ञान को भवन और बाग़ निर्माण की कला मानने वाले लोग मुर्ख हैं। यह भवन निर्माण की कला नहीं है। यह भारतीय तत्व विज्ञान का पदार्थ-विज्ञान है यानी भौतिकी। हम यहाँ यह भी बताना चाहेंगे कि इस विद्या की अलग से कोई प्राचीन पुस्तक उपलब्ध नहीं है। यह संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों में से भवन –निर्माण के सूत्रों को लेकर वास्तु विद्या के नाम से कुछ लोगों द्वारा सामने लायी गयी । भिन्न-भिन्न ग्रंथों में इसके विवरण मिलते है।
पर गलती यह हुई कि इसे भवन निर्माण से जोड़ दिया गया, जबकि यह पदार्थ विज्ञान है। जरा इसकी उत्पत्ति की रूपक कथा पर ध्यान दीजिये। शिव से ही प्रकट अन्धक शिव से ही युद्ध करने लगा, तो इसके पसीने से एक असुर की उत्पत्ति हुई, जो अत्यंत बल शाली था। शिव ने उसे उल्टा फेंक दिया और उनके वरदान से वह त्रिभुवन में व्याप्त हो गया, उसी उल्टे क्रम में। यही वास्तु पुरुष के नाम से जाना जाता है; जो केवल बनाने के प्लाटों में, पृथ्वी में ही नहीं , त्रिभुवन में व्याप्त है यानी ब्रह्माण्ड में और प्रत्येक पदार्थ की इकाई में।
लेकिन यह है क्या? क्या ऐसे किसी पुरुष देवता का अस्तित्त्व सचमुच इनमें है?
हम पहले ही कह आये हैं कि यह रूपक है और हमारी परम्परा रही है कि ब्रह्माण्ड की तमाम ऊर्जात्मक शक्तियों को हमने भाव रूप देकर एक देवता या देवी के रूप में ही व्यक्त किया है।
इसे समझने के लिए प्रयोग शाला में एक 6” का एक आधा इंच चौड़ा चुम्बक बार लीजिये। इसे टेबल पर रखकर चारों ओर समान टेक देकर इसके ऊपर एक पतला शीशा डाल दीजिये। इस पर लोहे का महीन बुरादा छिड़क कर टेबल को धीरे-धीरे ठोकिये। ये कण एक आकृति बनायेंगे। इस आकृति को देखिये और वास्तु पुरुष के हाथ-पाँव सिर की स्थिति मध्य का भाग देखिये। पता चल जाएगा कि यह वास्तव में क्या है। यह वह चुम्बकीय बल है, जो इस भौतिक जगत के कण-कण में , पृथ्वी में, सूर्य में, तारों में, सौर मंडल में, ब्रह्माण्ड में, यहाँ तक कि यह परमाणुओं में और ‘आत्मा’ नामक सुपर एटम में भी विद्यमान है।
जब हम अपनी एक और पौराणिक कथा पर ध्यान देंगे, तो यह और स्पष्ट होगा। जब धरती पानी में डूबती जा रही थी, तो विष्णु ने मत्स्यावतार का रूप धारण करके उसे बचाया। ये चुम्बकीय रेखायें, सूंढ़-पूँछ वाली एक मछली की ही आकृति बनाती है और किसी पौधे या वृक्ष को देखिये, तो उसमें भी यह मछली नजर आएगी। इसका बल बड़ी इकाई के अंदर की ओर उल्टा होता है; और यहाँ यह स्पष्ट नजर आएगा।
जब हम 6” के बार को दो टुकड़ों में विभक्त कर देते है, तो उनमें अलग-अलग यह मछली बन जाती है। इसी प्रकार पृथ्वी के भूखंडों को हम जितने भाग में ढाई हाथ की गहराई में काटते हैं; वहाँ यह वास्तु बली पुरुष सम्पूर्ण रूप में अवतरित हो जाता है।
यह तो एक विज्ञान सम्मत निष्कर्ष है कि इस चुम्बकीय क्षेत्र का तमाम स्थान एक जैसे ऊर्जा-बल से युक्त नहीं होता।हर जगह बल की स्थिति अलग होती है और वहाँ का प्रभाव भी अलग होता है। इन्ही बलों और भौगोलिक स्थितियों की आनुपातिक गणना पर भूमि में देवी-देवताओं की स्थिति को माना गया है। पर ये सभी पदार्थों में ऐसे ही व्याप्त होते है।
आजकल एक परिपाटी चल रही है कि न समझ में आये, तो समझने का प्रयास न करो, अपितु उसे आस्था और अंधी आस्था का विषय मानकर उपेक्षित कर दो।

आजकल परम्परागत भारतीय वास्तु विद्या की धूम आयुर्वेद की तरह मची हुई है। लोग रहस्यमय कौतुहल के साथ इसे जानना-समझना चाहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते है कि क्या सचमुच इसका प्रभाव जीवन पर पड़ता है? पड़ता है, तो क्यों? इसका वैज्ञानिक आधार क्या है? यहाँ हम इन्ही प्रश्नों एवं रहस्यों का उत्तर दे रहे है;जो अब तक वास्तु विद्या के सम्बन्ध में विश्व में कहीं भी, किसी भी भाषा में उपलब्ध नहीं है।
भारतीय वास्तु विज्ञान को भवन और बाग़ निर्माण की कला मानने वाले लोग मुर्ख हैं। यह भवन निर्माण की कला नहीं है। यह भारतीय तत्व विज्ञान का पदार्थ-विज्ञान है यानी भौतिकी। हम यहाँ यह भी बताना चाहेंगे कि इस विद्या की अलग से कोई प्राचीन पुस्तक उपलब्ध नहीं है। यह संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों में से भवन –निर्माण के सूत्रों को लेकर वास्तु विद्या के नाम से कुछ लोगों द्वारा सामने लायी गयी । भिन्न-भिन्न ग्रंथों में इसके विवरण मिलते है।
पर गलती यह हुई कि इसे भवन निर्माण से जोड़ दिया गया, जबकि यह पदार्थ विज्ञान है। जरा इसकी उत्पत्ति की रूपक कथा पर ध्यान दीजिये। शिव से ही प्रकट अन्धक शिव से ही युद्ध करने लगा, तो इसके पसीने से एक असुर की उत्पत्ति हुई, जो अत्यंत बल शाली था। शिव ने उसे उल्टा फेंक दिया और उनके वरदान से वह त्रिभुवन में व्याप्त हो गया, उसी उल्टे क्रम में। यही वास्तु पुरुष के नाम से जाना जाता है; जो केवल बनाने के प्लाटों में, पृथ्वी में ही नहीं , त्रिभुवन में व्याप्त है यानी ब्रह्माण्ड में और प्रत्येक पदार्थ की इकाई में।
लेकिन यह है क्या? क्या ऐसे किसी पुरुष देवता का अस्तित्त्व सचमुच इनमें है?
हम पहले ही कह आये हैं कि यह रूपक है और हमारी परम्परा रही है कि ब्रह्माण्ड की तमाम ऊर्जात्मक शक्तियों को हमने भाव रूप देकर एक देवता या देवी के रूप में ही व्यक्त किया है।
इसे समझने के लिए प्रयोग शाला में एक 6” का एक आधा इंच चौड़ा चुम्बक बार लीजिये। इसे टेबल पर रखकर चारों ओर समान टेक देकर इसके ऊपर एक पतला शीशा डाल दीजिये। इस पर लोहे का महीन बुरादा छिड़क कर टेबल को धीरे-धीरे ठोकिये। ये कण एक आकृति बनायेंगे। इस आकृति को देखिये और वास्तु पुरुष के हाथ-पाँव सिर की स्थिति मध्य का भाग देखिये। पता चल जाएगा कि यह वास्तव में क्या है। यह वह चुम्बकीय बल है, जो इस भौतिक जगत के कण-कण में , पृथ्वी में, सूर्य में, तारों में, सौर मंडल में, ब्रह्माण्ड में, यहाँ तक कि यह परमाणुओं में और ‘आत्मा’ नामक सुपर एटम में भी विद्यमान है।
जब हम अपनी एक और पौराणिक कथा पर ध्यान देंगे, तो यह और स्पष्ट होगा। जब धरती पानी में डूबती जा रही थी, तो विष्णु ने मत्स्यावतार का रूप धारण करके उसे बचाया। ये चुम्बकीय रेखायें, सूंढ़-पूँछ वाली एक मछली की ही आकृति बनाती है और किसी पौधे या वृक्ष को देखिये, तो उसमें भी यह मछली नजर आएगी। इसका बल बड़ी इकाई के अंदर की ओर उल्टा होता है; और यहाँ यह स्पष्ट नजर आएगा।
जब हम 6” के बार को दो टुकड़ों में विभक्त कर देते है, तो उनमें अलग-अलग यह मछली बन जाती है। इसी प्रकार पृथ्वी के भूखंडों को हम जितने भाग में ढाई हाथ की गहराई में काटते हैं; वहाँ यह वास्तु बली पुरुष सम्पूर्ण रूप में अवतरित हो जाता है।
यह तो एक विज्ञान सम्मत निष्कर्ष है कि इस चुम्बकीय क्षेत्र का तमाम स्थान एक जैसे ऊर्जा-बल से युक्त नहीं होता।हर जगह बल की स्थिति अलग होती है और वहाँ का प्रभाव भी अलग होता है। इन्ही बलों और भौगोलिक स्थितियों की आनुपातिक गणना पर भूमि में देवी-देवताओं की स्थिति को माना गया है। पर ये सभी पदार्थों में ऐसे ही व्याप्त होते है।
आजकल एक परिपाटी चल रही है कि न समझ में आये, तो समझने का प्रयास न करो, अपितु उसे आस्था और अंधी आस्था का विषय मानकर उपेक्षित कर दो।

जटिल गणना का विषय है वास्तु शास्त्र

आजकल प्रत्येक प्राचीन विद्याओं के ज्ञाता मेंढक की तरह युग आये है। 40 साल पहले तक इनमें कोई नहीं था। किसी ने इस विद्या को सामने लाने का काम किया, तो लोगों को व्यवसायिक लाभ नजर आने लगा और अब तो हर पंडित हर व्यक्ति अपने को वास्तु शास्त्री कहने लगा है। किसी ने अखबारों की कटिंग जमा कर ली, कोई पुस्तकें खरीद लाया और बताने लगा कि दक्षिण दिशा में क्या होता है, उत्तर में क्या होता है, कहाँ बेडरूम होना चाहिए, कहाँ बाथरूम।

संशोधन के लिए उल्टे-सीधे उपाय बताकर व्यवसाय चमकाने लगे। पर यह इतनी सरल विद्या नहीं है। मैंने इसको गहराई से समझने का प्रयत्न किया है; क्योंकि अपनी प्रैक्टिस के दौरान मेरे सामने कुछ ऐसे मामले आये कि उन्होंने मुझे चौंकाने पर मजबूर कर दिया और जब ढूँढने लगा, तो आश्चर्यजनक कई रहस्य सामने आ गये। कहते है कि मस्तिष्क में शिव रहते है; यदि तलाश करने लगो, तो अनंत गहराइयों के रत्न भी प्राप्त हो जाते है। सबसे पहले मेरे सामने एक मामला जालन्धर का आया। एक व्यक्ति ने प्राधिकरण का मैप भेजा और एक प्लाट को खरीद लिए जाने पर उसका शुभाशुभ पुछा। मैंने उसे देखा और उससे पूछा कि यह मौत का आयत है।

इसे क्यों खरीद रहे हो? .. उसने कहा –“ अब तो खरीद लिया है। मेरे तीन मकान है, यह चौथा प्लाट है। तीनों मकानों की दिशा की स्थिति एक ही है।” – तब मैंने उसकी जन्म कुंडली बनाई और उसे देखकर चौंक पड़ा। उसकी कुंडली के अनुसार उसके लिए वे ही मकान शुभ थे। वह प्लाट भी। उन्होंने नक्शा बना ने के लिए कहा और जन्मकुंडली के अनुसार जो नक्शा बना; उससे वह व्यक्ति प्रसन्न हो गया। मैंने हिचकिचाते कहा –“ मैंने कुंडली गणना करते समय पाया है कि तुम्हारी पत्नी की मौत इसी उम्र के आस पास आग से जलकर हो जाएगी! सावधान रहना! मैंने उपाय भी बताया। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला- “ यह घटना घट चुकी है। पिछले  साल वह गैस लीकेज में जलकर मर गयी। मैं साली से विवाह करने की सोच रहा हूँ। इसके बाद मैंने जब अध्ययन करना शुरू किया तो ज्ञात हुआ कि वास्तु विद्या के प्रभाव की गणना में ज्योतिषीय गणना का महत्त्व सर्वाधिक है। सामान्य सूत्रों से काम नहीं चलता। इसको इस तरह समझिये कि एक स्थान पर आग जल रही है। यह ठण्ड में काँपते हुए के लिए उत्तम है, गर्मी से परेशान के लिए बहुत बुरा। मनुष्य के लिए उपयोगी है, बंदर के लिए सारे जंगल को जला देने वाला।

हम-आप जिस मकान में रहते है; वास्तु विद्या में वहाँ का एक ग्रह-मैप होता है। प्रत्येक स्थान, कमरे आदि की स्थिति का आकलन इस मैप के अनुसार होता है। प्रत्येक वस्तु एवं काम का भी ग्रह-वर्गीकरण है। अब यदि सारा नक्शा सही है; पर काम और वास्तु का स्थान विपरीत ग्रह है, तो परेशानियां बढेंगी, कम नहीं होगी। इसलिए यह भी आवश्यक है कि ग्रहों के स्थान के अनुसार वस्तुओं की सेटिंग और काम की सेटिंग हो। इस ज्योतिषीय गणना में भी एक और गणना जुड़ जाती है, सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति की गणना। इससे यह और जटिल हो जाती है। आजकल मकानों में आसमान नहीं होता। यह राहु दोष है। ऐसे ही जैसे खोपड़ी में चाँद गायब हो जाए। इससे प्रकृति का नैसर्गिक अमृत हमें प्राप्त नहीं होता। यह आयु और विचारों को प्रभावित करता है। इसे मकानों में कृत्रिम तौर पर उत्पन्न करने या लाने के लिए इसमें सूर्य और चन्द्रमा को स्थापित करना आवश्यक है, और इसके लिए स्थान मुकर्रर करना भी एक गणनात्मक विषय है।

यह सबके लिए अलग-अलग होता है। प्राचीन काल में छत बुध और शनि के होते थे,फर्श शुक्र के। छत पर पकी ईंटे, खपड़े, या घास होते थे, जो शनि है और बाँस या लकड़ी भी बुध-शनि ही होते थे। फर्श कच्ची हुआ करती थी। पर आज की छते रॉड की जाली पर बालू-सीमेंट से बनती है। यानी राहु-बुध और शनि। फर्श शुक्र की जगह श्स्नी-बुध की होती है। इन दोनों में बुध भी शनि के रूप में ढल जाता है। अब प्राचीन –सूत्रों के अनुसार इसका शुभाशुभ कैसे निकाल सकते है? इसलिए वर्त्तमान आधुनिक परिवर्त्तन भी गणना का एक फैक्टर बन जाता है। जल स्रोत ईशान में होना चाहिए, पर पानी टंकी ईशान में लगायेंगे, तो जिंदगी की गाड़ी ही आगे झुक कर रफ़्तार को दबा देगी। जन्मकुंडली का महत्त्व केवल प्लाट, मकान और वस्तु पर ही नहीं; दीवार और छत के रंगों, फर्श की डिज़ाइनिंग पर भी पड़ता है। आप जो कपडे पहनते हैं , जूते प्रयोग करते है, गाड़ी प्रयोग करते है, जिस बर्त्तन में खाना खाते है, जिससे पानी , चाय , दूध, कॉफ़ी पीते है। वे सभी आप पर प्रभाव डालते है। वास्तु विद्या में इंटीरियर डिज़ाइनिंग का भी प्रभाव है। अब यदि आप चाहते है कि अपने मकान का वास्तु दोष निवारण करें , तो आपको प्रत्येक क्षेत्र को देखना होगा। मोटे तौर पर किये गये उपाय भारी पड़ सकते है। नक्शा बनाना है, तो इन सबका ध्यान रखना होगा।

इस सम्बन्ध में विस्तृत तौर पर निम्नलिखित विषय विचारणीय होते है :-

 

विषय-सूची

  1. प्राचीन भारतीय वास्तुविज्ञान : एक परिचय
  2. वास्तु विद्या का शाश्वत विज्ञान
  3. वास्तु विद्या के सूत्र और नियम : आधुनिक व्याख्या के साथ
  4. देश, काल, प्रदेश, नगर एवं कस्बों का वास्तु
  5. अभिशापित देश, काल, नगर एवं कस्बे
  6. अभिशापित क्षेत्र के भयानक परिणाम
  7. अभिशापित क्षेत्र के दोष निदान
  8. भूमि वास्तु के वर्गीकृत नियम एवं सूत्र
  9. अभिशापित भूमि के वर्गीकृत रूप
  10. अभिशापित भूमि के परिणाम और दोष निदान

आवासीय

  1. आवासीय भवनों के प्रकार
  2. आवासीय भवनों के वास्तुसूत्र एवं नियम
  3. आवासीय भवनों पर जातक के भाग्य का प्रभाव
  4. जातक के भाग्य पर आवासीय वास्तु का प्रभाव
  5. ज्योतिषीय कुंडली का आवासीय भवन से सम्बन्ध
  6. भवन विन्यास के परिवर्त्तन से कुंडली के दोषों का निदान
  7. अभिशापित आवासीय भवनों के लक्षण

18.अभिशापित आवासों का दोष-निदान

  1. विभिन्न ग्रहों के मकान और जातक की कुंडली से मिलान
  2. विभिन्न ग्रहों के मकान के विपरीत दोषों का निदान
  3. मकान की दशा से शारीरिक ऊर्जाचक्रों की पहचान
  4. मकान के परिवर्त्तन से अपना ऊर्जा समीकरण शुद्ध करके सुखी रहने का सूत्र
  5. देवी-देवता के स्वरुप में मकानों का वर्गीकरण
  6. अभिशापित मकान
  7. अभिशापित मकानों के दोष निदान
  8. मकान के अंग और उनका विन्यास (शयन, रसोई, बैठक, सेंट्रल हॉल, शौचालय आदि )
  9. अभिशापित अंगो के स्वरुप और निदान
  10. आवासीय भवनों की स्थापत्य कला-दोष एवं निदान (नींव, छत, दीवार, मटेरियल , रंग, पेड़ आदि )

 

पूजागृह (मंदिर आदि) के वास्तुसूत्र

  1. आवासीय भवन या आबादी के बीच मंदिर निर्माण की वर्जना
  2. मंदिरों का विज्ञान और वास्तुसूत्र
  3. देवी देवता के अनुसार मंदिर निर्माण के सूत्र और नियम
  4. मूर्ति स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा के नियम
  5. ध्यान मंडप निर्माण के सूत्र और नियम
  6. मंदिर प्रांगन में वृक्षों का विन्यास
  7. अभिशापित मंदिरों के लक्षण
  8. मंदिर प्रांगन के तालाब, कुंद, कुआँ या जलस्त्रोत
  9. हवन, यज्ञ , अनुष्ठान के नियम

व्यावसायिक वास्तु सूत्र

  1. व्यावसायिक भूमि के प्रकार
  2. व्यावसायिक भूमि का शोधन

40   व्यावसायिक भवन निर्माण के सूत्र

  1. व्यावसायिक मल्टी कॉम्प्लेक्सों के सूत्र
  2. दूकान के अनुसार व्यवसाय का वर्गीकरण
  3. बड़े कारखानों एवं यंत्रों की स्थापना का सूत्र
  4. व्यावसायिक क्षेत्र के अंगों का वास्तुसूत्र
  5. व्यवसाय-वास्तु का जन्म कुंडली से सम्बन्ध और दोष निदान

जलाशय वास्तुशास्त्र

  1. पेयजल का वास्तुसूत्र
  2. पेयजल के प्राकृतिक शोधन के सूत्र एवं विधि
  3. अभिशापित पेयजल एवं दोषनिदान
  4. जलाशय निर्माण , पुनुरुद्धार और परिशोधन
  5. जलाशय के किनारे लगने वाले वृक्ष
  6. जलाशय के मतृ जल का अमृतीकरण
  7. वाटर टैंकों के निर्माण और संरक्षण का सूत्र
  8. स्विमिंग पूल के निर्माण का सूत्र
  9. अभिशापित जलाशय, स्विमिंग पूल, मकान के पास के जलीय गड्ढों का सूत्र
  10. अभिशापित जलाशयों आदि का दोष निदान

वाहन वास्तु

  1. वाहनों के रंग, वास्तु, डिजाईन का उपयोगकर्ता पर प्रभाव
  2. कुंडली और वाहन में सम्बन्ध
  3. वाहनों के दोष निदान
  4. किसके लिए कैसा होगा अभिशापित वाहन
  5. अभिशापित वाहनों के दोष निदान
  6. व्यावसायिक वाहनों का शुभाशुभ निर्णय

 

सभी प्रकार की इंटीरियर सेटिंग , रंग- व्यवस्था, शयन, भोजन, वस्त्र, आभूषण, कैश बॉक्स, तिजोरी आदि ; जो आवासीय,व्यावसायिक एवं धार्मिक स्थलों में आवश्यक होते हैं।इनका विज्ञान इनके साथ ही अलग होता है। जिसमें मकान मालिक, व्यवसाय का मालिक या सीनियर पार्टनर, मंदिर के ईष्ट देवता आदि का तुलनात्मक अध्ययन होता है।

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