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रीढ़ का ऊर्जा बेलन

रीढ़ का ऊर्जा बेलन (Spine energy cylinder)

हमारे शरीर की तमाम क्रियाओं के लिए ऊर्जा का उत्पादन हमारे रीढ़ में होता है। यह हमारा ‘कोर’ है। तमाम नक्षत्रीय पिंडो और सूर्य तारों में इस ऊर्जा का उत्पादन उसके केंद्र में स्थित एक कठोर गोले से होता है। यह कठोर गोला पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण हमारे शरीर में ऊपर लम्बोतरा होकर व्याप्त है। यह गोला नारंगी की आकृति का होता है और लम्बा होने के कारण यह एक शेषनाग की आकृति में ढल गया है। मस्तिष्क की कोशिकाए इसी शेषनाग के फण है । पेड़ों में यह बिल्कुल स्पष्ट है। इन फणों से फुफकार निकलती है। यह फुफकार हमारे नाक की जड़ में दोनों ओर से मुड़कर मिलती है। इनकी सम्मलित फुफकार ही हमारी श्वाँस है। बाएँ हिस्से के मिलन बिंदु से बायी नासिका दाये के मिलन बिंदु से दायीं नासिका चलती है।

हमारे वैज्ञानिकों का विश्वास है कि इस श्वाँस से जो हवा अंदर जाती है, उसके ऑक्सीजन से हमारा जीवन है। वे दूसरा कारण पानी को मानते है। इसलिए जीवन की खोज में दूसरे ग्रहों पर पानी और ऑक्सीजन की तलाश कर रहे है। परन्तु तत्व विज्ञानं कहता है कि ये दोनों जीवन के कारण नहीं है। जीवन का कारण हमारे चाँद के ऊपर बनने वाली एक ऊर्जा है, जो लगातार चाँद में गिरती रहती है। यह ऊर्जा रीढ़ के मध्य से मूलाधार प्लेट पर जाती है और घूमते हुए आधार से टकराकर सांप की तरह लिपटती ऊपर बढती है और फिर चाँद के प्लेट से टकराकर घुमती हुई नीचे आती है। यह सारे शरीर की ऊर्जा धाराओं के मध्य संचरण करती है। रोम-रोम के मध्य । यही हमारा जीवन अमृत है और इसी से हमारा शरीर सड़ता नहीं और संवेदना को वहन  करता है। इसी ऊर्जा को ॐ के चाँद पर बिंदु के रूप में दर्शाया गया है और यदि हम ॐ को गौर से देखें तो यह हमारी खोपड़ी का आउट स्केच है। चाँद सिर के मध्य का गढ़ा  है और बिंदु उस गढ़े के मध्य गिरने वाली वह अमृत ऊर्जा , जिसे सोमरस , शिवसर , सती , गायत्री, सावित्री आदि कई नामों से जाना जाता है। ( देखें गायत्री प्रकरण)

शरीर की ऊर्जा संरचना दो शंक्वाकार नेगेटिव-पॉजिटिव ऊर्जा क्षेत्र से बनती है, जो एक दूसरे में समाई स्प्रिंग की तरह खींचती फैलती रहती है।इससे रीढ़ के मध्य की ऊर्जा में पम्पिंग होती है और उसी प्रेशर से यह सोमरस अंदर आकर सभी चक्रों में वितरित होता है। इन चक्रों में स्थित शक्ति को ही देवी या देवता कहा जाता है।इसीलिए कहा जाता है कि सोमरस का पान देवता करते है। यह प्रेशर के कारण नीचे जेट की तरह और शीर्ष पर फव्वारे की तरह निकलती है| फव्वारे शेषनाग के फण और नीचे का जेट पूँछ बन जाते है।

यह प्रत्येक की संरचना है। ग्रह पिंडों के नारंगी की आकृति के होने का भी यही कारण है और उनके घूमने का भी । यह धारणा गलत है कि ग्रहों की उत्पत्ति तारों के टूटने से हुई है और वे धीरे-धीरे ठंडे हो रहे हैं। सबकी अपनी – अपनी ऊर्जा उत्पत्ति है और सभी अपने चाँद से सोमरस का पान करके क्रिया कर रहे हैं । यह पूरी प्रकृति इसी प्रकार क्रिया कर रही है।

यदि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण न होता , तो हम भी नारंगी जैसे गोलों में घूम रहे होते , न आँख होता , न कान , न हाथ होते , न पैर । बस चक्कर काटते नाच रहे होते। वनस्पति भी ।वे हमारी अपेक्षा अधिक पॉजिटिव हैं, इसलिए पृथ्वी ने उन्हें खींचकर अपने अंदर जड़ कर लिया है ।

यह बहुत विस्तृत सुपर पॉवर एटॉमिक साइंस है। अधिक विस्तार से विषयांतर हो जायेगा । बस यही कहना पर्याप्त होगा कि यही वास्तविक विज्ञानं है, जो हर रहस्य की व्याख्या करता है । यदि ब्रह्माण्ड में कोई विकसित प्राणी उत्पन्न होगा, किसी भी ब्रह्माण्ड में होगा, तो इसी विज्ञान को जानेगा , क्योंकि इसके सिवा कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं ।

 

सिर का चाँद यानी शिव-पार्वती का स्थान। सिर के इस शीर्ष स्थल को कैलाश कहा जाता है। यहाँ यह गड्ढा है, जिसे हर देवी-देवता के सिर में दिखाया जाता है। शिव के शीर्ष पर चंद्रमा इसी चंद्रमा का प्रतीक है। इसके मध्य एक छेद होता है, जो त्वचा से ढका रहता है।  यह छेद ही योग में ‘ब्रहरंध्र’ या ‘हरिद्वार’ कहलाता है।

योग विद्या में इसे सहस्त्रार चक्र कहा जाता है। ये चक्र 9 होते है। क्या होते है, क्यों होते है, इसे ‘शरीर के ऊर्जाचक्र’ शीर्षक में देखें।

इसी छेद से चाँद के ऊपर एक अधोमुखी शंक्वाकार ऊर्जा क्षेत्र बनता है, जो बड़ी तेजी से घूम रहा होता है। इसके मध्य में घूर्णन बल नहीं होता, इसलिए मूलतत्व परमसार परमात्मा या सदाशिव उसमें स्वतंत्र रूप से विद्यमान होते हैं। उस शंक्वाकार क्षेत्र में भी उन्ही की धाराएं घूम रही होती है। सदाशिव तत्व और  इसमें केवल इतना अन्तर होता है कि एक में घूर्णन बल होता है, दूसरे में नहीं।

यह शंक्वाकार संरचना चन्द्रमा के चक्र की प्रतिक्रिया में क्षितिज में उत्पन्न होती है और जिसका जैसा शारीरिक समीकरण होता है, उसी समीकरण में यह ऊर्जा प्रतिक्रिया में उत्पन्न होती है। यह लगातार चाँद में बन-बनकर गिरती रहती है।

यही हमारे जीवन का वास्तविक आधार है। इसी की कमी से कारण हम बूढ़े होते है; क्योंकि चाँद में छेद धीरे-धीरे शारीरिक प्रदूषण से अवरुद्ध हो जाता है। शरीर के भीतर जो रहता है, उसी से काम चलता रहता है और कमी होने पर झुर्रिया पड़ती है, फिर जब प्रेशर के लायक कुछ नहीं बचता , तो मृत्यु हो जाती है।

इस ऊर्जात्मक उत्पत्ति की सनातन धर्म में बड़ी महिमा है। यह गायत्री हैं , सावित्री है , देवगंगा है, जो ब्रह्मा के कमंडल से निकलती है, यह सती है, जो शरीर रुपी दक्ष प्रजापति के कारण उत्पन्न होती है। इसके हृदय में शिव होते हैं और यह बार-बार इस प्रजापति के हवन कुंड में गिर-गिर कर आत्मदाह करती है और शरीर के केंद्र में चल रहे विष्णु के चक्र से समस्त शरीर में वितरित होकर 52 ऊर्जाचक्रों को शक्ति प्रदान करती है।

बड़ा आश्चर्यजनक विज्ञान है यह । हम रूपक कथाओं को समझना चाहेंगे , तभी यह समझ में आएगा

 

One thought on “रीढ़ का ऊर्जा बेलन

  1. ।।ॐ युगऋषि गुरुदेवाय श्रीप्रेमानंदाय अलखा नमो नमः।।

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