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राहु – केतु का रहस्य

प्रश्न – राहु-केतु क्या है? क्या ये सच के ग्रह हैं?

विज्ञान से प्रमाणित है कि इस नाम की कोई शक्ति या कोई ग्रह नहीं होते। सूर्य ग्रहण चन्द्रमा के बीच में आ जाने से होता है और चन्द्र ग्रहण पृथ्वी के बीच में आने से। फिर यह हमारे जीवन को प्रभावित करता है, इसका क्या तुक हैं?

उत्तर – यह अच्छा प्रश्न है। इस पहेली को प्रत्येक मनुष्य को जानना चाहिए।

ज्योतिष में ‘होरा’ एक अलग शास्त्र है और नक्षत्र ज्योतिष अलग। दोनों में सम्बन्धितभी है, पर यह सम्बन्ध इतना सरल नहीं है कि इसे सौरमंडल के ग्रहों के आधार पर समझा जाये।

वस्तुतः ज्योतिष में ग्रह का अर्थ गाँठ है। ऐसी गाँठ जो ऊर्जा उत्पादित करती है। यह एक विशेष ऊर्जा-संरचना के मुख्य ऊर्जा उत्पादन बिन्दुओं से सम्बन्धित है।

ये ग्रह या बिंदु हमारे शरीर के रीढ़ में होते हैं। ये नौ होते हैं; मगर केवल सात  की ही महत्ता दी जाती है। मणिपुर और विशुद्ध चक्र के दो-दो बिंदु माने गये है। इन पर ही योग, तन्त्र, देवी-देवता , मातृका वर्ण , अंक सूत्र , आदि निर्भर करते हैं। चूँकि आध्यात्मिक सूत्र के अनुसार प्रत्येक इकाई में यही संरचना होती है, इसलिए सौरमंडल में भी ये ग्रह है,। ऊर्जा प्रकृति के अनुसार इन ग्रहों का नामाकरण किया गया है और शरीर में इनका स्थान (रीढ़ में) निर्धारित किया गया है। इसी कारण प्राचीन होरा श्लोकों में चन्द्रमा की कक्षा सूर्य से ऊपर बताई गयी है। यह चन्द्रमा हमारे शीर्ष का चंद्रमा है। ‘ॐ’ के ऊपर का चाँद, महादेव के शीर्ष का चाँद। सूर्य का स्थान ह्रदय केंद्र होता है। इस प्रकार यह चन्द्रमा सूर्य से ऊपर होता है।

इसी कारण से प्रत्येक ग्रह का एक देवता है और देवता या देवी हमारे चक्रों की ऊर्जा उत्पादन करनेवाली शक्तियां है। जब सौरमंडल के ग्रहों में समीकरण बदलता है, तो पृथ्वी का वातावरण बदलता है और उसका अलग-अलग प्रभाव अलग-अलग समीकरणों के शरीर पर पड़ता है। इस विद्या को केवल सौर-ग्रह-विज्ञान मानने से सारा भ्रम उत्पन्न होता है।

हमारे सिर के चाँद के ऊपर एक ऊर्जा बनती है, जिसे ‘ॐ’ में बिंदु के रूप में दिखाया गया है। यह सावित्री/गायत्री/सती/ गंगा/अमृत/ब्रह्म नीर आदि के रूप में जानी जाती है। यह जब मस्तिष्क में गिरकर प्रवाहित होती है। इन लहरों की शक्ति को राहु कहा जाता है। यह सीधे सूर्य को प्रज्व्ल करती मूलाधार पर गिरती है और फिर सूर्य होते मस्तिष्क तक और फिर वहाँ से रिटर्न मूलाधार पर आती है और इन तीनों धाराओं का प्रवाह मूलाधार से पूँछ के रूप में जेट की तरह बाहर निकलती है। यह केतु है। यह तत्व विज्ञान के तथ्य है। तन्त्र, ब्रह्म विद्या इसी तत्व विज्ञान के ही नाम है। इनके भी इस विषय के तथ्य यही हैं।

साफ़ स्पष्ट है कि एक + पोल है, दूसरा – पोल की शक्ति। + की धारा प्रभावित होगी, तो सूर्य (नाभिक) प्रभावित होगा ही। कोई भी विज्ञान हो, यही कहेगा और – पोल की धारा अवरुद्ध होगी , तो + पोल (चाँद का छिद्र/ उसमें प्रवाहित +/ राहु )प्रभावित होगा ही। यह भ्रम उल्टी-सीधी समझ और ज्योतिष के विज्ञान के प्रति जानकारी किये बिना निष्कर्ष निकालने की अभूतपूर्व बुद्धिमत्ता के कारण उत्पन्न हुआ है। मुर्ख लोग ऐसे ही निष्कर्ष निकालते हैं। बिना विषय को गहराई से जाने। ऐसा नहीं है कि विज्ञान के क्षेत्र में मूर्ख नहीं है।

+ एवं – पोल की शक्ति होने के कारण ही राहु-केतु को खतरनाक माना जाता है। एक बाधित होगा, दूसरा सही भी होगा ; तो किसी भी यंत्र के सभी पार्ट प्रभावित हो जायेंगे।

आध्यात्मिक आचार्यों के प्राचीन निर्देश हैं कि यदि जीवन को सुखमय रखना है, रोग और समस्याओं से बचना है, तो सिर के चाँद और तलवों का ध्यान रखें। आयुर्वेद और तन्त्र के भी आचार्यों ने यही कहा है।

पर आज डाई का जमाना है। स्त्रियाँ चेहरे पर केमिकल बेस मेकअप करती हैं , नखों पर नेल पॉलिश। पैर चौबीस घंटे बंधे रहते हैं।किसी को याद ही नहीं आता कि मृत्युंजय यज्ञ का या अन्य अभिषेकों का जल सिर से क्यों ढाला जाता है? कोई जानना नहीं चाहता है कि चाँद को आयु का देवता क्यों कहा जाता है? किस कारण कुछ वर्ष पहले तक माताएं बच्चों के सिर पर तेल थोपती रहती थी; क्यों उन्हें भींगे पैर भोजन करने और सूखे पैर सोने की सलाह देती थी।

 

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