राम कहाँ है?

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

आपके हृदय में जो नाभिक (जीवात्मा) है, उसके अंदर जो ‘आत्मा’ (प्रथम परमाणु संरचना) बैठी हुई है , उसका सीधा सम्बन्ध ‘राम’से हैं। इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप इसे किस नाम से पुकारते है। इस पर किसी धर्म , सम्प्रदाय , नस्ल या ग्रह आदि का कोई वर्ग नहीं है। ये सबमें हैं। परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक में ।

‘राम’ का अवतरण ‘परमात्मा’ से होता है। यह प्रथम कण है। पहली गिनती या पहला अंक । यही एक से अनेक होता जा रहा है, यही संयोजन कर रहा है। इनके असंख्य रूपों की वास्तविक केंद्रीय शक्ति ब्रह्माण्ड के नाभिक में बैठी है। उसके केंद्र में और यही राम है।

इस ‘राम’ से प्रत्येक कण का ऊर्जा – धाराओं के माध्यम से उसी प्रकार सम्पर्क हुआ है, जैसे सूक्ष्म नालियों का सम्बन्ध किसी महानदी से होते हुए समुद्र से होता है। राम ही इस व्यवस्था के संचालक है और यही राम अयोध्या में युगधर्म का पालन करने के लिए अवतरित हुए थे। यह ‘राम’ कभी कृष्ण बनकर अवतरित होते हैं, तो कभी कपिल बनकर। कभी ये बाल- बैरागी होते हैं, तो कभी भोग के अधिष्ठाता , परन्तु प्रत्येक बार ये विश्व में दुष्टों का नाश करने और सनातन-धर्म के सिद्धांतों की स्थापना के लिए ही उत्पन्न होते हैं। चेतना और शक्ति का यह शक्तिधारक प्रतिक्रियावादी रूप भी प्रकृति के नियमों के अंतर्गत उत्पन्न होता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *