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यंत्र और ताबीजों से चमत्कारिक फलों की प्राप्ति कैसे होती हैं?

इस पर हम पहले भी प्रकाश डाल चुके हैं। हमारी वेबसाइट धर्मालय में इसका पूरा विज्ञान  वर्णित है। बहुत से लोग इसे केवल डायग्राम समझते हैं और अनेक प्रसिद्ध धर्मगुरु भी इसे डायग्राम बताते हैं; पर प्रसिद्धि प्राप्त कर लेने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता। एक आइटम सॉंग पर फिल्म की प्रसिद्धि से प्रसिद्धि बटोरनेवाला अभिनेता भले ही सुपर स्टार बन जाए , पर वह अभिनय विद्या का प्रोफेसर नहीं बन सकता। ज्ञान की कसौटी प्रसिद्धि नहीं होती।

हमारे प्रत्येक यंत्र शक्ति सूत्रों को व्यक्त करते हैं यानी वे किसी न किसी गुप्त ऊर्जा – संरचना और व्यवस्था को अभिव्यक्त करते है। इस व्यवस्था को पदार्थों एवं रगों के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। इस व्यवस्था में जब हमारी मानसिक भाव शक्ति का संयोग होता है, तो वहां एक नेगेटिव चार्ज उत्पन्न होता है। उसकी प्रतिक्रिया में पॉजिटिव चार्ज वातावरण में यंत्र के उल्टे बनता है और उसमें समाहित होने लगता है। ‘यंत्र’ की शक्ति का रहस्य यह है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए यंत्र के निर्माण और उसके प्रयोग में गुप्त निर्देश होते है। कागज़ पर प्रिंटेड यंत्रों से लाभ नहीं होता, न ही भारी मात्रा में छापकर , ढालकर बनाये गये यंत्रों से कोई लाभ होता है। यंत्र का निर्माण एक –एक कर हाथ से किया जाता है और उसकी सिद्धि भी अलग-अलग की जाती है; क्योंकि जड़ी बूटियों के रस में रंगों का समायोजन करके इन्हें विशेष वस्तुओं की कलम से लिखा जाता है। जो विद्वान पंडित इन यंत्रों की शास्त्रीय विधि को जानते है; वे जानते हैं कि यह कितनी तकनीकी और कितने परिश्रम का कार्य होता है।

कोई ताबीज भी ऐसे ही बनाया जाता है।इसमें भी वही सूत्र है। शरीर की ऊर्जा से यह चार्ज होकर नेगेटिव चार्ज उत्पन्न करता है और उसकी प्रतिक्रिया में वातावरण से पॉजिटिव इसमें समाहित होकर शरीर को मिलने लगता है। सभी प्रकार के रत्न अंगूठियाँ, वस्त्र, पिरामिड , आदि इसी प्रकार काम करते है। मूर्ख ही इसे डायग्राम समझते हैं। यदि यह डायग्राम है, तो किस रहस्य के? हजारों डायग्राम के विवरण हमारे संस्कृत ग्रन्थों में क्यों है? वस्तुतः वहां कोई डायग्राम नहीं है। वहाँ तो डायग्राम बनाने के विवरण है और उनकी पूरी विधि प्रक्रिया है। छपे हुए डायग्राम तो बाद के चित्रकारों की देन है. जिन्हें पुस्तकों को या कैलेन्डर को प्रकाशित करनेवाले चित्रकारों ने बनाये हैं। इनमें से कोई शास्त्र का ज्ञाता नहीं होता, इसलिए इनमें कई त्रुटियाँ भी होती हैं।

वास्तविक यंत्र और ताबीज बनाने की परम्परा ही नष्ट हो गयी है। इसका व्यवसायीकरण हो गया है और लोग ढालकर, छापकर, पत्रों पर खुदवाकर भारी मात्रा में बना-बेच रहे हैं। इनकी कोई सिद्धि आदि की भी विधि नहीं की जाती। इनसे कोई लाभ मिलेगा, यह सोचना ही अज्ञानता है। केवल आस्थाएं फलीभूत नहीं होती। आस्था आवश्यक है, पर बे सिर – पैर की आस्था का कोई अर्थ नहीं है। हर आस्था के पीछे एक रहस्य है, एक विज्ञान है, उसकी प्रक्रियाएं है; उनको अपनाये बगैर केवल आस्था कुछ दे सकती , इसपर मुझे संदेह है।

 

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Email- info@dharmalay.com

 

2 thoughts on “यंत्र और ताबीजों से चमत्कारिक फलों की प्राप्ति कैसे होती हैं?

  1. Mere pass 25 aam ke jhar hai 22 sal ke fal nahi pa rahe hai aur jhar me growth nahi hai. Coconut ka bhi same problem hai ful ake chote chote coconut gir jate hai. Mai konkan ka rahne wala hu.mujhe tawiz ya koi upchar batana. Peru chiku har fal k liye.

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