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मोक्ष क्या है ? मोक्ष का मार्ग क्या है ?[ क्रमांक २]

[गतांक से आगे ]

आत्मा रुपी कण, जो एक सूक्ष्म परमाणु है, ९+९९ पावर प्वाइंट से युक्त होता हैं. इसमें केवल एक, इसका नाभिक न्यूट्रल होता है और एक शीर्ष का विन्दु. शेष सापेक्ष रूप से + एवं – वर्ग में बंटे होते हैं. जब ये ब्रहमांड के नाभिक से उत्सर्जित होते हैं, तो न्यूट्रल ही रहते हैं, पर जंहा भी नया सर्किट बन रहा होता है, वहाँ पम्पिंग हो रही होती है और यह उसमें खिंच कर उसके नाभिक  में सेट हो जाते हैं और इनकी ट्यूनिग उस सर्किट के अनुसार हो जाती है. इसका अपना ज्ञान लुप्त हो जाता है और यह स्वयं हो वही सर्किट समझने लगते हैं. यह सर्किट की ज्ञानेन्द्रियों के अनुसार आसपास को मनमोहक रूपों में अनुभूत करता है और कामना के मनमोहक जाल में फंस कर क्रिया करने लगता है. इससे भाव बदलते रहतें हैं और इसके प्वाइंट त्युंड होने लगते हैं. शरीर के नष्ट होने पर भी यह त्युनिग बनी रहती है और उसी समीकरण में आवेश बनते रहतें हैं. इसे निगेटिव की तलाश होती है और यह उसी समीकरण का नया बनता शरीर ढूंढ कर उसमें समां जाता है और फिर त्युंड होने लगता है. इस प्रकार यह जन्म-मरण के चक्कर ब्रहमांड की आयु तक दुःख भोगता है, क्योकि इसकी मृत्यु नहीं होती.

जीव यही है और सभी जन्मों में यह सुख की तलाश में जाने क्या क्या करता है, पर इस मिर्ग मरिचिका में सुख कहाँ? कामना पूर्ति होने पर थोडी  देर के लिए आवेश न होने पर शांति मिलती है, फिर नयी कामना उत्पन्न होने लगती है. फिर दुःख. इससे कभी मुक्ति नहीं मिलती.

सनातन धर्म के ऋषियों एवं आचार्यों ने इसे पाने के अनेक रास्तों का अपने अपने ढंग से मार्ग दर्शन किया है, पर उनमें से अधिकतर जीव के उच्च स्तर को प्राप्त करने के मार्ग हैं, मुक्ति के नहीं. मुक्ति जप, तप, पूजा-पाठ, सिद्धियों आदि से नहीं मिलती. ये सभी सांसारिक सुख भोग के साधन हैं. आचरण, तीर्थ से भी इसका सम्बन्ध नहीं है. ये सभी आपको न्यूट्रल नहीं बना सकते, क्योकि ये भी कामना ही हैं. आवेश सात्विक, हो या तामसी वह आवेश है. जब तक वह है, आप बंधन में हैं.

कुछ ने कहा संसार छोड़ दो. कुछ ने कहा नारी और रति का त्याग कर दो. कुछ ने कहा अन्न जल त्याग दो, कुछ ने जटिल आचार संहिताएँ बना डालीं, पर यह सब भ्रम की कार्यवाई है, इससे मुक्ति प्राप्त करना असंभव है. सीधा सा वैज्ञानिक कारण है. त्युनिग का कारण भाव है, कर्म नहीं. मन को आप किस प्रकार कामना विहीन शून्य करेंगे? कर्म करें या न करें, भाव बनते रहेंगे, आवेशीय त्युनिग होती रहेगी, समीकरण बनता रहेगा.

फिर इसके लिए क्या करना चाहिए?

गीता को गंभीरता से बार बार पढ़ें. धार्मिक आस्था को छोड़ कर पढ़ें और समझने का प्रयत्न करें. कोई भी पूर्व आस्था उसे समझने नहीं देगी आप अपनी आस्थाओं में ही भटकते रह जायेगे. कृष्ण ने कहा है, इद्रियों को इन्द्रियों में ही वरतने दो. भोग और कर्म का त्याग मत करो, उससे राग का त्याग करो. यह सबसे सरल मार्ग है और शैव मार्ग के आचार्यों ने भी यही कहा है. समस्या कर्म नहीं, राग है. भूख लगी है, जो मिलता है, खाने योग्य है खा लो. यदि तुमने रसगुल्ले और घास की रोटी में अंतर नहीं किया, तो तुम ही सच्चे सन्यासी हो. गीता विस्तार से बता रही है कि, सन्यास और मुक्ति क्या है. शैव आचार्यों की भाषा कड़ी है, पर वे भी कह रहें हैं कि तीर्थ में, नदी स्नान में, अन्न जल त्याग में, व्रत में उपवास में, आचरण संहिता में ज्ञान नहीं है और बिना ज्ञान मुक्ति संभव नहीं है, न शिव से सामंजस्य होगा. ज्ञान  के बिना राग से मुक्ति भी संभव नहीं है, क्योंकि यह प्रकृति इतनी लुभावनी और मायाविनी है कि  ज्ञान के भी क्षेत्र में भ्रम पैदा कर देती है. जब तक परम तत्व से सृष्टि की उत्पति से ले कर अपने अस्तित्व तक का क्रमवार ज्ञान नहीं होता, जीव इसके बंधन में भटकता रहता है. जब यह ज्ञान हो जाता है, तो किसी जप ताप की जरूरत ही नहीं होती. ऐसे व्यक्ति के लिए कोई भी कर्म विहित या वर्जित नहीं है. वह जो भी करता है, उसका कर्त्ता वह होता ही नहीं है.

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