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मोक्ष क्या है? इसकी प्राप्ति का मार्ग क्या है?

हमारा शरीर एक उर्जा संरचना है ,जो एक सर्किट बना रहा है .. जैसे की एक मशीन ,जिसमें अनगिनित पावर पॉइंट और अनगिनित उर्जा दारा धाराएँ हों . यह स्थानीय +  – उर्जा के सयोग से बनता है , पर जीवित तब होता है जब इसमें ब्रह्मांड का नाभकीय कण मध्य में समां जाता है .यह समान पावर सर्किट में होता है और मध्य में आते ही शरीर के समीकरण में इसके सभी पॉइंट और धाराएँ त्युंड  हो जाती हैं ..यह इस प्रकार समझें कि शरीर उसका निगेटिव खोल बन जाता है .वास्तविक जीव वह ब्रहमांड के नाभिक का कण ही है ..चेतना आदि उसके गुण हैं ‘उसमें में  शरीर जैसा ही सब कुछ होता है .उसकी त्युनिग उसी के अनुसार हो जाती है और वह अपने को शरीर से अभिन्न समझने लगता है .इसी को बंधन कहा गया है ,पर इसे ठीक से समझने के लिए कुछ और भी जानना जरूरी है

इस आत्मा [सार] रुपी कण का और इस शरीर का भी निर्माण मूल तत्व की धाराओं से होता है .इसमें नया कुछ नहीं बनता .यह तत्व सदा निर्मल है . पर जब इसमें इसी की धाराओं से पहले परमाणु का जन्म होता है ,तो वह अज्ञानता में पर कर स्वयं को अलग इकाई मानने लगता है और स्वयं के पोषण के लिए प्रयत्नशील हो जाता है . यह पहला बंधन है .इसे तंत्र के आचार्यों ने अणुमल कहा है यानि परमाणु विकार ..यह परमाणु आधुनिक परमाणु से लाखों गुना सूक्ष्म है.अनुभूतियों ,कामनाओं की शक्ति इसमें बहत होती है ,मगर अनुभूति करने लायक वहां केवल मूल तत्व का शून्य होता है ,इसलिय यह करवल अपने पोषण में लगा रहता है .एक शून्य भाव होने के कारन इसके पावर तुनिग शून्य ही होती है .यहाँ केवल मैं का भाव होता है ,जिका पूरा बल मध्य में लगता है .

एक समय के बाद इसके मध्य का बल इतना बढ़ जाता है की यह वहां से अपनी प्रतिलिपियों का उत्सर्जन करने लगता है और धाराओं में नए सर्किट बनाने लगते हैं . इसके कण उसके मध्य में समां जाते हैं और स्वचालित हो जाते हैं ..यह क्रम बढ़ता जाता है और यह ब्रह्मांड बन जाता है .

इकाइयों की अलग अलग अनुभूति क्षमता होती है और वह आसपास को भांति भांति के मनमोहक रूपों में अनुभूत करके कामनाओं के जगत को भोगने में लग जाता है .उसके बदलते भाव पावर प्वोइंतों की ट्यूनिग करने लगते हैं और आत्मा के सर्किट का उर्जा संतुलन विभिन्न समीकरण में त्युंड होने लगता है ..शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी यह समीकरण उस पर बना रहता है ,क्योंकि इसकी आयु ब्रहमांड की आयु तक होती है .उस पर उसी समीकरण में आवेश बनता रहता है और अगला शरीर उसी समीकरण का मिलत है ,क्योंकि एनी कोई उसके निगेटिव बनाने की क्षमता नहीं रखता .कर्म फल और पुनर्जन्म का यही आधार विज्ञानं है .

इस प्रकार यह आत्मा बार बार जन्म मृत्यु के चक्कर में दुःख भोगती है ,क्यिंकि इस संसार में सुख कहाँ ? दुःख अपूर्ण कामना देती है और कामना एक पूरी होती है दूसरी शुरू हो जाती है .यह हमारे अन्दर लगातार त्युनिग बनती रहती है और हम कभी न्यूट्रल बन ही नहीं पाते . यदि हमारा समीकरण न्यूट्रल हो जाए , तो हम जन्म लेंगे ही नहीं या इच्छा जन्म ले कर अपने अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे . यही मुक्ति है . कुछ आचार्य परमाणु को ही नष्ट करके परमतत्व में परिवर्तित करने को मोक्ष कहते हैं ,पर इसकी आलोचनायें भी होती रहीं हैं .

प्रश्न है की इस मोक्ष को कैसे प्राप्त करें ? इसे क्रमांक २ में देखें .

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