आप यहाँ हैं
धर्मालय > तंत्र मन्त्र सिद्धि साधना > मायालोक की मायावी सिद्धियाँ.

मायालोक की मायावी सिद्धियाँ.

साधना कैसे पाए?

एक विचित्र सत्य है ,जिसे प्रत्येक साधु, साधक, ईश भक्त, देवी भक्त, भूतनी, प्रेतनी, यक्छिणी, डाकिनी आदि किसी भी ईष्ट की साधना करने वालों को जानना चाहिये अन्यथा उच्च कोटि की सिद्धि प्राप्त करके भी वे जड़ ही रह जायेंगे .एक मैकेनिक की तरह ,जिसे केवल विधि और रिजल्ट का ग्यान होता है  वह कारण नहीं जानता और जरा सा पेंच फँस जाये, तो रिजल्ट तो जाता ही है ,ईंजन का ही कबाड़ हो जाता है .हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि साधना सिद्धि मे ईंजन हमारा ऊजाॆचक्र होता है यानी मौत, पागलपन कोई भी घातक परिणाम प्राप्त हो सकता है .

आध्यात्मिक जगत का आधार ब्रह्म विद्या है .उपनिषदों का तत्वविग्यान .यह उस काल पुरूष का विग्यान है, जिसका संक्छिप्त वणॆन रृग्वेद में मिलता है .यह विग्यान अनादि है और वैदिक एवं शैव आचायों ने कहा है कि इसके सिवा इस प्रकृति में दूसरा कोई विग्यान नहीं है .यह आज की तारीख में विलुप्त हो गया है .हम इसे ही डिस्कवडॆ करने का प्रयत्न कर रहे है ं

ब्रह्म विद्या के अनुसार य़ह प्रकृति नौ प्रकार की सूक्छम उजाॆ धाराओं से निमिॆत है ,जिनमें परमतत्व का योग है .जिस प्रकार 0 –से–9 के योग से अनन्त संख्याओं का योग होता है ,उसी प्रकार  0 से 9 ऊजाेरश्मियों से अनन्त ईकाइयों की उत्पत्ति हो रही है .इनमें नौ प्रकार के गुण होते हैं .ये भी वैसे ही अनन्त गुणों का समीकरण बनाते है .

 

चमत्कारिक जादुई सिद्धियाँ

हम जितने प्रकार के रूप, गुण ,रंग, आकृति ,भिन्नता देखते हैं, वे सभी इन नौ से ही बनते है .इसी लिये देवी का मुख्यरूप नौ माना जाता है .

एक विस्मय कारी और इस विग्यान का हैरतअंगेज रूप हमारे अन्दर भी है .यह सब बहुत विशाल सागर है,पर इनमें से एक है कि हम जिस भाव में किसी रूप -गुण-आकृति मे ध्यान केन्द्रित करेंगे ,हमारे आग्याचक्र पर उस समीकरण में शारीरिक ऊजाे समीकरण का संघनन होने लगेगा और सृष्टि की उत्पत्ति के समय उत्पन्न प्रतिक्रिया का प्रथम नियम क्रियाशील हो जायेगा .फलत: बाहर वह पाजिटिव संघनन शुरू हो जायेगा और हम उसका प्रत्यक्छ करेंगे .पर यह वही साधक कर पायेगा, दूसरा नहीं.

उच्च कोटि की सिद्धि है यह. साधक को सभी क‌ुछ प्राप्त होता है, जो शास्त्रों में कहा गया है, पर वह भी पावॆती रूप उस पद्मावती की मायावी रूप है .,जो बड़े बड़े योगी, महात्मा, साधक, अवतार को भी भ्रमित कर दती है .बच्चे यह अद्भभुत् विग्यान युगों युगों में करोडो़ प्रयत्न करनेवालों वालों में में से किसी एक को ग्यात होता है . तुमसे विशॆष स्नेह होने के कारण मैं तुम्हें बता रहा हूँ .

(गुरूवर तत्ववेत्ता शिवभक्त श्री प्रेम कुमार शमाॆ रचित योग,भोग,मोक्छ,काम, अथे के समस्त रहस्यों को व्यक्त करते हुए प्राप्त करने का मागे बतानेवाला मायावी तिलस्मी शृंगार रस से प्लावित उपन्यास “रानी पद्मा वती”)

अपनी प्रति शीघ्र सुरक्छित करायें .

Leave a Reply

Top