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मानसिक रोग और उसके कारण (किया-कराया सहित)

कारण और निदान

यह रोग किसी प्रकार का शॉक लगने से , विषैले वायु या शक्ति के प्रवेश से ,  किसी दुष्ट द्वारा किसी जादू-टोने वाले शक्तिकृत विष के एक – दो बूँद दे देने से, किसी कारण से शरीर की स्वाभाविक आंतरिक विद्युत् प्रवाह के डिस्टर्ब होने से होता है।

यह सब बाहरी कारण है; परन्तु आंतरिक स्तर पर कोई स्थूल परिवर्तन नहीं होता।  आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस सम्बन्ध में कुछ बताने में असमर्थ है।  कारण का ज्ञान न होने से वह इसकी उचित चिकित्सा भी कर पाने में असमर्थ है।  वह शामक औषधियों या विद्युतीय विधियों का प्रयोग करता है, जिससे व्यक्ति की जीवनी शक्ति दब जाती है और उन्माद का दौरा नहीं पड़ता, पर उससे उसकी विकृति नष्ट नहीं होती।

आयुर्वेद एवं तन्त्र के विशेषज्ञों का कहना है कि जब शरीर की वायु, कफ और पित्त की स्वाभविक क्रियाएं अपनी राह छोड़ देती है, तो पागलपन , मिर्गी, उन्माद , हिस्टीरिया आदि रोग उत्पन्न होते है।  इनकी विकृति का बाहरी कारण चाहे जो भी हो।  पर आंतरिक कारण यही है।  जो भी हो; चिकित्सा में बाहरी कारणों को ही अधिक महत्त्व दिया जाता है; जिसका ज्ञान मरीज के परिक्षण से होता है।  आयुर्वेद में इस रोग का केंद्र ह्रदय को माना गया है।  तन्त्र में सम्पूर्ण शरीर के ऊर्जाचक्र में इसकी व्याप्ति मानी गयी है।  हिकमत में इसे दिमाग की बीमारी कहा गया है और यही मत आज के आधुनिक चिकित्सको का भी है।

मानसिक रोग में निम्नलिखित सभी व्याधियाँ आती है –

  1. सामान्य उन्माद – मरीज का व्यवहार सामान्य से अलग, कभी उग्र, कभी सामान्य रहता है और बातचीत में अक्सर बेतुकी बातें करने लगता है। अकारण रोना, हंसना , उत्तेजित, आक्रमक हो जाना अदि इसके लक्षण है।  इसके शिकार स्त्री/पुरुष दोनों होते है और अक्सर यह रोग युवावस्था (21-45) के बीच होता है।
  2. वृद्धों का मतिभ्रम – यह भी लक्षण से ऊपर जैसा ही लगता है , पर यह शरीर केरसों के कुपित होने से नहीं; उसमें शक्ति हीनता के कारण ठीक से प्रवाहित होने की शक्ति का आभाव होता अहि।
  3. स्त्रियों का सामान्य उन्माद – एकाएक स्वभाव परिवर्तन हो जाना, गुमसुम रहना, एकांत और अँधेरे को पसंद करना या उग्र हो जाना, दौरे की तरह क्रोध और प्रतिक्रिया होना, क्रूर हो जाना , काम भाव का नष्ट हो जाना या उग्र हो जाना।
  4. उन्माद – यह पूर्ण पागलपन अहि और इसका प्रभाव एकाएक उभरता है। इसके अनंत रूप है।  यह स्त्री/पुरुष/युवा/वृद्ध किसी को भी हो सकता है।  इसके कुछ रूपों की चर्चा हम पहले कर आये है।
  5. मिर्गी – यह भी तिन-चार प्रकार की होती है। इसमें मरीज एकाएक कांपता है , कभी चिल्लाता है, कभी नहीं भी और शरीर ऐंठने लगते है, झटके लगते है; वह तडपता ऐंठता है और बेहोश हो जाता है।  कभी कभी सीधे गिरकर बेहोश हो जाता है ।  यह मिर्गी के भेद के लक्षण है।  यह स्त्री/पुरुष दोनों को होता है और अक्सर नवयुवाकाल में होता है या जन्मजात होता है।
  6. हिस्टीरिया – यह रोग केवल स्त्रियों को होता है। यह एक विचित्र रोग है।  इसमें स्त्री पर दौरा पड़ता है, तो वह हंसती है , गाती है, रोती है, कोसती है, शाप देती है, दौरे के समय मिर्गी जैसा हालत भी हो सकती है , आक्रामक हो जाती है, फिर 5-10 मिनट के बाद बेहोश  हो जाती है या सीधे नार्मल हो जाती है।  बेहोशी टूटने पर भी नार्मल रहती है।  इसमें निरर्थक या अर्थावाली बकवास करती स्त्री की स्थूल क्रियाओं का भी कोई ठिकाना नहीं होता।
  7. भूत-प्रेत –देव-पितर प्रकोप/खिलाया पिलाया – इन कारणों से भी ऊपर के सभी रोग होते है और आज की चिकित्सा में यह भेद करना कठिन है। इसमें रोगी मिर्गी जैसे के दौरे के पहले कुछ देखता है; हिस्टीरिया के समान रोग में स्त्री के दौरे के समय असामान्य स्थिति रहती है, पर उसमें निरर्थकता नहीं होती यानी ववाह जो बोल रही है , वह कर रही है, वह अर्थहीन नहीं होता।  आवाज बदल जाती है , अपने आपको प्रताड़ित करना, विलाप या शाप में भूत – भविष्य की चर्चा करना , मृतकों को जीवित समझना , उसे किसी के पुकारने की आवाज सुनाई देना।  चीखना-चिल्लाना , राक्षसी प्रवृति , निर्लज्जता उत्पन्न होना होता है।

इसका लक्षण तन्त्र में बताया गया है कि बाहरी प्रकोप में स्त्री के पेट के नीचे से या पेट से  या पैरों के तलवों से या नितम्बों से कुछ ऊपर चढ़ता और सनसनाता सा लगता है, जो धीरे-धीरे ह्रदय को जकड़ लेता है और दौरा पड़ता है वह बेहोश हो जाती अहि , मगर मेरी दृष्टि में यह एक प्रकार का वर्णन है।  आँखों के आंगे आग,धुंआ अपनी ओर उमड़ता हुआ सागर , आंधी , पीला सूरज , लाल चन्द्रमा आदि और इन सब में भयानक या किसी मृतात्मा का चेहरा दिखाई देना और दौरे पड़ना आदि अनेक लक्षण है।

  1. आगंतुक लक्षण – स्त्रियों की ऋतु पर और पुरुषों के पेट पर इसका असर सबसे पहले देखा गया है। ऋतु में कष्ट/गड़बड़ी/अतिरज/अल्परज/कष्टकर ऋतु/अनियमित ऋतु और इसके साथ मानसिक तनाव या बोझिलपन ।  लिकोरिया होना, एकाएक दुर्बल हो जाना, शरीर में दर्द , आदि होने लगे, तो तुरंत परिक्षण करायें।  मेडिकल परिक्षण में कुछ न  निकले, तो चिंतित होना आवश्यक है।  उदर में कब्ज , अतिसार , बहुमूत्र , सिरदर्द , चक्कर, आना सब एकाएक उत्पन्न हो जाए और दवा पर नियंत्रित न हो, तो चिंतित होना  आवश्यक है।
  2. अतिरिक्त अनुभूतियाँ और स्वप्न –जहाँ भी जाए, वहां अपने आसपास बुरी दुर्गन्ध की अनुभूति , मतिभ्रम , अपने अंदर किसी और  के होने की अनुभूति, किसी के साथ चलने की अनुभूति , अपने  बिस्तर में किसी के होने की अनुभूति, बिस्तर में बार-बार कीड़ों के होने की अनुभूति और बार-बार बिस्तर झाड़ना, एक ही प्रकार या भिन्न होने पर भी भयानक –विकृत या भय –घृणा उत्पन्न करने वाले स्वप्न, बार-बार आत्महत्या का विचार , नींद में किसी की आवाज आना या किसी का कहना कि ‘अब तुम मरोगे’ बार –बार श्मसान या परिचित मृतकों का स्वप्न में दिखाई देना।

निदान

इन रोगों का पूर्ण निदान परिक्षण के बाद तन्त्र क्रिया से ही होता है, परन्तु निम्नलिखित लाभाकारी है-

  1. प्रातःकाल बेलपत्र का शर्बत , रात्रि में नौ बजे के लगभग ‘खुरासानी अजमाइन 2 ग्राम , पीसी हुई भाँग की पत्ती पीसी हुई ¼ ग्राम , सेंधानमक  1 ग्राम – गर्म पानी के साथ।

एक मस्तिष्क को ठंडा करता है, दूसरी नींद लाता है।  यह दोनों उपचार सभी मानसिक रोगों में लाभदायक होता है।

वर्जना – मिर्गी , हिस्टीरिया में खुरासानी अजमाइन और भांग का प्रयोग वर्जित है।  बेलपत्र दे सकते है।

  1. मिर्गी या हिस्टीरिया का दौरा पड़े , रोगी बेहोश हो जाए; तो अमोनिया सुंघाए। कम मात्रा में।

घरेलू अमोनिया बनाने का नुस्खा – नौसादर – 2 भाग , कली चूना – 1 भाग – मिलाकर एक शीशी में एयर टाइट डॉट लगाकर बंद रखें।  दौरा होने पर 1 ग्राम के लगभग हथेली पर रखकर तीन बूँद पानी डालें और हथेलियों को रगड़कर मूर्छित रोगी के नाक के पास सुंघाए।  वह तुरंत  होश में आ  जायेगा।

  1. 25 ग्राम पेठे के बीजों की गिरी रातभर पानी में भिंगोकर प्रातः पीसकर 6 ग्राम शहद के साथ खली पेट पिलाएं । तन्त्र में कहा गया है कि लगातार इसके प्रयोग से मानसिक रोग ठीक हो जाते है। (45 दिन)
  2. शुद्ध सरसों के तेल को चिल्लू में लेकर ‘ॐ क्रीं क्रीं क्रीं क्लीं क्लीं क्लीं फट स्वाहा’ मंत्र पढ़ते हुए उन्माद रोगी के सिर पर डालते रहें और मालिश करते रहे। इसे कानों , नाक, आंख में भी डालें, पर तब जब सारा शरीर इस तेल से नहा जाये।  उसे मालिश करते हुए कम्बल या सूती चादर लपेटकर धूप में दो घंटे लिटा दें।  रोगी भागता है, इसलिए बंधन लगा दें।

तन्त्र के अनुसार इससे उन्माद रोग नष्ट हो जाता है; पर मिर्गी या हिस्टीरिया में इसका प्रयोग न करें।  इन रोगों में विशेषज्ञ ही इनका प्रयोग कर सकते है।  उन्माद के दर्जनों रूप होते है।  मिर्गी की 6 किस्में होती है।  हिस्टीरिया के दर्जनों रूप होते है।  ऊपरी प्रकोप के अनंत रूप होते है।  इनसे ग्रसित हैं, तो हमसे निःशुल्क सलाह ले सकते है।

सम्पर्क करें – 08090147878

Email- info@dharmalay.com

 

 

4 thoughts on “मानसिक रोग और उसके कारण (किया-कराया सहित)

    1. 18 साल बहुत लम्बा समय होता है .क्रॉनिक मामले में बहुत जानकारी चाहिये और सावधानी भी .बच्ची की उम्र क्याहै और दौरे किस प्रकार के होते हैं ? लक्छण के साथ ईमेल.करें . तस्वीर ,जिसमें आॉखेंचेहरे के साथ स्पष्ट हों क्या.वह शादी शुदा है? हाँ तो कब से ? शादी के बाद.और पहले की स्थिति .

    1. हमारे यहाँ सॆ सलाह पाने के लिये मेडिकल शब्द नहीं चलेंगे .पूरा डिटेल लक्छन भेजना होगा कि क्या क्या तकलीफ या समस्यायें होती हैं ,बताना होगा .

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