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मानसिक एकाग्रता की साधना

नाक के ऊपर तिलक लगाने की जगह पर केसर और श्वेतार के दूध को मिलाकर-पीसकर तिलक लगाये . या वहां लाल चन्दन का तिलक लगाये । ब्रह्ममुहूर्त मे या रात्री नौ बजे के बाद किसी साफ़ और खुले स्थान में जहाँ हवा का आना जाना हो पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे , सुखाकन में बैठकर दोनों हाथ घुटनों पर रखें। रीढ़ और गर्दन की हड्डी को सीधा रखें। नाक की नोक को देखे , तिलक के साथ पर दबाब महसूस होगा । उसी मुद्रा में आँख को बंद करें और जहाँ दबाब महसूस होता हैं। वहां मानसिक रूप से एक ज्योतिर्मय (प्रज्वलित) बिंदु की कल्पना करें कि वह वहां हैं , पूरी मानसिक शक्ति उस बिंदु को देखने में लगा दें; जो अँधेरे में छुपा हुआ है। हफ्ते भर के प्रयत्न के बाद वह बिंदु प्रकट होता है और बिजली की तरह चमकते हुए इधर उधर भागता हैं ।आप अपने स्थान पर यानि तिलक के साथ पर मानसिक शक्ति केन्द्रित करें उसे वही पर देखने का प्रत्यन करते रहे। उसके साथ भागे नहीं! कुछ दिनों में यह बिंदु स्थिर हो जाता है , फिर यह बड़ा भी हो जाता हैं। और फिर प्रत्यन करने और मानसिक बल लगाने से यह बड़ा होने लगता है।फिर इसके प्रकाश से चारों ओर प्रकाश फ़ैल जाता है। यह पहला स्टेप हैं , इसे त्राटक कहा जाता है।

 

अन्य ज़रूरी बातें –

प्रारंभ में इसे दो-तीन मिनट से अधिक न करें। सिर के चाँद, दोनों कान, नाभि और गुदा मार्ग इसमें शुद्ध सरसों का तेल रात में डाले, सुबह धो लें। कान में डालने वाला तेल गर्म करके फिर ठंडा करके सहन करने लायक गर्म हो ऐसा डाले। कभी इसमें ठंडा या बहुत गर्म तेल न डाले। खाने पीने में बहुत ज्यादा तेल मसाला , मासं , नशा प्रारंभिक चरण में वर्जित हैं।सुपाच्च खाना खाए।

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