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महालक्ष्मी की गुप्त तंत्रसाधना (सम्पूर्ण विधि प्रक्रिया और गुरु निर्देश)

महालक्ष्मी को तंत्र में कमला कहा जाता है . यह मणिपुर चक्र की देवी है ,जो नाभि के मूल में रीढ़ की हड्डी में होता है .यहाँ सभी ध्यान नहीं लगा सकते ,इसलिए योगी गण नाभि के मध्य ध्यान लगाते हैं . मगर तंत्र में इसकी भी आवश्यकता नहीं होती .केवल रूपध्यान से ही सरल प्रकार से सिद्धि हो जाती है .महालक्ष्मी मूल रूप से तंत्र की देवी हैं .इसमें इन्हें राजराजेश्वर शिव की परमेश्वरी माना जाता है .अन्य मार्गों में इसे ही परिवर्तित किया गया है .

कमला का तंत्र रहस्य === यह मणिपूर चक्र की शक्ति है ,जो नारंगी रंग की ऊर्जा का उत्पादन करती है ,पर यह इसे सीधे शरीर को नहीं देती,अनाहत चक्र को आपूरित कर देती है . फलत : इसमें अन्दर की ओर खिंचाव होता है .यह बहार की ऊर्जा को अन्दर खींचती है .इसी से हमारी नाभि में भंवर होता है . अनाहत सूर्य है ..इसके मध्य आत्मा यानी जीव है . यही विष्णु ,राजराजेश्वर शिव है .शरीर क्षीरसागर है और पूंछ से सर की कोशिकाओं तक केवल रीढ़ की हड्डी सहित लिया जाय ,तो शेषनाग है.इसी के मध्य अनाहत में विष्णु हैं और उनके नीचे यानी चरणों में महालक्ष्मी का यह चक्र है ..किसी मूर्ख चित्रकार ने इसी गुप्त वर्णन को न समझने के कारण ,जो चित्र बना दिया है ,उस भ्रम में न पड़ें .

पहला स्टेप ====सभी तंत्र साधना में शरीर का स्वस्थ रहना ,आवश्यक है . इसके बाद जगह चुने .एकांत कमरा , जो हवादार हो या बरगद के बृक्ष के नीचे या श्मसान .सभी के अपने अपने लाभ =हानि  हैं .श्मसान भय , बरगद के नीचे उस पर रहने वाले इतर प्राणियों का भय होता है ;पैर सिध्दी के समय मानसिक बल आधिक होता है . कोई गृहस्थ करना चाहे ,तो कमरा ही उपुक्त है . पर वह आसपास हरियाली से युक्त होना चाहिए . कच्ची मिटटी का फर्श हो ,तो अच्छा है .इसे गोबर से लीप दें .पक्का हो तो धो कर घी और कपूर की धुनी दें .शुक्ल या कृष्ण ५ ,९ ,१४ तिथि के दिन में उत्तर की ओर मुख करके पीले या नारंगी रंग का सूती आसन स्थपित करके ,उसके सामने यंत्र स्थापित करें . यंत्र के आगे यानि उत्तर में पीतल या कांसे की थाल में पीली मिटटी या साफ़ मिटटी की ९ अंगुल ऊँचा ६ अंगुल चौडा पिंडी बनायें .इसे सिन्दूर से अभिषेक करके चुन्नर ओढा दें .

दूसरा स्टेप ===रत के ८ बजे देवी के सामने घी का दीपक जलाएं और” हूं अस्त्राय फट” मन्त्र से आसन,फर्श ,दिशा ,छत को अभिमत्रित करें ..इससे पूर्व स्नान का मन्त्र भी यही है .आसन पर बैठ कर ध्यान लगा कर कल्पना करें की सर के चाँद से उज्वल उर्जा की धरा गिरती बहती सारे शरीर को अन्दर से धोती जा रही है .इस समय” हर हर गंगे ” मन्त्र का जप करें .५ मिनट .

तीसरा स्टेप ===पिंडी में देवी के रूप का आवाहन करें .तब तक ,जब तक उसमें देवी साकार अनुभूत नहीं होने लगे .इसमें कई दिन लग जाते हैं .

चौथा स्टेप ===उसी रूप पर ध्यान लगा कर मूल मन्त्र का जप तब तक करें ,जब तक देवी सजीव न हो जाय .

यंत्र ===षडकोणों के बीच विन्दु ,वृत्त ,वृत्त पर अष्टदल ,फिर चतुरस्त्र चार द्वारों वाला . लेखन स्याही जिमीकंद,कमलकी पत्तियों का रस ,केले का रस ,दालचीनी ,में पीला, नारंगी ,लाल रंग .२१०० मूल मन्त्र से सिद्ध करें .यह अलग प्रक्रिया है .

मूलमत्र ==ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ,ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्मी क्लीन ह्रीं श्रीं फट स्वहा [अन्य कई मन्त्र हैं ] जप संख्या २००,००० . प्रतिदिन की संख्या सामर्थ्य के अनुसार .

हवंन === कमल के फूल ,छाग के मांस ,घी, दही ,दूध, खीर ,धन का लावा ,डूब ,अनार के फूल आदि . आभाव में मानसिक हवन करें .

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