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क्या है यह मायाजाल?

प्रकृति का मायाजाल

महर्षि कपिल से लेकर शंकराचार्य ने कहा है कि यह महामायावानी प्रकृति ‘परमात्मा’ की ‘योगमाया’ से उत्पन्न एक माया-मारीचिका है। यह मनुष्य को जिस रूप में दिखाई देती है, उस रूप में मच्छर को दिखाई नहीं देती। जिस रूप में यह हाथी को अनुभूत होती है, उस रूप में मछली को अनुभूत नहीं होती। ‘जीव’ की अनुभूतियों का कारण उसकी इन्द्रियों द्वारा भेजे जा रहे सिग्नल (संकेत) पर निर्भर करते हैं और प्रत्येक ‘जीव’ में इनकी शक्तियों का समीकरण भिन्न भिन्न होता है।

इस तरह सभी की अनुभूतियों का जगत भिन्न-भिन्न हो जाता है। यह एक ही ‘ब्रह्माण्ड’ अलग-अलग जीवों को अलग अलग रूप में अनुभूत होता है, जबकि वास्तविकता यह है कि इनमे से कोई भी इसका असली रूप नहीं है।

जो सत्य को जानता है उसपर इस प्रकृति का मायाविनी जादू नहीं चलता और इसका प्रत्येक रहस्य उसके सामने आ जाता है। जब यह रहस्य सामने आता है तो वह हतप्रभ रह जाता है; क्योंकि इस जगत का वास्तविक रहस्य शून्य है।

वह परमात्मा है जो इसमें रूप बदल-बदल कर तमाशा दिखा रहा है। न कुछ बं रहा है और न ही कुछ बिगड़ रहा है, यह तो उस ‘परम्सार’ तत्व की धाराओं से बनी एक मृग-मरीचिका है, जो केवल ‘जीवों’ की अनुभूति में आती है।

आप देखेंगे की महर्षि कपिल का ‘सांख्य दर्शन’ भी यही है और लगभग यही उपदेश उन्होंने अपने माता-पिता को दिया था। यही सत्य श्री-कृष्ण की गीता में उद्भासित हो रहा है और यही सभी वेदों, उपनिषदों एवं पुरानों का सार तत्व है। शंकराचार्य ने भी यह कहा है और कबीर ने भी कहा है –

माया महाठगिनी हम जानि।

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