आप यहाँ हैं
धर्मालय > Uncategorized > महाकाल मार्ग में भैरवी युक्त महाकाली साधना

महाकाल मार्ग में भैरवी युक्त महाकाली साधना

एक विशेष बात ध्यान में रखना चाहिए कि तन्त्र का चाहे वाममार्ग हो या दक्षिण मार्ग, योग हो या पूजा क्रम – सभी में सर्वप्रथम मूलाधार की इस महाकाली को ही सिद्ध किया जाता है, जो मूलाधार के श्याम  शिवलिंग की  शक्ति है और ये खुनी लाल रंग की अपनी तरंगों का उत्सर्जन करती है। इससे रक्त, रक्त से मांस – मज्जा-हड्डी-बाल और नखों की शक्ति उत्पन्न होती है  इन सबका भक्षण करने वाली भी यही देवी है; इसलिए इन्हें इन पदार्थों से लिप्त और आभूषित रूप में ध्यान लगाया जाता है। यह विकराल शक्ति है। जब यह जागती है, तो मस्तिष्क इसके पैरों के नीचे चला जाता है और खोपड़ी का कोई महत्त्व ही नहीं रहता। इसलिए इन्हें नरमुंडों की माला से सवित रूधिर पीते स्वरुप में ध्यान किया जाताहै। शास्त्रीय कहानी कुछ और है; पर वे रूपक है। रक्तबीज आज भी हमारे अंदर है, संसार – प्रकृति में व्याप्त है।

 

सामान्यतया काली के नौ भेद माने जाते है। (बहुत से मार्ग में 13, 17, 23, 28 रूपों की स्थिति मानी जाती है; पर यह भिन्न –भिन्न मान्यताओं पर शरीर केअन्य चक्रों की भी गिनती हो जाती है। ऐसे तो अनंत है । इन्हें सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता; पर मुख्य धुरी में इसके मुख्य नौ ही वर्गीकरण माने जाते है – दक्षिण काली, भद्र काली, शमसान काली, काल काली, गुह्य काली, काम कला काली, धन काली, सिद्धि काली, चंडकाली। महाकाल संहिता में इन्ही नों रूपों का वर्गीकरण किया गया है। यह ग्रन्थ नेपाल के राजकीय लाइब्रेरी और जर्मनी के राष्ट्रीय संग्रहालय में है; ऐसा कई देशी-विदेशी खोज कर्त्ताओं का मानना है। इसके विवरण हमें आसाम में कामख्या के एक साधक से प्राप्त हुए थे, जो वास्तव में महाकाल के साधक थे।

मन्त्र भेद, ध्यान भेद, पूजा भेद , विधि भेद से गुह्य काली ही कामकला काली एवं अन्य रूपों में परिवर्तित हो जाती है। कामकाली सोलह कलाओं की है। इनका मंत्र भी सोलह अक्षरों का होता है । सम्पूर्ण श्री चक्र में व्याप्त देवी सोलह कलाओं की होती है। इन सबकी  मुख्य आधार शक्ति श्री चक्र या भैरवी चक्र  ही होती है। इसी तरह सभी काली रूपों में काम कला काली ही प्रमुख मानी जाती है । इन्हें के मन्त्र को त्रैलोक्या कर्षण मन्त्र कहा जाता है।

( जो भी विद्वान् बुद्धिमान जिज्ञासु इनके शास्त्रीय प्रमाण की इच्छा रखते हो; वे संस्कृत ग्रन्थ ‘तंत्रोक्त रावण संहिता; D.P.B. पब्लिकेशन , चावड़ी बाज़ार , डेल्ही 6  से सम्पर्क करें । इसमें तन्त्र की सैकड़ों देवियों की साधना, माला, कुंद, ज=हवन आदि के गुप्त और विशिष्ट विवरण , हजारों मन्त्र, दव, अर्क, कायाकल्प आदि मिलेंगे; जो प्राचीन और गुप्त है। यह संस्कृत में है। अर्थ और वैज्ञानिक विश्लेषण मेरे है)

 

यंत्र का स्वरुप

चार भुजाओं वाले दोहरी लकीरों से युक्त भूपर में अष्टदल कमल बनाकर उसकी कर्णिका में तीन त्रिकोणों की रचना की जाती है।

इसमें तीनों एक के ऊपर एक अद्योगामी होते है। बीच में बिंदु होता है। रत्न की रचना में चावल का आटा, सिन्दूर, कुमकुम , पंच रंगा, का प्रयोग किया जाता है। इसे स्वयं अपने रक्त से भी बनाया जाता है, पर यह यंत्र कागज़ पर बनता है और विशेष कार्यों के लिए होता है । बायें कोण में मायाबीज ‘ह्रीं’ दायें कोण पर क्रोध बीज ‘हूँ’। नीचे प्राश ‘आं’ एवं मध्य में ‘क्लीं’ लिखा जाता है।

पूजा विधि

सर्वप्रथम भूतशुद्धि , फिर न्यास की प्रक्रिया करके इस यंत्र के सामने बहिरावी को बैठा कर उसे चक्र का पीठ मानकर पीठ्न्यास करके , स्वयं अपना करांग न्यास किया जाता है। इसके बाद यन्त्रस्थ देवी की पूजा की जाती है। तीन त्रिकोणों में जो दो खाली स्थान के त्रिकोण बनते है; उनमें बाहर बायें दायें , नीचे क्रम में संहारिणी , भीषणा एवं मोहिनी की , अंदर कुरुकुल्ला , कपालिनी, विप्रचिता की पूजा की जाती है।

अंदर के त्रिकोण के अंदर बाएँ कोण पर गौरी, कमला, माहेश्वरी, दाई और चामुंडा , कौमारी, अपराजिता . नीचे वाराही , मार सिंही की पूजा की जाती है।

इन सभी देवियों का रंग सांवला है, इनके एक हाथ में कपाल में मध है। ये हाथों में खड्ग लिए है और मुंडमालाओं से सुसज्जित हैं। ये मद पान करती है तर्जनी ऊपर उठाये नृत्य कर रही है।

विशेष विश्लेष्ण

यहाँ देवियों का जो रूप है; उस में मुंड माला पहने कपल धारिणी कमला, गौरी, शची का ध्यान लगाना मुश्किल है। सांस्कारिक रूप से ये देवियाँ हमारे मानसिक जगत में इसे विपरीत रूप में अवस्थित हैं। यह वस्तुतः अपमिश्रण है। इस सम्बन्ध में उस साधक का कहना था कि उन्हें एक अघोरी ने उसे बताया कि कमला का शस्त्रीय रूप अनेक है। गौरी आदि का भी। संस्कार बाधा होने पर गौरी की जगह काल भैरवी और शची की जगह साकिनी का ध्यान करके उन्ही की पूजा करें।

भाव, विपरीत त्रुटियाँ सम्पूर्ण तन्त्र संसार में फैली हुई है। ये जोड़-तोड़ के नतीजे है । वास्तव में प्राचीन रूप वर्णन चाहे किसी देवी का हो, इतना भयानक है कि सामान्य साधक ध्यान में ही डॉ जाए।

परिवर्त्तन और नयी सोच जरूरी है , पर वह मूलभूत आधारभावों के साथ नहीं हो सकता । सफलता नहीं मिलेगी।बुद्ध को विष्णु अवतार मानना हमारी उदारता हो सकती है; पर दोनों के भाव में अंतर है। एक ही साधना से दूसरे को सिद्ध नहीं किया जा सकता।

चक्र के कमल के आठों दल में आठों भैरव की पूजा होती है} इनके नाम – असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, कापालिक, भीषण एवं सम्मोहन है। ये सभी दो भुजाओं वाले काले भयानक रूपवाले, खप्पर कैंची धारण किये हुए है।

आठों दलों के बीच में – एक पाद , विरूपाक्ष, भीम, संकर्षण, चंड घंट , बेगमाली एवं प्रकम्पन – इन क्षेत्रपालों की पूजा करनी चाहिए। ये भी विकृत मुखवाले, भयानक और अपने अपने क्षेत्र की रक्षा में मुस्तैद बाहर की ओर मुख  किये खड़ा है।

दलों की नोक पर आठों योगिनियों – उल्कामुखी, कोटराक्षी , विद्युत् जिहना, करा लीनी , वज्रोदरी , तापिनी, ज्वाला एवं जालंधरी है। ये सभी चिल्लाने के भाव में मुंह खोले, भयानक शब्द करती जीभ लपलपा रही है। इसके हाथों में कपाल और खड्ग है और इन में मांस , रक्त, बसा, मज्जा , नसे आदि भरी है।इनसे इनका मुंह भी भरा है।

सबसे बाहर दस लोकपालों की पूजा होती है। इन्हें दिकपाल भी कहाजाता है। ये दशों दिशाओं में अस्त्र लिए तैनात है।

सबसे पहले मध्य में कामकला काली का आवाहन, पूजा, होती है। इसके बाद त्रिकोणों की अंदर के क्रम से , फिर बाहर के दो रिक्तों में एक-एक करके, फिर कमला दल मध्य , फिर म्क्ला दल के मध्य रिक्त, फिर मकाल दल अग्र भाग, फिर दिकपाल ।

यह सृष्टि क्रम है। संहार क्रम बाहर से भीतर की ओर होता है। भौतिक स्वरुप में सृष्टि क्रम, मोक्ष ज्ञान आदि के लिए संहार क्रम की पूजा की जाती है। प्रत्येक  देवी-देवता की पूजा तीन –तीन बार करने का निर्देश है ।

4 thoughts on “महाकाल मार्ग में भैरवी युक्त महाकाली साधना

  1. मे ५ साल से यु .एस. ए. में रहता हु ..पैसा को लेकर बहोत प्रॉब्लम है ..कोई ऐेसा मंत्र हो जो लॉटरी से आकष्मीक धन प्राप्ति हो …आप का बहोत आभारी रहू गा…..

Leave a Reply

Top