महाकाल का स्वरुप

 

महाकाल के साधक इनके स्वरुप की कई रूपों में कल्पना करते हैं। यहाँ ‘कल्पना’ शब्द पर चौकने की जरूरत नहीं है। सभी मार्गों, सभी पंथों में जितनी शक्तियों की साधना होती है; उनके ध्यान रूपों का वर्णन करते हुए उनके आचार्यों ने कल्पना की जाती है- ही लिखा है। सभी ने कहा है कि अमूर्त शक्तियों का कोई रूप नहीं होता। उनकी शक्ति और भाव के अनुरूप उनके रूप की कल्पना करके उसमें ध्यान लगया जाता है।

परन्तु, सदाशिव से उत्पन्न आद्या शिवा के गर्भ से उत्पन्न महाकाल का एक स्वरुप है। यद्यपि इस स्वरुप का लोग ध्यान नहीं लगाते’ पर किसी न किसी रूप में इसे पूजते है। ऋग्वेद का ‘पुरुष’ यही है।  उसकी व्याख्या ही बता देती है कि यह किसके बारे में कहा गया है। यद्यपि यहाँ महाकाल की चर्चा नहीं है; पर यह केवल मार्ग भेद का अन्तर है। ये दोनों एकही संरचना के वर्णन है। गीता में श्रीकृष्ण के जिस विराट वरूप को दिखाया गया है, वह वैदिक पुरुष का रूप है। उस ‘ईश्वर’ का रूप, जो ‘ब्रह्म’ भी कहलाता है। यहाँ एक सामान्य भ्रम के बारे में जानना है कि ‘ईश्वर’, ‘ब्रह्म’,’शिव’, ‘अर्द्धनारीश्वर तो एक ही संरचना के नाम है।यही पुरुष और महाकाल भी है; परन्तु यह परमात्मा, पर ब्रह्म, सदाशिव, तत्त्व (उपनिषदों का) नहीं है। ‘तत्त्व’ (0) एक अभौतिक और शाश्वत अस्तित्त्व है; जो एक विलक्षण तत्त्व के रूप में अनंत तक व्याप्त है। यह परमतेजोमय , विरल , सर्व चैतन्य, अदभुत तत्त्व है।हमारे ऋषियों आचार्यों ने कहा है कि यह एक विचित्र तत्त्व है। हम कैसे इसका वर्णन करें; उस जैसा इस ब्रह्माण्ड के कुछ भी नहीं है। शब्द, ध्वनि, प्रकाश भी उसी से उत्पन्न होते है;  ये उससे स्थूल है, ये कैसे उस परमसार (मूल तत्त्व) का वर्णन करें।

 दूसरी ओर ईश्वर, महाकाल, ब्रह्म की एक आकृति है, एक स्वरुप, उसका भौतिक अस्तित्त्व है। वह एक पॉवर-सर्किट के रूप में है। भले ही यह उस परमात्मा की ही धाराओं से बना सर्किट है और इसका अपना  स्वरुप सत्य नहीं है; पर यह एक आकृति, एक संरचना बनाता है और उस संरचना में अनंत प्रकार की शक्तियों, लोकों, जीवों, देवी-देवताओं  को उत्पन्न कर रहा है। यह अदभुत है, भयानक है; पर इसकी दया का सागर कहीं उससे बड़ा है,क्योंकि यह सभी जीवों को उत्पन्न करनेवाला , पालन करनेवाला और संहार करनेवाला है। यही अनंत विस्तार एवं अनन्त लोकों को धारण करनेवाला ‘पुरुष’ ईश्वर है और यही ‘महाकाल’ है, जो सदाशिव परमात्मा से उत्पन्न उन्ही का प्रयत्क्ष भौतिक रूप है।

आश्चर्य की बात है कि हमने कभी सनातन विज्ञान के रहस्यों को जानने की कोशिश नहीं की। कभी समझने की कोशिश नहीं कि हमारे जादुई अतीत में वास्तव में क्या कहा गया है। बीएस अंधी आस्था-अंधी-आस्था का राग और यूरोपियन आकाओं की मानसिक गुलामी। फिर हमें कैसे पता चलता कि  हमारे बाप ने हमें क्या कहा था और क्या दिया था?

महाकाल के जिस रूप का ध्यान किया जाता है; उसमें शरीर में भभूत लगाये, सर्पों की मालाओं से आभूषित नर्त्तन करते रौद्र रूप का है’ जिसके अनंत मुख है और उनसे अग्नि की लपटों में सारा लोक-परलोक लीन होता जा रहा है।

 

आंतरिक संरचनाओं का स्वरुप  

महाकाल के धार्मिक स्वरुप में इनके शरीर में 14 भुवनों, अनंत लोको और सभी देवी-देवता, भूत-प्रेत, गंधर्व-किन्नर को स्थित कल्पना करनी चाहिए।इसमें क्रमबद्धता है सभी भुवनों, लोकों, शक्तियों का स्थान निश्चित है। इसका निर्धारण उस पॉवर-सर्किट की संरचना के आधार पर किया गया है, जो सनातन नियमों एवं क्रियाओं के क्रमबद्ध व्यवस्था से उत्पन्न होता है और उन्ही से शासित है। इस महाकाल पर भी वही नियम लागू है। और यह बाध्य है कि उन नियमों से ही सृष्टि का विस्तार एवं संचालन करे। इन नियमों से परे जाने की अनुभूति इसे भी नहीं है। इन नियमों को उत्पन्न करनेवाला यह नहीं है, वे सदाशिव परमात्मा या उपनिषदों के ‘तत्त्व’ से उत्पन्न होते है और जब महाकाल का लोप हो जाता है , तो नियम भी सदाशिव में समाहित हो जाते है। यदि फिर इनकी उत्पत्ति होती अहि, तो फिर से वे ही नियम एक-एक कर आने लगते है और ये उन्ही नियमों  से शासित हो जाते है। इन्ही नियमों को सनातनधर्म कहते है, जो शाश्वत हैं; कभी नष्ट नहीं होते ।

वैदिक मार्ग का पुरुष भी इसी प्रकार भुवनो, लोकों, क्षेत्रों में बंटा हुआ है।इसी की धूरी के डंडे पर समस्त मुख्य देव चक्र स्थित है। इसके अनंत पाद (पैर/पूंछ) है और इनमें देव-असुर लीन होते जाते है। इसके मध्य में  इसकी मुख्य केंद्रीय शक्ति इसका नाभिक स्थित है। यह सम्पूर्ण भौतिक अस्तित्त्व का सूर्य है। इसे ही वैदिक मार्ग में भगवान् विष्णु कहा जाता है। इसके मध्य केंद्र पर एक नन्हा सा परमाणु होता है, जो इस महाबली ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए है। यह एक ओर नेगेटिव, दूसरी ओर पॉजिटिव को कण्ट्रोल कर रहा है और इसकी शक्ति का एक रूप इसके सिर पर प्रभावी है, जिससे इसका स्वरुप क्रियाशील है। इस मुख्य धुरी के महासर्प को ही शेष नाग कहा जाता है।

देवी मार्ग में इस महाकाल की संरचना को महामाया, के साथ-साथ नित्या दुर्गा, महाकाली आदि अनेक रूपों में जाना जाता है। यही महाभैरवी भी है।

आधुनिक शब्दों में यह ब्रह्माण्ड है, जिसे वैदिक ऋषियों ने प्रकृति कहकर संबोधित किया है। इसकी संरचना के सम्बन्ध में जो कुछ बताया गया है; वह मैंने ध्यान में तो देखा ही है; प्रत्यक्ष परिक्षण भी किये हैं। इसमें एक सूत्र काम देता है – ‘जो ब्रह्माण्ड है, वही इसकी इकाई है’ – यानी संरचना सहित समस्त नियम और क्रिया सभी वही है। …….. और सत्य चौकाने वाला, रोमांचित करने वाला है। आँखों मेंआंसू लाने वाला है। मैं  नहीं जानता कि मेरे आंसू क्यों निकले? आश्चर्यजनक सत्य को सामने देख कर या अपनी कृतहनता  पर जो हमने अपने पूर्वजों के प्रति की है।

 

1 thought on “महाकाल का स्वरुप

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *