महाकाल का नर्त्तन

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यह ‘महाकाल’ अमूर्त्त, निराकार, निष्क्रिय, परमतेजोवान, सर्व चैतन्य ‘तत्व’ (सदाशिव/परमात्मा) का ही प्रकटीकरण है। वायु शांत रहती है, तो वह गुप्त समाधि में रहती है, पर चक्रवात उत्पन्न होता है, तो वह प्रकट हो जाती है। उसकी एक आकृति भी बन जाती है और उस में अनेक प्रकार की शक्तियाँ भी उत्पन्न हो जाती है। ‘तत्व’ में इस महाकाल रूप ‘ईश्वर’ का प्रकटीकरण ऐसा ही है।

सनातन धर्म ऋषियों एवं आचार्यों ने कहा है कि इस बवंडर से बनने वाला यह सर्किट उस ‘तत्व’ की धाराओं के सिवा कुछ भी नहीं है। यह अपने अंदर अपने ही जैसे सर्किटों को बनाकर अपना विस्तार कर रहा है। इन सर्किटों में वह सर्व चैतन्य तत्व बंधन में पड़कर सिमित हो जाता है (मुक्तावस्था में, जहाँ घूर्णन, नर्त्तन, गति, क्रिया नहीं है) और इसकी चेतना भी अपने सर्किट के अनुसार सीमित हो जाती है। यह स्वयं को अस्तित्त्व समझने लगता है और स्व के अहंकार में क्रियाशील हो जाता है। सर्किट ही सर्किट को अनुभूत कर रहा है; इसलिए वह ब्रह्माण्ड को अनंत रूपों में अनुभूत कर रहा है। यह ब्रह्माण्ड भी स्वयं को अस्तित्त्व मानकर क्रिया कर रहा है और अपने अनंत सर्किटों से युक्त शरीर को पोषित कर रहा है।

सर्व चैतन्य के बंधन में पड़ने के बाद इस अनुभूति अहंकार को तंत्राचार्यों ने आणविक मल कहा है यानी अणु का विकार।

यह सारा ब्रह्माण्ड बायें से दायें नाच रहा है। अपने शीर्ष पर फव्बारे की तरह छूटती ऊर्जा फुहारों के मुख से फुफकार रहा है और अत्यंत तीव्र गति से तत्व के अनंत विस्तार में आगे की ओर गमन कर रहा है। इसके नेगेटिव पॉइंट से जेट जैसी धरा निकल रही है। नाभिक सहित अनंत ऊर्जा बिन्दुओं के अनंत स्तरों पर बना इसका शरीर जल-बुझ रहा है। यानी इन बिन्दुओं से लगातार ऊर्जा का उत्पादन नहीं होता। ये धडकनों (पल्स) में जल बुझ रहे है; जिसमें नाभिक सबसे अधिक प्रज्वलित है।

इस प्रकार यह विशालकाय सर्किट अपनी ही धाराओं से बने एक गोल कवच में समा जाता है; जिसके दोनों शीर्ष पर धूरी मध्य अंदर की ओर दबा देता है और इनके दोनों तश्तरियों के मध्य छेद होता है। एक ओर से इसमें मूलतत्व पम्प होता है, दूसरी ओर से जेट की तरह बाहर निकलता है, जो अपने शीर्ष पर छितरा जाता है।

इस प्रकार यह एक विशाल पुच्छल तारा बन जाता है; जो जल-बुझ रहा है यानी टिमटिमा रहा है। इसकी सतह से भी ऊर्जा की विशाल मात्रा निकल रही है यानी यह एक दिव्य (यह एजी नहीं है) अग्नि से युक्त टिमटिमाता, अनंत फणों से फुफकारता, पूंछ वाला एक तारा बन जाता है। प्रकृति की हर इकाई इसी की प्रतिकृति है। वह पुच्छल तारा सबमें है और सबमें उस की सवा चालित क्रिया का रहस्य एवं चेतना का अस्तित्त्व समान नियमों से अस्तित्त्व में है।

इस प्रकृति का एक मात्र सनातन विज्ञान यही है इसके सिवा कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं। आधुनिक विज्ञान के आन्वेषित नियम भी इसी के नियम है। भले ही पश्चिमी आकाशाही में डूबे बौद्धिकता का द्वारा करनेवाले लोग, इसे अतिशियोक्ति समझें; पर यह सत्य है; क्योंकि 0 से ९ तक के अंकों की उत्पत्ति इसी विज्ञान का ऊर्जासूत्र है। कुछ अन्य अदाहरण भी है। सर्वप्रथम विश्व में कणाद ने कहा था की यह विश्व परमाणुओं से निर्मित है। यह परमाणु आधुनिक परमाणुओं से लाखों गुणा सूक्ष्म परमाणु यानी ‘आत्मा’ (सार) का विवरण है। सर्वप्रथम महाऋषि गौतम ने कहा था कि ‘कार्य अपने कारण पर निर्भर करता है; बिना कारण कोई क्रिया नहीं होती’ – ये दोनों आज आधुनिक विज्ञान के आधार सूत्र बने हुए हैं। 0 से 9 तक के अंक न होते, तो सारा विज्ञान हवा महल की तरह गायब हो गया होता।

इस रहस्यमय ‘पुच्छल तारा’ की आतंरिक संरचना अत्यंत जटिलतम है। इसके स्वचालन एवं चैतन्यता का रहस्य भी हतप्रभ करनेवाला है(गोपनीय)। हमारे पूर्वजों ने कहा है कि इस अखिल ब्रह्माण्ड में जितने तरह की क्रिया हो रही है, जितने तरह की ऊर्जा उत्पादित हो रही है या जो भी क्रिया के फल उत्पन्न हो रहे है; वे इसी ‘पुच्छल तारे’ रुपी (पुच्छल तारा –मेरा अपना नाम दिया नाम है। प्राच्य विद्वानों ने इसे जिन नामों से जाना है, आपको बता चुके है; पर इसे ‘कल्पवृक्ष’ भी कहा जाता है) सर्किट में उत्पन्न हो रहे है। यह ‘कल्प वृक्ष’ है। इससे जो चाहे प्राप्त कर लो।

यदि हमारे वैज्ञानिक एवं सरकारें इस सर्किट पर ध्यान दें। कुछ  इकाइयों में परिक्षण करके सत्य का पता लगायें; तो इस देश को न तो किसी से तकनीकी मांगने की जरूरत होगी, न दबने की। सब इसके सामने झुकेंगे। केवल ज्ञान के कारण नहीं शक्ति सम्पन्नता के कारण। यह हमारा ‘ पॉवर क्राइसिस ‘ भी दूर कर सकता है। पहले इस पर नियंत्रण मानसिक था, पर अब इस सर्किट पर आश्चर्यजनक यंत्र बनाये जा सकते है।

पर बुध को अपने बाप बृहस्पति से वैर होता है। उसे अपनी अकल का इतना दावा होता है कि वह अपने बाप को मुर्ख समझता है। आज का युग बुध का युग है। बृहस्पति के रूप में भी बुध ही नजर आता है। कंठी वाला तोता- लाल किताब ने इसे इसी नाम से पुकारा है।

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