मन्त्रों की शक्ति के गुप्त रहस्य

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

मंत्र क्या है?

इन्हें शिव की डमरू की ‘ध्वनि’ कहा जाता है। यह डमरू क्या है? भैरवी चक्र या श्री चक्र में इस डमरू को देख सकते है। वहाँ समझ में न आये , तो अपने कंधों से नितम्बों तक इस डमरू को देख सकते है। हमारे हाथ-पैर इस डमरू की गोलकार खोले के बीच से टूट कर धरती की ओर सिमटने से बनता है।

यदि आपशास्त्रों के अनुरूप ही समझना चाहते है; तो ‘अ’ और ‘ह’ – ध्वनि को आदि और अंत माना गया है। यह श्वांस की ध्वनि है। यह प्रत्येक इकाई से निकल रही है। जो केबल जीवजगत को ही चैतन्य मानते है , तो प्रत्येक ‘जीव’ की नाक से यह ध्वनि सदा उच्चारित होती रहती है। इसीलिए इसे परमात्मा प्रद्दत मंत्र माना जाता है। जब कभी किसी को चोट लगती है ; या दुःख होता है , हर मनुष्य – अह , आह, ओह, का अनजाने में उच्चारण करता है। इससे राहत भी मिलती है। यह शक्तिशाली परामन्त्र है। जो इसका जप श्वांसों के साथ एक घड़ी भी अभ्यासित करता है, रोग – शोक- दुःख उससे दूर ही रहते है। इसकी दीक्षा की भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह हर स्त्री-पुरुष-जीव-जन्तु के जन्म के समय उस परमात्मा द्वारा ही दीक्षित है। इस मंत्र के जप के कोई नियम नहीं है। यह जप सोते समय भी चलता रहता है और मल-मूत्र त्याग करते समय भी। बिना इसे जपे कोई जीवित ही नहीं रह सकता। इसलिए इसका कोई नियम नहीं है। केवल ‘अ’ – ‘ह’ के ऊपर बिंदु लगाना इसे अतिरिक्त शक्तिवान कर देता है।

इस अ और ह के बीच ही शरीर के तमाम भुवनों (क्षेत्रों) की ऊर्जात्मक स्पंदन और शक्ति है। इसी में समस्त देवी-देवता यक्ष-किन्नर, भूत-प्रेत , आदि समस्त ब्रह्माण्डीय शक्तियां समाहित हैं। इसी के बीच हमारी देवनागिरी लिपि की वर्णमाला की तमाम ध्वनियाँ हैं। क्षेत्र विशेष का वर्गीकरण आप पहले देख चुके हैं। श्री चक्र, जो प्रत्येक इकाई की सम्पूर्ण ऊर्जा संरचना का ही प्रतीक है , इन ध्वनि –स्पन्दन से प्राकृतिक रूप से ही अभिषेकित है। इसीलिए इसे देवताओं की लिपि या मातृका (महामाया शक्ति) वर्ण कहा जाता है। इन मातृका बीज मन्त्रों पर ही बिंदु लगाकर शक्तिकृत करके समस्त ब्रह्माण्डीय शक्तियों के बीन मन्त्रों की रचना हमारे ऋषियों , गुरुओं , तंत्राचार्यों ने की है। ‘बिंदु’ को ‘तन्त्र’ में ‘शिवसार’ (शिव वीर्य) कहा गया है, वैदिक मार्ग में इसे अमृत तत्व , सावित्री , परमात्म गंगा कहा गया है। ॐ के ऊपर जो बिंदु है, वह इसे ही दर्शाता है। ॐ की आकृति को जरा गौर से देखिये । यह आपकी कपाल खोपड़ी की स्ट्रक्चर हैं ,इसका चाँद सिर के मध्य का गड्ढा है और इसके ऊपर से इसमें ‘बिंदुतत्व’ गिरता (पम्पिंग सिस्टम से खींचता) रहता है। इस मंत्र का प्रभाव भी कपाल के उन्ही भागों पर पड़ता है , जिसका यह स्ट्रक्चर है।

मन्त्रों की समस्त शक्ति ध्वनि आवर्त्तन के कम्पन में होती है । इसीलिए प्रत्येक मंत्र का ‘छंद’ निर्धारित होता है। कुछ मुर्ख लोग यह समझते है कि बस शब्द निकाल कर बोल लेंगे, मंत्र जप हो जाएगा। परन्तु सबकी निर्धारित ध्वनि आवृति हैं, इसके बिना करोडो मन्त्रों जाप का भी कोई लाभ नहीं होता। इन्ही सब गुप्त रहस्यों के लिए जानकार गुरु के निर्देश की आवश्यकता होती है। पर आजकाल हाल अजब है। आज के गुरु कान में मंत्र फुसफुसा कर देते है। ‘कान में’ का अर्थ गुप्त रूप से है यानी कोई दूसरा न हो; इसका अर्थ कान में फुसफुसाना नहीं है। ऐसा करने पर ध्वनि कम्पन की गहराई , लय-छंद, हर्स्व –दीर्घ का कोई ज्ञान ही नहीं हो पायेगा और शिष्य का समय -धन- मस्तिष्क और शरीर की शक्ति सभी बर्बाद जायेंगे।

मंत्र की समस्त शक्ति कम्पनवृत्ति में होती है। उसी कम्पन से वह क्षेत्र स्पन्दित होता है , जहाँ के वर्ण बीज का उच्चारण होता है। इसीलिए मैंने कहा था कि यदि इसे ठीक स्तर पर पढ़कर रिकॉर्ड करके कानों में सुनते हुए मंत्र जप उसके साथ करें, तो फल प्राप्ति का परिश्रम और समय दोनों 25%पर चले जायेंगे।हांलाकि मैंने किसी मंत्र की रचना नहीं की हैं; क्योंकि पहले ही शास्त्रों में यह करोड़ों की संख्या में मौजूद है और पूर्वप्रमाणित है। किसी नये मन्त्र की जरूरत ही नहीं है ; मगर इसके समस्त सूत्रों को जान समझकर यदि कोई ज्ञानी गुरु किसी नयी ईष्ट शक्ति का मंत्र बनाता है, तो वह भी समान रूप से कारगर होगा। जब ऐसा प्राचीनकाल में हो सकता था , तो आज भी हो सकता है। परन्तु इसकी आवश्यकता ही नहीं है।

मंत्र के दो रूप

जिन मन्त्रों का आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रयोग होता है ; उनके दो रूप है। एक बीज मंत्र का, दूसरा भाव मंत्र का। बीज मंत्र साधना-सिद्धि के क्षेत्र में प्रयुक्त होता है और भाव मंत्र , जो सदा अर्थ भाव बताने वाला श्लोक आदि होता है ; पूजा , स्रोत पाठ , नाम पाठ , कवच पाठ आदि में होता है। यहाँ भी एक भारी अंधी आस्था से भरी त्रुटी होती है। बीज मंत्र का तो कोई अर्थ ही नहीं होता ; यह पूर्णतया ध्वनि कम्पन्न पर आधारित है; पर आप कवच , स्रोत आदि का निरन्तर पाठ कर रहे हैं, रूटीन बांधे हुए है कि प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में पाठ करेंगे।

लेकिन उसक एक लाइन का भी अर्थ आपको ज्ञात नहीं है। वह संस्कृत में है और संस्कृत आप जानते नहीं। आपको यह ज्ञात नहीं है कि ‘भावमंत्र’ भाव पर आधारित है। उसमें ध्वनि कम्पन्न का विज्ञान है; पर वह फैला हुआ है। उसमें भाव ही सब कुछ है। अब अर्थ जानते नहीं , तो भाव कहाँ से उत्पन्न होगा? बीज मंत्र में यह ध्यान रूप में निहित होता है, पर इसमें इनके अर्थ में। क्षमा कीजिएगा। मैं आपकी आस्था पर चोट नहीं पहुंचाना चाहता ; पर दुःख होता है। आप व्यर्थ समय नष्ट कर रहे हैं। तोते को न तो धर्म ज्ञान होता है , न मुक्ति मिलती है , चाहे आप सारा वेद पुराण पढ़ा दें। उसे कोई ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *