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मत्स्यावतार का रहस्य

पुराणों में एक अन्य अवतार की भी कथा है। मत्स्यावतार की। जब पृथ्वी जल में समाई जा रही थी, तब विष्णु ने मत्स्यावतार का रूप धारण करके इसकी रक्षा की।

किसी चुम्बक के आयताकार लम्बे डंडे की बल- रेखाओं को देखिये। यह मछली नहीं है? जानते हैं, यह मछली कैसे बनती है? यह पुच्छल तारे का चपटा चित्र है। चपटा इसलिए कि यह डंडा चपटा है। ठीक यही आकृति धरती की चुम्बकीय रेखाओं की है। वास्तुशास्त्र में जिस वास्तुपुरुष की संरचना की पूजा की जाती है; यह उस खंड की चुम्बकीय बल – रेखाएं होती है और यह मछली की आकृति की होती है।

 

ये चुम्बकीय बल – रेखाएं ही धरती या भूमि का आधारबल है। ये न हों तो सब कुछ जलीय हो जायेगा।

इस प्रकार ये कथन शाब्दिक अर्थों के अर्थ तात्पर्य बदलने और रूपक होने के कारण अविश्वसनीय लगते हैं। वास्तव में इन सबमें सृष्टि के रहस्य की अभिव्यक्ति की गयी है।

 

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