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मंदिर का रहस्य

तत्त्व विज्ञान के सूत्रों पर धरती की ऊर्जा-तरंगों को शंक्वाकार करके धनीभूत करने से, प्रतिक्रिया में इसके ऊपर विपरीत उर्जा प्रकट होती है ; जो उल्टी होती है। इसका त्रिशूल निचे होता है।

यह ऊर्जा धन (+) होती है; इसीलिए बन बन कर मंदिर में गिरने लगती है और नीचे के नेगेटिव प्लेट(फर्श) पर टकराने से पहले अदृश्य स्फुलिंग होती है।इससे एक नई ऊर्जा बनती है। यह पेड़-पौधों , मस्तिष्क की शांति , वैराग्य, ध्यान आदि के लिए उपयुक्त होती है। इसीलिए शिवलिंगों की स्थापना मध्य में की जाती है।

ये बनने वाली दोनों ऊर्जा धरती की तरंगों की प्रतिक्रिया में बनती है। ये स्वतंत्र रूप से ब्रह्माण्ड में नहीं होती। यह जीवन-ऊर्जा है। इसीलिए इन्हें परमात्मा का वरदान माना जाता है।

यह ऊर्जा अधिक मात्रा में गृहस्थों के लिए उपयुक्त नहीं होती। यह भौतिकता को नष्ट करती है। इसीलिए इसे गाँव , महल , घर से दूर बनाया जाता था और इसीलिए वास्तु में घर में मंदिर बनाना अशुभ माना जाता है।

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