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मंत्र परीक्षा के सूत्र और शास्त्रीय चक्र

आजकल साधना सिद्धियों में भी भेड़ियाघसान हो गया है। आजकल के गुरु ऐसे हैं कि शिष्य चरणों में हाजिर हुआ, कुछ सेवा सत्कार किया, अपनी इच्छा बताई और गुरु ने कान में मंत्र फूंका , सिर पर हाथ रखा और हो गयी मंत्र दीक्षा। ऐसे में बहुत से गुरु हथेलियों में जहरीले कुकरमुत्ते, बेर की गुठली का रस, अक्वन का दूध आदि में जटिल रासायनिक संयोग एवं प्रकिया से युक्त द्रव लगा लेते है। यह कपूर की तरह सनसनाता सिर के चाँद से रीढ़ की हड्डी में दौड़ता है और प्राण ऊर्जा प्रभावित हो जाती है। तुरंत शरीर में शक्ति का अनुभव होता है (एल.एस.डी/मार्फिया/हिरोइन आदि में भी यह शक्ति संचार पाया जाता है और भांग –अफीम-चरस-शराब में भी) यह भी एक सूक्ष्म विष ही होता है। ऊर्जा चक्र को तीव्र कर देने वाला। 6 महीने, 9 महीने, कभी-कभी दो वर्ष बाद इसका साइड इफ़ेक्ट उभरता है, तो हिरोइन के अभ्यस्त से अधिक भयानक स्थिति हो जाती है। भूत-प्रेत, काला साया, भयानक जानवर आदि की अनुभूति ऐसे होती है कि वे प्रत्यक्ष ही हैं। ऐसे कई मरीज को मैंने चिल्लाते सर पटकते देखा है। घर वाले भी परेशान कि ये दौरे क्यों पड़ रहे हैं? हम तो गुरु जी के यहाँ भी जाते हैं। प्रसाद देते हैं तो कुछ दिन ठीक रहता है, फिर शुरू हो जाता है। यानी प्रसाद खाने के लिए उस गुरु के पास जाते रहिये, चढ़ावा देते रहिये। कुछ लोग तो इसे कुण्डलिनी जागरण बताकर क्षणों में कुंडली भी जाग्रत करने लगे। कुछ वर्ष पहले दिल्ली और एन.सी.आर में इसके बड़े-बड़े होर्डिंग लगे मिलते थे।

आपकी मर्जी। आप विश्वास करें , जाकर कटे; इसमें हमारा कोई आग्रह नहीं है। हम पहले ही बता चुके हैं शिष्य-सम्प्रदाय बनाना हमारा उद्देश्य नहीं है। हम जो बता रहे हैं , इसके अंदर के खतरे और वास्तव में क्या है, यह वह है। मस्तिष्क मानता है, तो सोचिये जानिये। न मानता है, तो जो मनाता है, उसे मानिए।

ईष्ट देवता के चुनाव में केवल सनातन देवी-देवताओं के सम्बन्ध में ईष्ट का विचार जरूरी होता है; क्योंकि यह आपकी कुंडली के अनुरूप नहीं , तो आप अनेक प्रकार की मुसीबत में फंस सकते है। माता-पिता इन्हें इसलिए कहा जाता है कि इनमें से एक के अभाव होते ही हमारा जीवन नहीं रहेगा, पर इनका संतुलन होता है। प्रत्येक जीव में अलग होता है, प्रत्येक स्त्री-पुरुष में अलग होता है। स्त्री/पुरुष का अलग होता है। यह समीकरण आदर्श रूप से खिसका, एक भी बढ़ा या घटा तो प्रॉब्लम खड़ा हो जाएगा।पर भाव रूप देवी देवता – यक्षिणी, अप्सरा, भूतनी आदि में देवी –देवता ईष्ट का विचार नहीं किया जाता। मंत्र का विचार किया जाता है। मंत्र का विचार सनातन देवी-देवता में भी किया जाता है। अंधा होकर मंत्र प्राप्त करना भारी पड़ सकता अहि। शास्त्रों में कहा गया है कि शिष्य को प्रयत्न पूर्वक विचार करना चाहिए कि वे मंत्र की परीक्षा कर लें। किसी भी शक्ति के दर्जनों मंत्र होते हैं । कोई उपयुक्त नहीं, तो दूसरा बदल लें। गलत मंत्र से रोग, शत्रु, वियोग, मित्र घात, पत्नी घात, प्रमी-प्रेमिका घात, सन्तान घात, से लेकर मृत्यु तक कुछ भी हो सकता है; यही समस्त शास्त्रीय आचार्यों ऋषियों का मत रहा है।

प्रत्येक सम्प्रदाय में मन्त्रों की परीक्षा के लिए अलग-अलग विधियां रही हैं। इनके चक्र रहे हैं यानी सारिणी ग्राफ रहे है। ये सभी भिन्न-भिन्न आधार पर हैं। कौलिक साधनाओं में भैरवी चक्र या श्री चक्र पर यह चक्र होता है। तन्त्र की अघोर साधनाओं में पंच चक्र का। तन्त्र की यक्षिणी आदि, अभिचार कर्म, भूतनी-डाकिनी –अप्सरा, काला जादू आदि में अन्य ही पद्धति प्रयुक्त की जाती है। हम यहाँ सामान्य –जनों द्वारा मंत्र परिक्षण के सरल शास्त्रीय सूत्रों को बता रहे हैं। अन्य चक्रों में जटिल गणना होती है, सामान्य लोग उसे कर नहीं पाएंगे।

ज्योतिषीय चक्रों से मंत्र परीक्षा

  1. इस पहले चक्र को देखिये। यह 12 राशि का चक्र है। आपकी राशि जो भी हैं (लग्न राशि) वहाँ खड़े होइए और जो मन्त्र प्राप्त हुआ है, उससे मन्त्र के आदि अक्षर वाले खाने को ढूंढिए। अब गिनिये कि वह कहाँ है। 6,8,12 वें खाने का मंत्र त्याज्य होता है। इसे अकडम चक्र कहते है।
  2. दूसरा चक्र राशि चक्र है। यह वर्णों का दूसरा क्रम समेटे हुए है। इसमें भी मंत्र परीक्षा कि विधि वही है। इसमें कहा गया है कि साधक की लग्न राशि से यदि मंत्र का आदि अक्षर – 1, 5, 9 वें खाने में हो, तो वह मंत्र मित्र के समान रक्षक होता है । दूसरे, 6ठे, 10 वें खाने में पड़े, तो सेवक के समान होता है। तीसरे, सातवें, ग्याहरवें खाने में हो, तो ‘पोषक’ होता है। और 6, 8, 12 में हो तो घातक होता अहि। अकड़म में भी इसी प्रकार समझा जाता है।

 

विशेष – यह सामान्य परीक्षा है। इसे कुंडली के ग्रह योग और नक्षत्र की शत्रु-मित्रता से भी परीक्षित किया जाता है। 6, 8, 12 घातक है; पर यदि यहाँ शुभ स्थिति हैं, तब क्या होगा? शेष गणनाओं में ग्रह शत्रु, राशि टकराव हो तो क्या होगा? यानी सम्पूर्ण परीक्षा एक जटिल गणना का काम है। पर उपर के परिक्षण से मोटा-मोटी काम चल सकता है।

 

  1. कुला कुल चक्र – सामान्यतया कौलिक या श्री विद्या की साधनाओं में पहली मन्त्र परीक्षा इसी पर की जाती है। इसमें साधक के नाम का पहला अक्षर (यह मनमाना नाम नहीं है। प्राचीनकाल में नाम का आदि अक्षर राशि पर होता था। अपने नाम का वर्ण वर्ग देखे और राशि के अक्षर देखें। यह नहीं कर सकते, तो राशि के अनुसार उपर्युक्त चक्रों से वर्ग तत्व निकलें) और मंत्र का पहला अक्षर इस चक्र पर देखें। वे दोनों किस किस भूत तत्व से सम्बन्धित है। इनकी शत्रुता-मित्रता इस प्रकार कही होती है –

मित्र – 1 . पृथ्वी तत्व+ जल तत्व 2. अग्नि तत्व+ वायु तत्व 3.आकाश तत्व + सभी तत्व

शत्रु – 1. जल तत्व <->अग्नितत्व   2.वायु तत्व<-> आकाश तत्व   3.वायुतत्व <->जल तत्व 4. पृथ्वी तत्व <-> अग्नि तत्व

इस मित्रता शत्रुता में भी कुछ बातें विचारणीय होती हैं। कुंडली का ग्रह योग । उदहारण – 1 -5-10-12 में सूर्य होने पर, 1-4-7-8-12 में मंगल होने पर यदि अग्नि-वायु का समावेश होता है और ये ग्रह पहले से सबल है; तो अनर्थ हो जाएगा। इनकी ज्वाला भड़केगी और पराक्रम और शक्ति बढ़ी भी , तो वह रावणी या हिरण्यकश्यप जैसे गुणों को बढ़ाएगी। और वही ज्वाला स्वयं उसे भी कहीं पतंगों की तरह जला डालेगी। इस प्रकार कुंडली की सम्पूर्ण गणना के समीकरण से ही मन्त्र का वास्तविक परिक्षण होता है। सभी ग्रहों में यह स्थिति होती है।

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