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भोग के नशे में ही ज़िन्दगी बीतती है

बच्चा जन्म लेते ही जिस लुभावने जगत को देखता है, वह क्या है,1 इसको सोचने की उसे फुर्सत ही नहीं होती। वह उसी समय से कामनाओं में डूब जाता है। पहले उसकी कामना दूध और माता तक ही सीमित रहती है। फिर उसे खिलौने और खाने पीने की चीज़ें लुभाती हैं। इसी प्रकार वह बड़ा होता जाता है और जैसे जैसे उसकी जानकारी बढती हैं, उसकी इच्छाओं और कामनाओं का जगत भी बढ़ता जाता है।

यह केवल मनुष्य की ही स्थिति नहीं है। यह पृथ्वी के ही नहीं, ब्रह्माण्ड के किसी भी जीव की प्रवृति है। जब से उसका जन्म होता है, वह ‘कामनाओं’ की पूर्ती में लग जाता है और स्वयं इस जगत के अस्तित्व के कारणों पर विचार करने की कभी सोचता ही नहीं। कभी यह प्रश्न मस्तिष्क में उठता भी है, तो वह इन्हें निरर्थक समझ के झटक देता है। लाभ भी क्या है…? इन प्रश्नों के उत्तर को प्राप्त भी कर लिया, तो इनका कोई उपयोग उसे पानी कामना की पूर्ती में दिखलाई नहीं देता और इस प्रकार के प्रश्नों पर विचार करने वालों को पागल कहकर अपनी कामनाओं की पूर्ती में लग जाता है।

इस प्रकार जीव जन्म लेते ही नशे का शिकार हो जाता है। कामनाओं एवं इच्छाओं की पूर्ती करने एवं भोगों को भोगने का यह नशा उससे कभी नहीं उतरता और मृत्यु उसे अपने दामन में समेत लेती है। वह नशे की ही स्थिति में उत्पन्न होता है और नशे की ही स्थिति में समाप्त हो जात है।

1जन्म भी सत्य है, यह रहस्यमय ब्रह्माण्ड भी सत्य है और मृत्यु भी सत्य है। ऐसे शास्वत सत्य हैं, जिनकी प्रत्यक्ष अनुभूति प्रत्येक को होती है, फिर भी इनके भोगने को ही उद्देश्य बना लेना एक विचित्र स्थिति है।

सम्पूर्ण जीवन स्वयं के अस्तित्व के अहंकार में डूबकर इस संसार के भोगों के लिए चरम संघर्ष करते हुए ‘जीव’ जब वृद्ध होता है, तो उसे आसन्न मृत्यु। वह जानता है इसके बाद का अगला पडाव मृत्यु है…। और तब उसको भय लगता है…। भय इस कारण लगता है कि वह नहीं जानता कि ‘मृत्यु के बाद’ उसको किन स्थितियों से गुजरना पड़ेगा। अनुभूतियाँ रहेंगी या नहीं..? उसे स्वर्ग मिलेगा या नर्क?

इसके साथ ही उसे अपूर्ण कामनाओं का दुःख सताता है और अंतिम समय में वह अपने-अपने धर्म अनुसार, अपने-अपने विश्वास के अनुसार धार्मिक हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों की संख्या कम नहीं है। ये लग भग 80% हैं। जिंदगी भर अपराध कर्म में लिप्त रहने वाले भी अंत समय में धार्मिक हो जाते हैं और चन्दन, माला, तिलक, जप करते नज़र आते हैं।

One thought on “भोग के नशे में ही ज़िन्दगी बीतती है

  1. Guruji, aapne aajtak itna gyan diya, agar koi person kisi se sachcha prem karta h, eska sambandh parmatma se h, ya fir bhi ek bhram h jo mrityu k baad nasht ho jayega, kya prem mrityu k baad bhi rahta h, kya prem karna chahiye, aaj es subject ko aapke tarike se samjhaiye, dhanyavad

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