भैरवी साधना से पहले

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

भैरवी की पूजा के बाद उससे सामान्य काल में ‘देवी है’ ऐसा व्यवहार करना चाहिए। उसे भी यह विश्वास दिलाना चाहिए कि उसमें देवी का वास है और वह देवी रूप हो गयी है।इसलिए प्रत्येक रात्रि साधना से पूर्व चाहे 21 मन्त्र से ही सही उसकी पूजा करनी चाहिए।

 

प्रथम पूजा के बाद बहिरावी को साधक को भी प्रतिकृति पुरुष देवता मान कर उसकी पूजा करनी चाहिए। स्मरण रखें- यहाँ पूजा विधि नहीं – विश्वास और विश्वास की मानसिक दशा महत्त्वपूर्ण है। इस विश्वास के साथ प्रतिदिन की गयी सामान्य प्रार्थना –स्तुति भी पूजा का स्थान भर देती है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या भैरवी में सचमुच देवी शक्ति अवतरित होती है? ………. तो इसका उत्तर हैं हां – यदि वह खुद ही संशय में न हो। विश्वास है, मानसिक भाव बंधा है; तो वह शक्ति निश्चय ही भैरवी में निवास करती है। साधक भी देवता रूप हो जाता है।

बुद्धि वादियों को यह अजीब सा लगेगा, पर यही सत्य है। मानसिक भाव पर ही सब कुछ है।तन्त्राचार्यों ने कहा है कि लगातार विह्स्वास के साथ समझिये कि हाथी जैसे बलशाली है और उसके लिए अभ्यास करिए; तो समझ लगेगा, पर वह बल आपमें आ जाएगा ।

हमारे जीवन कि सामान्य प्रक्रिया भी वही है किसी ने चाहा कि वह बिजली से जगत को प्रकाशित कर दे, उसने कर दिया। किसी ने हवा में उड़ना चाहा, उसने मनुष्य को उड़ने का तरीका बता दिया । ऐसे सैकड़ों लोग रहे है, जिन्होंने तत्कालीन असम्भव को सिद्ध करना चाहा और उन्होंने कर दिया।

प्रकृति का एक ही सूत्र है, जो कामना करोगे, जो भाव होगा, सारी क्रियाएं उधर ही होंगी। तुम्हारे आसपास का ऊर्जा जगत तुम्हारी उसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए तुम्हारी ओर प्रवाहित होने लगेगा। इसके अन्तरगत तत्व विज्ञान का शाश्वत सूत्र है। नेगेटिव उत्पन्न करो । वह जैसा होगा, वैसा ही पॉजिटिव उस ओर प्रवाहित होगा। कामना और विश्वास की प्रकृति आवेशों की प्रकृति को संघनित करती है।

इसलिए अविश्वास का कोई कारण नहीं है। यह शाश्वत सूत्र है। सारे ब्रह्माण्ड की सभी इकाइयों पर लागू। प्रकृति में अपवादात्मक नियम नहीं है।

 

 

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *