भारत की चमत्कारिक वनस्पतियाँ

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

अंकोल

अंकोल

(तंत्र विद्या का मायावी पेड़ , जो कुण्डलिनी जागृत करता है ) यह एक पेड़ है . इसकी ऊंचाई 25 से 40 फीट होती है.  तने की गोलाई 2 से 3 फीट तक होती है. यह सफ़ेद रंग का होता है. पट्टे कनेर जैसे होते है. ये पत्ते खट्टे और तेज गंध वाले होते है . इसमें लाल जामुन के समान फल लगते है . पकने पर बैगनी हो जाते है .

आयुर्वेद में इसे एक विशेष तेज प्रतिक्रिया वाली औषधि के रूप में काम में लाया जाता है .

तंत्र शास्त्र में मायावी प्रयोगों और मायाजाल पैदा करने में .

आयुर्वेद में इसका प्रयोग निम्नलिखित रोगों में होता है , जो आज भी लाइलाज समझे जाते है .

दम्मा –  इसकी जड़ को निम्बू के रस में गाढ़ा घोंटकर , छोटे चम्मच से सवेरे शाम आधा – आधा चम्मच लेने से भयंकर दम्मा भी नष्ट होता है .

चर्म रोग, गठिया – इसकी जड़ की छाल को पानी में पीसकर रस बनाकर मालिश करने और 0.3 ग्राम प्रति के हिसाब से इसकी जड़ की छाल , जावित्री , जायफल और लौंग के चूर्ण को पानी के साथ सुबह लेने पर कुष्ठ, सफ़ेद दाग आदि की वृद्धि रुक जाती है और खुजली आदि विसर्प रोग नष्ट हो जाते है .

अस्त्र के कटे घाव – इसके तेल में रुई डालकर कटे घाव पर रखने से तुरंत खून बंद होता है . लगातार प्रयोग करने पर चमत्कारिक ढंग से घाव भर जाते है. ¼  समय में . इस तेल से असाध्य नासूर, भगन्दर, खूनी बवासीर , भी ठीक होते है .

अंकोल का मायाजाल

शैवतंत्र में कहा गया है की अंकोल के इस तेल को मुर्दे के मुख में एक बूँद डाला जाये , तो वह भी चार प्रहर यानी 6 घंटे के  लिए जीवित हो जायेगा.

भ्रम में न पड़े. यह अतिशियोक्ति है . इसका अर्थ मृतप्रया चेतना शून्य से लें , जो मर रहा है .

इसके सम्बन्ध में ‘इन्डिजेनस कमेटी’ (1895) और ‘ट्रॉपिकल  स्कूल्स ऑफ़ मेडिसिन’ की रिपोर्ट हैं. वैसे यह वनस्पति हजारों साल से हमारे यहाँ प्रयुक्त होती रही है .

ये दोनों ब्रिटिश सरकार की संस्थाएं थी,  जिनमें भारतीय जड़ी- बूटियों के शोध  पर वृहद् कार्य होते थे . इन शोधों पर सरकार दवाओं को सार्वजनिक प्रयोग की अनुमति देती थी . इसमें बड़े ख्याति प्राप्त डॉक्टर एवं वैज्ञानिक कार्यरत थे. इसके बाद इब दवाओं को ब्रिटिश मेडिकल जनरल में प्रकाशित किया जाता था और ब्रिटिश साम्राज्य के सभी देशों में इन्हें प्रयुक्त किया जाता था . भारत में इन्हें ‘ हुकुमी दवा’ कहा जाता था , जिसका अर्थ है ‘अनुमति प्राप्त दवा’.

हमारा दुर्भाग्य है कि स्वत्नत्रता के बाद इससे कुछ पहले से जब दवा कम्पनियाँ आयीं , तो सरकार ने आयुर्वेद को वर्जित कर  दिया. आजादी के बाद भी यह प्रतिबन्ध  बना रहा .अब अनुमति है , तो आयुर्वेद के नाम पर मजाक हो रहा है . आयुर्वेदिक कॉलेजों में अंग्रेजी मेडिसिन चिकित्सा लागू है. डिग्री , नौकरी और मेडिसिन कम्पनियों की  दवाएं , जिनमें  बड़ी- बड़ी आयुर्वेदिक कम्पनियाँ है.

हम यहाँ बताना चाहते है कि रासायनिक परिक्षण पेटेंट दवाओं का उत्पादन विश्व मानवता के साथ एक  फ्रॉड है. केंद्रीकृत व्यवसायिक गुलामी. विश्व की सरकारें भी इनके नियंत्रण में होती है .  आप अपनी चिकित्सा की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर सकते.प्रत्येक देश में दशी पद्धति वर्जित है , घटिया है. दवा बड़ी अन्तर राष्ट्रीय कम्पनियाँ ही बनाएंगी और इलाज उसी की विद्या जानने वाले डॉक्टर करेंगे , जो उनकी दवाई प्रिस्क्राइब करेंगे  . किसी वैकल्पिक ज्ञान वाले ने कोशिश भी की तो सरकारें उसे पकड़कर जेल में बंद कर देगी. जबकि इस कंपनियों की दवाओं के साइड इफेक्ट आपकी किसी अन्य रोग में डाल देती है.

यह सब किस लिए है , क्यों होता है ? इसका उत्तर इतना भयानक है कि आप बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे . मैं आपराधिक क्षेत्र का एक वरिष्ठ पत्रकार रहा हूँ और जो सत्य है , वह इतना  भयानक है कि आप अफीम के नशे में प्रजातंत्र की जय करते रहें , यही अच्छा है .

हमने कोशिश की है कि आपको अपने साईट के माध्यम से और इस चैनल के माध्यम से अपने जीवन के 33 वर्ष के शोध से परिचित कराऊँ, जो तंत्र  , मंत्र , सिद्धि- साधना , सनातन धर्म , उसके देवी देवता आदि के  वैज्ञानिक और प्रमाणिक रूप को आपके सामने रख सकू. मैंने   इन विषयों पर कठिन साधना की है और एक वैज्ञानिक स्वरुप में की है. इनको जानिए और  इनसे अपना जीवन , अपनी समस्याओं और रोगों से निवृत्ति पाइये. हम भगवन नहीं है. सभी  कुछ 100 % नहीं हो सकता , पर यह ज्ञान आपको हर क्षेत्र  में लाभ  पहुंचाएगा .

अंकोल का रासयनिक विश्लेषण

अल्कोलाइड  – 82,

पेट्रोलियम ईथर  – B.P 35 (07 %

ऐबस्युलूट इथर – 0.66%

ऐबस्युलूट अल्कोहल – 4.01

अंकोल

(तंत्र विद्या का मायावी पेड़ , जो कुण्डलिनी जागृत करता है ) यह एक पेड़ है . इसकी ऊंचाई 25 से 40 फीट होती है.  तने की गोलाई 2 से 3 फीट तक होती है. यह सफ़ेद रंग का होता है. पट्टे कनेर जैसे होते है. ये पत्ते खट्टे और तेज गंध वाले होते है . इसमें लाल जामुन के समान फल लगते है . पकने पर बैगनी हो जाते है .

आयुर्वेद में इसे एक विशेष तेज प्रतिक्रिया वाली औषधि के रूप में काम में लाया जाता है .

तंत्र शास्त्र में मायावी प्रयोगों और मायाजाल पैदा करने में .

आयुर्वेद में इसका प्रयोग निम्नलिखित रोगों में होता है , जो आज भी लाइलाज समझे जाते है .

दम्मा –  इसकी जड़ को निम्बू के रस में गाढ़ा घोंटकर , छोटे चम्मच से सवेरे शाम आधा – आधा चम्मच लेने से भयंकर दम्मा भी नष्ट होता है .

चर्म रोग, गठिया – इसकी जड़ की छाल को पानी में पीसकर रस बनाकर मालिश करने और 0.3 ग्राम प्रति के हिसाब से इसकी जड़ की छाल , जावित्री , जायफल और लौंग के चूर्ण को पानी के साथ सुबह लेने पर कुष्ठ, सफ़ेद दाग आदि की वृद्धि रुक जाती है और खुजली आदि विसर्प रोग नष्ट हो जाते है .

अस्त्र के कटे घाव – इसके तेल में रुई डालकर कटे घाव पर रखने से तुरंत खून बंद होता है . लगातार प्रयोग करने पर चमत्कारिक ढंग से घाव भर जाते है. ¼  समय में . इस तेल से असाध्य नासूर, भगन्दर, खूनी बवासीर , भी ठीक होते है .

अंकोल का मायाजाल

शैवतंत्र में कहा गया है की अंकोल के इस तेल को मुर्दे के मुख में एक बूँद डाला जाये , तो वह भी चार प्रहर यानी 6 घंटे के  लिए जीवित हो जायेगा.

भ्रम में न पड़े. यह अतिशियोक्ति है . इसका अर्थ मृतप्रया चेतना शून्य से लें , जो मर रहा है .

इसके सम्बन्ध में ‘इन्डिजेनस कमेटी’ (1895) और ‘ट्रॉपिकल  स्कूल्स ऑफ़ मेडिसिन’ की रिपोर्ट हैं. वैसे यह वनस्पति हजारों साल से हमारे यहाँ प्रयुक्त होती रही है .

ये दोनों ब्रिटिश सरकार की संस्थाएं थी,  जिनमें भारतीय जड़ी- बूटियों के शोध  पर वृहद् कार्य होते थे . इन शोधों पर सरकार दवाओं को सार्वजनिक प्रयोग की अनुमति देती थी . इसमें बड़े ख्याति प्राप्त डॉक्टर एवं वैज्ञानिक कार्यरत थे. इसके बाद इब दवाओं को ब्रिटिश मेडिकल जनरल में प्रकाशित किया जाता था और ब्रिटिश साम्राज्य के सभी देशों में इन्हें प्रयुक्त किया जाता था . भारत में इन्हें ‘ हुकुमी दवा’ कहा जाता था , जिसका अर्थ है ‘अनुमति प्राप्त दवा’.

हमारा दुर्भाग्य है कि स्वत्नत्रता के बाद इससे कुछ पहले से जब दवा कम्पनियाँ आयीं , तो सरकार ने आयुर्वेद को वर्जित कर  दिया. आजादी के बाद भी यह प्रतिबन्ध  बना रहा .अब अनुमति है , तो आयुर्वेद के नाम पर मजाक हो रहा है . आयुर्वेदिक कॉलेजों में अंग्रेजी मेडिसिन चिकित्सा लागू है. डिग्री , नौकरी और मेडिसिन कम्पनियों की  दवाएं , जिनमें  बड़ी- बड़ी आयुर्वेदिक कम्पनियाँ है.

हम यहाँ बताना चाहते है कि रासायनिक परिक्षण पेटेंट दवाओं का उत्पादन विश्व मानवता के साथ एक  फ्रॉड है. केंद्रीकृत व्यवसायिक गुलामी. विश्व की सरकारें भी इनके नियंत्रण में होती है .  आप अपनी चिकित्सा की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर सकते.प्रत्येक देश में दशी पद्धति वर्जित है , घटिया है. दवा बड़ी अन्तर राष्ट्रीय कम्पनियाँ ही बनाएंगी और इलाज उसी की विद्या जानने वाले डॉक्टर करेंगे , जो उनकी दवाई प्रिस्क्राइब करेंगे  . किसी वैकल्पिक ज्ञान वाले ने कोशिश भी की तो सरकारें उसे पकड़कर जेल में बंद कर देगी. जबकि इस कंपनियों की दवाओं के साइड इफेक्ट आपकी किसी अन्य रोग में डाल देती है.

यह सब किस लिए है , क्यों होता है ? इसका उत्तर इतना भयानक है कि आप बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे . मैं आपराधिक क्षेत्र का एक वरिष्ठ पत्रकार रहा हूँ और जो सत्य है , वह इतना  भयानक है कि आप अफीम के नशे में प्रजातंत्र की जय करते रहें , यही अच्छा है .

हमने कोशिश की है कि आपको अपने साईट के माध्यम से और इस चैनल के माध्यम से अपने जीवन के 33 वर्ष के शोध से परिचित कराऊँ, जो तंत्र  , मंत्र , सिद्धि- साधना , सनातन धर्म , उसके देवी देवता आदि के  वैज्ञानिक और प्रमाणिक रूप को आपके सामने रख सकू. मैंने   इन विषयों पर कठिन साधना की है और एक वैज्ञानिक स्वरुप में की है. इनको जानिए और  इनसे अपना जीवन , अपनी समस्याओं और रोगों से निवृत्ति पाइये. हम भगवन नहीं है. सभी  कुछ 100 % नहीं हो सकता , पर यह ज्ञान आपको हर क्षेत्र  में लाभ  पहुंचाएगा .

अंकोल का रासयनिक विश्लेषण

अल्कोलाइड  – 82,

पेट्रोलियम ईथर  – B.P 35 (07 %

ऐबस्युलूट इथर – 0.66%

ऐबस्युलूट अल्कोहल – 4.01

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *