ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति – 01

Image Source: pexels.com

जिस प्रकार वायु मंडल के एक बिंदु पर गर्मी के कारण वायु हल्की होके ऊपर उठती है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा तत्व में एक बिंदु पर विकोचन होता है और वह स्थान घनत्व की दृष्टि से हल्का हो जाता है। चक्रवात की ही भाँती चारो और से इस परमात्मा (मूल्तत्व) की धाराएं उस खाली स्थान को भरने के लिए उस और दौड़ती हैं और वहां एक घूमता हुआ शंक्वाकार भंवर बन जाता है, जिसे वाममार्गी प्रथम ‘महायोनि’ की उत्पत्ति कहते हैं। इस पर इसके घूमने के कारण आवेश उत्पन्न होता है।

इस नन्ही ‘महायोनि’ के उत्पन्न होते ही परमात्मा रुपी तेज तत्व में इसके शीर्ष की और प्रतिक्रिया होती है और एक विपरीत प्रकृति का शंक्वाकार भंवर बन जाता है, जिस पर विपरीत आवेश (अपोजिट चार्ज) होता है। इसे वाममार्ग में ‘शिवलिंग’ की उत्पत्ति कहा जाता है।

विपरीत आवेश (चार्ज) के कारण  ये दोनों भंवर एक दुसरे की ओर खिंचते हैं और एक दुसरे में समा जाते हैं। इनके सामने से पहले का शीर्ष बिंदु दुसरे के पेंदे के मध्य टकराता है और दुसरे का शीर्ष बिंदु पहले के पेंदे के बीच और इसके केंद्र में दोनों का दाब (प्रेशर) पड़ता है।

इससे इस नन्हे परमाणु में तीन उर्जा उत्सर्जन बिंदु बनते हैं, जिनसे घन और ऋण आवेश (पॉजिटिव और नेगेटिव चार्ज) की क्रिया से उर्जा उत्सर्जन (एनर्जी रेडिएशन) होता है। इसे ही प्राचीन ऋषियों ने ‘पृथ्वी’, ‘सूर्य’ और ‘आकाश’ का जन्म बताया है।

इस प्रकार प्रकाश से लाखों गुना सूक्ष्म एक नन्हे परमाणु का जन्म होता है। जिसमें तीन पॉवर पॉइंट होते हैं। एक घन (+) उर्जा का उत्सर्जन करने वाला बिंदु, दूसरा ऋण (-) उर्जा का उत्सर्जन करने वाला बिंदु, तीसरा नाभिक (nucleus)।

इसे वैदिक ऋषियों ने ‘त्रिगुणी’ महामाया कहा है। वाममार्गी साधक इसे शिव का डमरू कहते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *