ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के शास्वत सूत्र

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ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ‘परमात्मा रुपी’ अनंत विस्तार में होती है। इसकी उत्पत्ति और संरचना चक्रवात-जैसी होती है। अंतर केवल इतना होता है की वायु एक भौतिक पदार्थ है, इसलिए चक्रवात में सर्किट नहीं बनता, पर परमात्मा एक तेजमय तत्वा है, इसलिए उसमे धाराओं के घूर्णन एवं एक-दुसरे के काटने से पॉवर सर्किट बन जाता है। यह पॉवर सर्किट ही अपना विस्तार करते हुए, अपने अन्दर नए-नए सर्किटो को बनाते हुआ विशाल ब्रह्माण्ड के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

वैदिक ऋषियों ने कहा है कि परमात्मा तत्व में पहले एक क्रिया होती है, फिर उसकी प्रतिक्रिया होती है, फिर उनसे क्रिया-प्रतिक्रिया की एक अनंत श्रंखला प्रारम्भ हो जाती है और इस ब्रह्माण्ड का बीजरूप वामनावतार एक अतिशूक्ष्म परमाणु उत्पन्न होता है। यह ‘परमाणु’ ही प्रथम ‘आत्मा’ विष्णु का स्वरुप है, जो अपने अन्दर ‘पृथ्वी’, ‘आकाश’ और सूर्य को लिए हुए उत्पन्न होता है और अपनी शक्ति से ‘मूलतत्व’ (परमात्मा) को खींच-खींचकर अपना विस्तार करते हुए इस ब्रह्माण्ड की अद्भुत लीला को उत्पन्न करता है।

यह सब रूपकों में कहा गया है और चूंकि पृथ्वी, आकाश, सूर्य आदि शब्दों का अर्थ हम आधुनिक युग के अर्थ के अनुसार लगाते हैं, इसलिए प्राचीन विवरण हमें फैंटम कथाओं-जैसे लगने लगते हैं। वास्तव में, यहाँ ‘पृथ्वी’ का अर्थ  आधार बिंदु (नेगेटिव पॉइंट), आकाश का अर्थ आगम बिंदु (पॉजिटिव पॉइंट) और सूर्य का अर्थ नाभिक है। 

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