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वास्तु विद्या क्या है?

वास्तु विद्या क्या है? क्या यह सत्य में मनुष्य पर प्रभाव डालता है? वह भी उसके भाग्य पर?

उत्तर – ‘ वास्तु विद्या’ का शाब्दिक अर्थ निकालिए। इसका अर्थ वस्तु का विज्ञान है , न कि मकानों की विद्या। यह प्राचीन पदार्थ विज्ञान है । चूँकि मकानों में इस विद्या का प्रयोग होता है; इसलिए इसे मकानों की विद्या समझा जाता है।

इसके सूत्रों के अनुसार प्रत्येक प्राकृतिक इकाई में उसका अपना मैग्नेटिक फील्ड होता है , चाहे वह जीव हो या ग्रह-उपग्रह हो , चाँद तारे हो, या धरती हो, या अन्य कुछ। चूँकि चुम्बकीय बलों की स्थिति बल हर बिंदु पर अलग अलग होती है; इसलिए किसी इकाई के भिन्न-भिन्न बिन्दुओं से निकलने वाले रेडिएशन और वहां के चुम्बकीय बल का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होता है।

यदि पृथ्वी को एक वस्तु मान लिया जाए, तो यह चुम्बकीय बल इसमें भी होता है और जिस प्रकार किसी चुम्बक को काटकर अलग करने से उसका चुम्बकीय क्षेत्र नहीं टूटता। दोनों में अलग-अलग बनता है , उसी प्रकार जब किसी भूमि को अलग करके गड्ढे या दीवाल का घेरा बनाया जाता है, तो वहाँ उस भूमि पर भी वह पूर्ण बनता है।

मैं नहीं जानता कि वास्तु पुरुष का जो स्वरुप बताया गया है और उसे उल्टे प्रवाह में बताया गया है ; वह किस प्रकार रेखांकित किया गया है; परन्तु वह और किसी चुम्बकीय डंडे   पर बनाने वाला चुम्बकीय क्षेत्र समान है।

पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि शिव (चंद्रमा के मध्य स्थित / +) और अंधक (अन्धकार की शक्ति / -) दोनों में संघर्ष होने लगा। इस लड़ाई में जो शिव का स्वेद (पसीना) निकला; उससे ‘वास्तु पुरुष’ का जन्म हुआ और शिव ने उसे उल्टा फेंक दिया और वरदान दिया कि तुम सारी प्रकृति में व्याप्त रहोगे। यह भी कुछ ऐसी ही कहानी लगती है।

शास्त्र के अनुसार यह प्रवाह नैऋत्य कोण (पश्चिम + दक्षिण), से ईशान कोण (पूर्व + उत्तर) की ओर होता है। इसी प्रवाह को वर्गीकृत करके देवी –देवताओं का स्थान बताया गया है । पहले किसी शक्ति प्रभाव को देवी-देवताओं के नाम से ही पहचान और कोई वर्ग शक्ति की व्याख्य की जाती थी।

इस प्रकृति में जो भी है, सबपर परिस्थितियों , साथी वस्तुओं और रहने के स्थान की आकृति आदि का प्रभाव पड़ता है। समस्त प्रकार की क्रियाओं या रासायनिक प्रभावों में यही सूत्र है। काला कपड़ा धूप में अधिक गर्म होता है, लाल रंग क्रोध-काम-उत्तेजना बढाता है , पत्थर का आश्रम हो , तो गर्मी –सर्दी में व्याकुलता और उसके प्रभाव से नहीं बचा जा सकता। यह मानसिक शारीरिक , शरीर की ऊर्जा – व्यवस्था सबको प्रभावित करता है। यह सब प्रभावित होने से , काम करने की शक्ति , सोच, दृष्टिकोण आदि भी प्रभावित होंगे ही होंगे। यह एक प्रमाणित तथ्य है। सभी जानते है।

परन्तु , यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए । आजकल वास्तु में केवल भूमि और मकान का शुभाशुभ बताया जाता है और यह फिक्स रूप में बताया जाता है कि इस दिशा में पानी , इस दिशा में आग, इस दिशा में बेडरूम आदि और दिशा का मकान शुभ होगा, इस दिशा का अशुभ और इसमें उसके स्वामी की कुंडली की गणना कभी नहीं की जाती। मकान के इंटीरियर डेकोरेशन को भी वर्गीकृत रूप में कहीं कोई नहीं बताता। बेडरूम में क्या कहाँ हो, क्या हो, क्या न को, वह उसके स्थान पर अधिक निर्भर करता है; दिशाओं का सूत्र बाद में प्रभावी होता है। आजकल ऊपरी सूत्रों से काम होता है, गहराई में कोई नहीं उतरता। इसमें कोई स्थान पर मुझे आश्चर्यजनक मामलों का सामना करना पड़ा है।

पंजाब में के ब्राह्मण थे। बुनकर मशीनों का निर्माण करते थे। उन्होंने एक जमीन खरीदी। नक्शा भेजा और पूछा कि क्या वह शुभ होगा? मैंने एक बूथ से फ़ोन करके पूछा कि यह ‘मौत का घर’ क्यों खरीद क्या है? उन्होंने कहा कि मेरे दो मकान ठीक इसी स्थिति की भूमि पर हैं। मेरी कुंडली देख लीजिये, तो ठीक पता चले। कुंडली देखने के बाद ज्ञात हुआ कि उसके लिए वही मकान शुभ था। वहां शुक्र बाधित था। गृहस्थी का सुख। मैंने उससे कहा कि उनकी पत्नी की मौत आग से हो सकती है। सावधान रहें । उनका उत्तर था कि साल भर पहले वाज स्टोव दुर्घटना में मर चुकी है। बरसी के बाद साली से शादी की है।

वास्तु विज्ञान का गहरा सम्बन्ध भारतीय ज्योतिष से है। ज्योतिष का शास्त्रीय सूत्र कहता है कि जैसी कुंडली होगी, वैसा ही मकान होगा। जो भी ग्रह या स्थान (अंग/विषय) कुंडली में जैसा होगा, वैसा ही मकान में भी होगा। जैसे – केतु बाधित – फर्श में , निकासी के नालों में , पानी के नलकों में, शौचालय कि निकासी में, छत के पानी की निकासी में गड़बड़ी होनी। यह भी ऐसे कि कालचक्र के अनुसार जो जो गड़बड़ी जब शुरू होगी , वह मकान में भी उसी समय होगी। राहु की गडबडी – छत की गड़बड़ी , बारिश के पानी का जमा होना – टपकना, छत पर गंदगी , मकान छतविहीन, छत का गिरना, मानसिक चिंता , नींद में गड़बड़ी आदि। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी प्रभाव होता है।

वास्तु विद्या का संशोधन होता है; पर इसकी सीमा है। घर बनाने से पहले नक्सा वास्तु के अन्यरूप न हो, तो सामान्य संशोधन ही हो सकता है। इंटीरियर संशोधित हो सकता है। पर उसे सम्पूर्ण रूप से निर्दोष नहीं बनाया जा सकता। जो बन गया है, उसे हटाकर नया निर्माण संभव नहीं है। बिना तो-फोड़ वास्तुदोष निवारण का नारा सभी जगह काम नहीं करता। समझ लीजिये कि वह आपका पक्का ग्रह दोष है और उसमें केवल राहत हो सकती है। कई बार तो ऐसा होता है कि किराए के मकान में है , उसे छोड़ना चाहते है; नये मकान की चाभी आपके पास है। 25 मीटर पर वह नया मकान है, पर आप उसमें जा नहीं पायेंगे। कभी मजदूर की समस्या, कभी ठेले की समस्या, कभी कोई अन्य समस्या। चाहकर भी परिवर्तन रुका रहता है । बम्बई के के महाशय मकान छोड़कर ससुराल में जो बसे। नया मकान लेते ही करोड़ों का कारोबार साल भर में समाप्त हो गया। वे मकान बेचना चाह रहे थे, पर मकान बिक नहीं रहा था।

संशोधन कैसे हो?

यह ज्योतिष गणना के साथ मकान की पूरी व्यवस्था का संशोधन होता है। इसमें समय देना होता है। एक ही विकार के निदान एक ही प्रकार के नहीं होते। करें , तो दूसरा प्रभाव बाधित हो जाएगा।

विशेष –

यह वास्तु के प्रश्न का उत्तर है; परन्तु सभी से विनम्र निवेदन है कि कृपया अपने अपने मकान का विवरण देकर संशोधन के निदान निशुल्क मत पूछने लगिएगा। सिद्धि –साधना पर पोस्ट हो , तो सिद्धि की चाहना वाले लाइन लगा देते है, ज्योतिष पर पोस्ट हो , तो सैकड़ों जन्म तिथियाँ भेजी जाती है कि प्लीज बता दीजिये कि ……..। यह कैसे सम्भव है? सब कुछ मुफ्त चाहिए, वह भी ऑन टेबल । धर्मालय पर दी गयी जानकारियों से स्वयं कुछ न करेंगे। खुद सामान इकट्ठा करने खाना बनाने की जहमत नहीं उठाएंगे। बना बनाया खाना चाहिए, क्योंकि मैं बहुत भूखा हूँ। आप बनाकार खिला दीजिये।

यह संभव नहीं है। धर्मालय की व्यक्तिगत सेवाएं सशुल्क है। पैसे नहीं खर्च कर सकते, तो वेबसाइट की जानकारी से स्वयं गणना करके उपाय ढूंढें। दवा, ज्योतिष , तंत्र साधना, सिद्धि के सभी आवश्यक तथ्य वहाँ संक्षेप में है। वास्तु में ग्राफिंग होती है और अभी मेरे पास साधन नहीं है। प्रयास जारी है। हम तो चाहते है कि आपको सहूलियत मिले; पर विचित्र प्रवृति है – लोग नाम-पता परिचय भी टेलीफोन पर ही पूछेंगे, वेबसाइट पर नहीं देखेंगे।

भाई मेरे । मैं बार-बार कह चुका हूँ कि यह ट्रस्ट नहीं है। मैं अकेला व्यक्ति हूँ और हजारों लोग जुड़े है , मैं किन किन की व्यक्तिगत रूप से सेवा कर सकता हूँ? किसी विद्या का जानकार होने का यह मतलब नहीं है कि मैं उसकी प्रैक्टिस भी निशुल्क करू? ऐसे ज्ञान छांटने वालों की कमी नहीं है। पर उनसे पूछो कि आप कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाते है, कितनों को निःशुल्क कोचिंग देते है? तो उल्टे सीधे तर्क देने लगेंगे। जिनको वास्तविक जरूरत होती है, वे व्यय करते है और लाभान्वित हो रहे है। पर कुछ लोगों क चालाकी देखिए। पहले मेरी कुंडली देख लीजिये ताकि मुझे विश्वास हो । किसी वकील को कहिये कि पहले केस जीतकर योग्यता प्रमाणित कीजिये। मैंने किसी को विश्वास दिलाने का कभी प्रयत्न नहीं किया। बहुतों को तो पूरा आध्यात्म भी बकवास लगता है. तो क्या मैं उनके सामने हाथ जोड़ते फिरू कि विश्वास कर लीजिये। मानने या न मानने से प्राकृतिक सत्य नहीं बदला करता। भुगतने के बाद बता चलता है, पर तब तक बचाने के लिए कुछ होता ही नहीं।

 

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