आप यहाँ हैं
धर्मालय > धर्म का ज्ञान क्षेत्र > प्रश्न – महिलाओं के द्वारा देव पूजा के अधिकार के सम्बन्ध में विवाद जोरों पर है, इस सम्बन्ध में सनातन धर्म क्या कहता है?

प्रश्न – महिलाओं के द्वारा देव पूजा के अधिकार के सम्बन्ध में विवाद जोरों पर है, इस सम्बन्ध में सनातन धर्म क्या कहता है?

उत्तर – इस सम्बन्ध में हम पहले ही बता चुके है। सनातन धर्म में महिलाओं को न तो पूजा से रोका गया है , न ही साधना से। उन्हें शास्त्रार्थ से भी नहीं रोका गया है। शंकराचार्य और मंडन मिश्र की पत्नी का शास्त्रार्थ जंग जाहिर है। शनि के देश भर के मंदिरों में महिलाएं जाती है। जहाँ जहाँ काल भैरव का मंदिर है; वह शनि देव के ही एक रूप है।  विष्णु-देवी आदि के मन्दिरों में जानेवाली , शिवलिंगों पर जल चढाने वाली महिलाएं ही अधिक है।

कोई भी परम्परा कहीं भी , किसी कारण से प्रारंभ होती है। बाद में उस कारण के समाप्त हो जाने पर भी वे रूढ़ हो जाती है। सती होने की क्रिया लुटेरों और बर्बर आततायियों से बचने के लिए महिलाओं ने स्वयं अपनाई थी; विशेषकर राजपूतानों में ; पर वह रूढ़ हो गयी। इसी प्रकार मंदिर आदि की व्यवस्थाएं भी है। मेरी राय यह है कि कोई कारण नहीं है, तो नियमों को परवर्तित कर लेना चाहिए। सनातन धर्म में कट्टरता नहीं है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो। यह ज्ञान का मार्ग है, जड़ मूर्खताओं से भरी अंध आस्था का नहीं।

यह तर्क वितंडा है कि नारियों को रजोधर्म के कारण प्रवेश वर्जित है। मैं भी इसी समुदाय का व्यक्ति हूँ और जानता हूँ कि लाख आप वैज्ञानिक , डॉक्टरी , बौद्धिक तर्क दे लीजिये, इस अवस्था में महिलाएं स्वयं मंदिर, पूजा आदि में नहीं जायेंगी। वे घर के पूजा गृह में नहीं जाती; मंदिर में क्यों जाने लगी?

हम कभी-कभी क्षुब्ध हो जाते है । धार्मिक क्षेत्र में इतनी अंध आस्थाएं को रूढ़ कर दिया गया है कि इसको इस दलदल से निकालकर ऊपर लाना गंगा को साफ़ करने की तरह दुष्कर कार्य हो गया है। ‘शनि का जन्म यहीं हुआ था’ – क्या अर्थ है इस कथन का? शनि ग्रह हो या देवता – यह कैसे संभव है? यदि वह ग्रह है , जैसा कि शंकराचार्य कह रहे है (मैं उनके मत से सहमत नहीं हूँ) – तो भी उसकी उत्पत्ति पृथ्वी के किसी स्थान से नहीं हो सकती और यदि वे देवता है ; तो देवताओं का विस्तार ब्रह्माण्डीय स्तर पर होता है । वे वहां कैसे जन्म ले सकते है? उस पर शनि काल भैरव रूप है। सनातन देवता। वे जन्म नहीं लेते। उनकी उपस्थिति ब्रह्माण्ड के जीवन तक शाश्वत है। इकाइयों में भी पृथ्वी पर उनका अंश अवतरित होता है; पर उस दृष्टि कोण से भी पृथ्वी पर उनका स्थान नेगेटिव पोल होगा; न कि वहां जहाँ के सम्बन्ध में यह कथन है। शनि का स्थान मूलाधार की त्रिकास्थि है और यह नेगेटिव प्रवाह का बिंदु है। इसकी शक्ति पर शरीर का अस्तित्त्व , मस्तिष्क, हड्डी , बाल , नख निर्भर करते है। इस अजन्मा शक्ति को जन्म लेनेवाला कहने वाला मेरी समझ में तो महा अज्ञानी है।

इससे भी बड़े अज्ञानी हम है, जो समझते है कि कहीं तेल और जल चढाने से हम पर कोई प्रभाव पड़ता है। हमारी क्रिया का कोई महत्त्व नहीं होता। महत्त्व भाव और श्रद्धा का होता है। एक तन्त्र का ऊर्जा-सम्बन्ध सूत्र है, वह भी यहाँ बेमानी हो जाता है, क्योंकि वह तब कम करेगा, जब हम उस क्रिया को वहां उस माध्यम पर अकेले कर रहें हो। हजारों व्यक्ति के ऊर्जा समीकरण के साथ हमारा समीकरण मिलगया, तो वह हमें ढूंढेगा कैसे?

इससे 1000 गुणा लाभप्रद होगा कि हम आधा घंटा घर में बैठकर मानसिक स्तर पर शनि की शिला पर तेल अर्पित करें और शरीर में तेल का मर्दन करके (सिर सहित) नहायें। इसी प्रकार जो अपने सिर के चन्द्रमा से जल खींचकर मानसिक रूप से मूलाधार पर गिरता है; वही शिवलिंग पर सच्चा जल अर्पण करता है, क्योंकि यही वास्तविक जल चढ़ाना है। सिर के चाँद के ऊपर ब्रह्माण्ड की ऊर्जा से गंगा की ऊर्जाधारा अवतरित होता है। यही वास्तविक गंगा है; जो ब्रहम रन्ध्र पर गिरती है। यही हमारा जीवन अमृत है , जिससे हमारा शरीर सड़ता नहीं और अस्तित्त्व कायम रहता है। यहाँ से जल लेकर मूलाधार पर उसकी धार गिराना ही शिवलिंग पर वास्तविक जल अर्पण करना है। बाहरी दुनिया में सब प्रतीकात्मक है।

हमने देखा है लाखों लोगों की भीड़ , एक प्रदूषित नदी; जिसके सम्बन्ध में परिक्षण रिपोर्ट बता रहा है कि इसका पानी सिंचाई के भी योग्य नहीं है …. लोग डुबकी लगा रहे है। पाप कट जायेंगे। ऐसे भी कहीं पाप कटता है?.. तब तो पाप करो, साल में एक बार डुबकी मारो , सारा पाप गायब। हमारे धार्मिक स्वरुप में प्रतीकात्मक बातें रह गयी है। जिस गंगा या संगम में डुबकी लगाने की बात कही गयी है, हमें तो उसके बारें में कोई ज्ञान ही नहीं है।

इसलिए महिलाओं को इन बेकार की बातों में नहीं पड़ना चाहिए। और ऐसी समाज सेविकाओं के चक्कर में तो बिलकुल नहीं आना चाहिए, जो प्रोसेसन निकालने , हंगामा करने और चैनलों पर चीखने-चिल्लाने में लगी हुई है। संवैधानिक अधिकारों के लिए संवैधानिक संस्थाएं बनी हुई है। उपचार के रास्ते बने हुए है। इसके लिए अव्यवस्था फ़ैलाने और अशांति उत्पन्न करने की क्या जरूरत है?…….. जब भी किसी समुदाय के हित-अधिकार पर ऐसे हंगामेहोते है; तो निश्चित जानिये उसके पीछे कोई न कोई राजनीतिक सोच विद्यमान है। समाज को नर्क बना देने वाली राजनीतिक सोच विद्यमान है। समाज को नरक बना देने वाली राजनीतिक सोंचें। इनसे बचना चाहिए। खबरिया चैनलों के बहसों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। जरूरत है यह याद रखने की –

कोई रोता नहीं किसी की खातिर ऐ दोस्त ।

सबको अपनी ही हर किसी बात पर रोना आया।

Leave a Reply

Top