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पृथ्वी जैसे गृह पर जंतु एवं वनस्पति जगत की उत्पत्ति

जीवन की उत्पत्ति क नियम
ब्रम्हांड के सभी पिंड पॉजिटिव-नेगेटिव क्रम में एक दुसरे से जुड़े हुए हैं। हमारे सौर मंडल सूर्य, जो सौर मंडल की इकाई क नाभिक है, पॉजिटिव पिंड है। जो गृह हैं ; वे नेगेटिव पिंड हैं। दोनों से उनके नाभकीय कणों का उत्सर्जन होता है। गृह के नाभकीय कण गृह के अपने चुम्बकीय क्षेत्र में रहते हैं ; परन्तु सूर्य के नाभकीय कण सम्पूर्ण सौर-मंडल में विकरित होते रहते हैं। ये नाभकीय कण ग्रहों पर जाके उनके नाभकीय कणों से संयोग करके जीवाणुओं की उत्पत्ति करते हैं।
पर इनसे केवल शारीरिक सर्किट बनता है। यह सर्किट निर्जीव होता है और गृह एवं सूर्य की शक्ति से कुछ समय के लिए सक्रिय रहता है। इसमें जब ब्रम्हांड क नाभिकीय कण समा जाता है; तब यह जीवित होकर अपनी स्व की क्रिया से विकास करने लगता है। विकसित होने पर ये परजीवी जीव स्वयं अपने अपने पॉजिटिव-नेगेटिव नाभिकीय कणों क उत्सर्जन करने लगते हैं और आपस में संयोग कर अपनी प्रतिलिपियों के जीवाणु बनाते हैं; पर जीवन उनमें भी तभी आता है जब ब्रम्हांड का नाभिकीय कण समा जाता है।

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