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पूजा गृह और उसमें यंत्रों की स्थापना कैसे करें?

घर में पूजा गृह समतल छतवाली बनानी चाहिए। शंकु के आकार की गोल छतवाला पूजा गृह घर में बनाना उचित नहीं है। इसे अशुभ समझा जाता है।

पूजा गृह का स्थान ईशान कोण (पूर्व+उत्तर) होता है; परन्तु यहाँ स्थान न होने पर इसे नैऋत्य में भी स्थापित किया जा सकता है। पश्चिम के मध्य में पूर्व मुखी पूजा गृह, उत्तर के मध्य में दक्षिण मुखी पूजा गृह भी प्रशस्त है।

इसके विपरीत अग्नि कोण (पूरब+ दक्षिण) का पूजा गृह युद्ध , संघर्ष , आक्रमकता , गर्मी और क्रोध बढ़ाता है। इन कार्यों में सफलता एवं इन गुणों की वृद्धि के लिए अग्नि कोण में भी पूजा की जाती है। वायव्य कोण (पश्चिम + उत्तर) का पूजा गृह जीवन को सदा अव्यवस्थित और तीव्र रखता है। कभी तेज हवा, कभी घुटन , कभी व्यर्थ का चक्कर प्राप्त होता है। यहाँ मानसिक शांति प्राप्त नहीं होती।

पिरामिड जैसी शंक्वाकार छतवाला पूजा गृह वैराग्य की उत्पत्ति  करता है। इससे नपुंसकता , दरिद्रता, उदासीनता और भौतिक सुखों के प्रति हानि होती है। पूजा गृह में गृहस्वामी की उँगलियों की चौड़ाई माप से 9 अंगुल से अधिक की धातु या पत्थर की मूर्ती नहीं रखनी चाहिए। यह दोनों स्थितियाँ जिस ऊर्जा का  उत्पादन करती है, वे गृहस्थों के लिए अच्छी नहीं होती। कागज़ की फ्रेम किये हुए चित्र शुभ होते है। प्रयास करें की फ्रेम शीशा का न हो। या कागज़ ही रखें या लैमिनेट फ्रेम का प्रयोग करें। शीशा बुध है, पूजा गृह बृहस्पति। इन दोनों में  झगड़ा होता है।

पूजा गृह में आप कम से कम देवी-देवता रखें। एक समय में कोई एक ही ईष्ट बनाएं, शेष को धूप-दीप फूल से पूजा कर लें, पर यदि कोई मंत्र जपते है या ध्यान लगते है , तो ईष्ट एक रखें।  यदि अत्यंत आवश्यकता पर दो ईष्ट के मंत्र जपते है, तो इन्हें सुबह शाम में बांटें और दोनों का आपसी टकराव देख लें। जिस प्रकार ग्रहों  में टकराव होता है, देवी-देवता में भी होता है।

यन्त्र की स्थापना पूजा गृह में ऐसे करें की वह बैठने पर आँखों के सामने हो या अन्यत्र भी कर सकते हैं; पर ऐसे की जब बैठे तब आपका मुख उत्तर या पूर्व में हो। पश्चिम  मुखी पूजा वैराग्य के लिए और दक्षिण मुखी शत्रु विजय या संघर्ष में शक्ति के लिए की जाती है। क्रूर अभिचार कर्म में भी दक्षिण मुखी पूजा की जाती है। कभी भी उच्चाटन, विद्वेषण आदि क्रियाओं के लिए गुरु की उपस्थिति के बिना  स्वयं  न  पूजा न करें।  ये अति भयानक होती हैं। ये क्रियाएं गृहस्थ पूजा नहीं है।

चार पायोंवाला मन्दिर सवा हाथ से कम भुजाओं वाला न बनाएं। यह 1.85 फीट के लगभग होता है। ये भुजाये एक जैसी होनी चाहिए।

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