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पुनर्जन्म, आत्मा, जीवात्मा एवं प्रेतात्मा का सनातन रहस्य

इन विषयों पर हम पहले भी प्रकाश डाल चुके है. पर लगता है किसी विषय को जानने समझने के लिए लोग पूरी वेबसाइट पर उस विषय का अध्ययन नहीं करते. स्मरण रखें यह आध्यात्म है इसे टुकड़ों में नहीं समझा जा सकता. यह एक ही विज्ञान है, जो बरगद के पेड़ की तरह जंगल बना हुआ है. आपका पूजापाठ, आपके मंदिर, आपकी आद्यात्मिक व्याख्याएं, आपके देवी -देवता, आपके समस्त प्राचीन विद्याओं के सूत्र और नियम, मन्त्र तंत्र, वेद -पुराण या जो भी भारतीय संस्कृति का सनातन धर्मी जगत है वह इसी विज्ञान पर खड़ा है. इन सबको जानना है, तो पूरा विज्ञान आधुनिक विज्ञान के स्तर पर जानना होगा. तभी आप इस अद्भुत विज्ञान को विश्व में मान्यता दिलवा पाएंगे, जो आधुनिक वैज्ञानिकों को भी हत प्रभ कर देने वाला है. धर्मालय इसी उदेश्य से स्थपित किया गया है. पर पूरा पढ़िए और केवल अपने लाभ की मत सोचिये. जिसे देखो सिद्ध पुरुष बनाना चाहता है, पर इनमें कोई ऐसा नहीं जो निष्काम भाव से रिस्क ले और कहे कि हम पाच दस लाख जुटा सकते हैं, एक संस्था बना कर इस विज्ञान के सूत्रों पर कुछ एक्सपेरिमेंट किया जाये. और ये लोग जानना चाहते हैं कि हमारे पास जब इतना परिष्कृत विज्ञान था, तो हम पिछड़ कैसे गए?

आत्मा का अर्थ सार होता है. आत्मा का अर्थ ‘सार’ है और परमात्मा का परमसार. इसी प्रकार जीवात्मा का अर्थ, जीव का सार है और प्रेतात्मा का अर्थ शेष का सार है. यह शेष विशेष रूप से समझने का विषय है.

आधुनिक विज्ञान की समझ से बाहर है कि इकाइयों की उत्पत्ति किस प्रकार होती है? वह कौन सा पार्टिकल है, जो पदार्थ का निर्माण करता है? वे जिस रस्ते चल रहें हैं, यह उम्मीद भी नहीं है कि वे सत्य तक पहुँच पायेंगे. परन्तु सनातन धर्म के वर्णन का प्रारंभ ही यहीं से होता है. वे न्यूटन – आइन्स्टीन को नहीं जानते थे, आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली का भी उन्हें ज्ञान नहीं था; तो हमें उनके कथनों को समझना तो पड़ेगा ही? पर हम पहले से मानें बठे हैं की वे सपेरे चरवाहे थे, तो हम कैसे उनके द्वारा दिए रत्नों से लाभ उठा सकते हैं?

हम पहले बता आयें हैं कि परम सार के फैलाव में पहली क्रिया विस्फोट से प्रारंभ होती है और एक भंवर अस्तित्व में आता है, जो तत्व की धाराओं का एक पावर सरकिट बना लेता है. यहाँ तीन नियम एक साथ उदित होते हैं. विस्फोट के बाद एक निश्चित संरचना की उत्त्पति, क्रिया की समान विपरीत उलटी प्रतिक्रिया, और दोनों के मिलन से इकाई के भ्रूण का बनाना. यह सब निश्चित नियमों से घटित होता है.

पहली संरचना एक परमाणु के रूप में होती है तंत्र ग्रंथों में इसे अणु कहा गया है, जिसका अर्थ आधनिक परमाणु ही है, क्योंकि सनातन धर्म में परम सार परमात्मा है. वैदिक ऋषियों ने इसे आत्मा यानि सार कहा है कुछ नियमों से यह परमाणु स्वचालित हो जाता है और मूल तत्व को खींच खींच कर अपना विस्तार करने लगता है. यह सब निश्चित नियमों की क्रमबद्धता से होता है. इसमें ही एक नियम यह है की हर इकाई एक निश्चित परिपक्वता के बाद अपने नाभकीय कणों का उत्सर्जन करने लगता है. यह इसी पहली संरचना से अस्तित्व में आता है. अपना विस्तार करती हुई यह प्रथम उत्त्पति अपने नाभकीय कण उत्सर्जन करने लगाती है और अंतर धाराओं के विस्फोट से बनानेवाली संरचनाओं के केंद्र में अपनी ही अंतर धाराओं में गमन करतीं हुई समा जातीं हैं और वह स्वतंत्र रूप से मुख्य संरचना की धाराओं से ही मूल तत्व खींचने लगती है. इस प्रकार यह ब्रहमांड बरगद के वृक्ष की तरह नयी नयी इकाइयों की उत्पत्ति करता हुआ फ़ैल रहा है. यह विशाल विज्ञान है. डिटेल में ५००० पेज चाहिए और यह राष्ट्र हित में भी नहीं होगा.

जहाँ जहाँ +,- के क्रम में धाराएँ टकराती हैं या नाभकीय कण टकराते है विस्फोट होता है और पहले की तरह सारे नियम एक एक कर लागू होने लगते हैं और पहले जैसी संरचना में पावर सर्किट बन जाता है. पर यह स्वचालित या जीवित तब होता है जब इसमें ब्रहमांड का नाभकीय कण समा जाता है, सभी अवतारों से ले कर सभी शाखाओं के आचार्यों ने इसे ही वास्तविक जीव माना है यही अनुभूति करता है और यही भोक्ता है. यह ब्रहमांड की आयु तक जीवित रहता है यह जिस संरचना के शरीर में रहता है उसी के आनुसार उसके पावर सर्किट के समीकरण में ट्यून हो जाता है और उस सर्किट की क्रिया के अनुसार इसकी ट्यूनिंग होने लगती है. इसका बाहरी शरीर शाश्वत नहीं होता. यह नष्ट हो जाता है और यह मूल कण उस समय जिस ट्यूनिंग में रहता है, उसी में क्रियाशील रहता है, इसलिए उसी समीकरण के आवेश उस पर बनते रहते हैं. उसे अपने समीकरण में निगेटिव की तलाश होती है और वह उसी समीकरण के क्षेत्र में घूमता रहता है. ब्रह्माण्ड में नए शरीर बनते रहते हैं, इस कण को जसे ही अपना समीकरण मिलता है, उस शरीर में समा जाता है और उसके अनुसार ट्यूनड हो जाता है, तब उसे पिछला जीवन याद नहीं रहता. प्रत्येक इकाई के केंद्र में एक नाभीक होता है. यह नाभिक ही आत्मा का किला है यह इसके केंद्र में रहता है. इस नाभिक को सनातन धर्म में जीवात्मा, या सूर्य कहा गया है.

जब किसी शरीर का केवल बहरी स्तर नष्ट हो जाता है, सूक्ष्म उर्जा शरीर बना ही रहता है, तो वह पूर्व के ही जीवन को दुःख दाई हालत में भोगता है. इसे विस्तार से जानने के लिए धर्मालय में प्रेतात्मा से सम्बंधित विषय देखें. (किसी भी बहरी प्रकोपों या किया कराया के लिए तस्वीर सहित पूरी बात लिखा करें. यह लाखों प्रकार के हो सकतें हैं और निदान भी उनके अनुसार होता है. ब्रीफ लिखने से कोई उत्तर नहीं जायेगा)

Research by Prem Kumar Sharma

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