आप यहाँ हैं
धर्मालय > गंडे-ताबीज-टोने-टोटके-यंत्र .. > पिरामिडों से भाग्य कैसे प्रभावित होता है?

पिरामिडों से भाग्य कैसे प्रभावित होता है?

इनसे भाग्य पर परोक्ष प्रभाव पड़ता है। पिरामिड धातु एवं पत्थरों का होना चाहिए। इसमें तन्त्र के ‘अभाव’ का सूत्र काम करता है। इस विश्व के कण –कण में अभाव है और सभी अपने अभाव के समीकरण में वातावरण से ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं। इसी से सबका अस्तित्त्व है। जहाँ अभाव नहीं , वहां पूर्ती नहीं और जाह्न पूर्ती नहीं ,वहाँ क्रिया नहीं; जहाँ क्रिया नहीं ; वहां अस्तित्त्व की कल्पना ही बेमानी है। क्रियाहीन होकर रहने की क्षमता केवल मूल-तत्व में है; ब्रह्माण्ड के भौतिक अस्तित्त्व में नहीं , भले ही वह कोई ऊर्जा ही क्यों न हो।

जो पिरामिड आजकल वास्तुदोषों के लिए मिलते है; उनकी संरचना बाहरी है और बाहरी में भी अधूरी हैं। वे खिलौने से अधिक कुछ भी नहीं है। वास्तविक पिरामिड , जो प्रकृति में बनता है, उसे बनाना अत्यंत जटिल है। इस पर मैं कई वर्षों से लगा हुआ हूँ, पर तकनीकी कठिनाईयाँ सामने आ जाती है। ब्राह्य आकृति के पिरामिड भी शक्तिशाली होते है; पर जो उपलब्ध है उनमें जड़े नहीं है। मन्दिर भी उसी संरचना में बनते है। यह आकृति गोल हो या चौकोर विशेष अन्तर नहीं पड़ता; पर बनाने वाले यह भूल गये है कि मन्दिरों, मस्जिदों , गिरजाघरों या मिश्र के मकबरों में धरती के नीचे भी निर्माण होता है। इन बाजार के पिरामिडों में इनकी अवधारणा ही नहीं है।

पिरामिडों की शक्ति धरती की ऊर्जा तरंगों में होती है। जब ये तंरगें उसमें शंक्वाकार रूप धारण करके ऊपर पतली सिरे पर संघनित होती है; तो भैरवी चक्र के सूत्र पर उसके ऊपर उसकी उल्टी प्रतिकृति में पॉजिटिव ऊर्जा बन-बन कर उस पर गिरने लगती है। इससे वहाँ आस-पास ऊर्जात्मक क्षेत्र बदल जाता है, क्योंकि गिरने के समय जब –अजब वह पिरामिड की नोक के नजदीक आती है, एक अन्य ऊर्जा भी उत्पादित होती है और वातावरण में फैलती है।यही ऊर्जा किसी घर या ऑफिस की नेगेटिव ऊर्जा को दूर करती है।

इसके अन्य भी कई फैक्टर हैं। पिरामिड का आकार जितना पड़ा होगा, पॉजिटिव सहित तीसरी ऊर्जा का उत्पादन भी उतना ही अधिक होगा। नोक जितनी पतली होगी, उसमें तीव्रता भी उतनी ही होगी। पिरामिड के निर्माण की वस्तु यानी धातु , पत्थर जो होगा ; वैसे ही समीकरण की ऊर्जा वहाँ बनेगी।

इसे लगाने में भी कुंडली गणना कर लेना चाहिए। कौन सा पिरामिड कितना बड़ा होगा, किस धातु या पत्थर का किस दिशा में लगेगा , यह ज्ञान आवश्यक है। अंधों की तरह नीम हकीम इसे लगाने पर भारी हानि भी हो सकती है, क्योंकि यह देवी-देवता की प्रत्यक्ष स्थापना है, जो बिना पूजा किये अपनी कृपा बरसाते रहते हैं (लम्बे समय तक) । इसे ग्रह से समझना चाहिए। किसी ग्रह की ऊर्जा चाहिए, किसी की नहीं चाहिए। कहीं, सूर्य की आवश्यकता है, तो कहीं बृहस्पति या शनि या बुध या अन्य की (स्थान के अनुसार) तो पिरामिड के निर्माण का मटेरियल बदल जाएगा।

पर लोग समझते हैं कि बस एक पिरामिड लाकर रख लो, सब ठीक हो जाएगा। अपनी-अपनी समझ है और यही आज के जानकार समझा कर दूकानदारी चलाते हैं; पर यह खतरनाक हो सकता है। यह ठीक है कि इसके शास्त्रीय रूप में व्यय अधिक होता है, पर नहीं कर सकते ; तो यह साधन अपनाईये ही मत। लाभ के बदले हानि होगी।

नौ अंगुल का पिरामिड उपयुक्त होता है। उसमें पड़े की तरह जड़े होनी चाहिए। नौ परतों वाला पिरामिड दिव्य शक्ति सम्पन्न होता है। कम से कम चार पिरामिड प्रयुक्त होते ही होते है; क्योंकि कम से कम चार ग्रहों की उलटफेर प्रत्येक की कुंडली में होती है। सामान्यतया ताम्बा, अलमूनियम , शीशा, काले या सफेद पत्थर के पिरामिड, लोहे के चदरे के पिरामिड प्रयुक्त होते है। सोना-चाँदी की जगह स्फटिक , सफेद पत्थर और पीले पत्थर का प्रयोग किया जाता है। जड़ बनाने के लिए पत्थर को ही काटा जाता है। पर अब इन्हें प्राप्त करना कठिन है। ये बाजार में नहीं मिलते। अपने-अपने लिए बनवाना होगा।

धर्मालय के साधनाओं की सी.डी. प्राप्त करने हेतु यहाँ क्लिक करें

Email- info@dharmalay.com

Leave a Reply

Top