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पारद श्री चक्र स्थापना और पूजन विधि

  1. स्थापना और गुरु नमन – हमारे यहाँ से जो श्री चक्र भेजा जाता है; वह पंचगव्य और नारियल पानी से शास्त्रानुसार अभिषेक करके गुरु पादुका यन्त्रों से पूजित और 540 श्री मंत्र से सिद्ध किया होता है; इसलिए इसकी विशेष सिद्धि या शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। इसे ताम्बा , पीतल या चाँदी के प्लेट के मध्य रखकर पूजाघर में स्थापित करें। इसके बाद लाल रंग के सूती या ऊनी आसन पर ढीले वस्त्र में बैठकर गुरु का स्मरण करके ‘ॐ ….. गुरु देवाय नमः’ से 9 बार मंत्र जप करके सिर पर जल छिड़के (शास्त्रीय रूपों में पन्थ विशेष के अनुसार भिन्नता है। यह सबसे सरल रूप है) इसके बाद – दोनों कान और मुख को दिव्यौध गुरु, दोनों आँखें और लिंग को सिद्धौध गुरु, दो नासिका और मल द्वार को मान वौध गुरु के रूप में गुरु मंत्र से अभिषेक करें।
  2. तिथि-नक्षत्र – यह स्थापना कार्य पंचमी, दशमी या पूर्णिमा या अमावस्या को करना चाहिए। इस तिथि को वृषभ , सिंह, वृश्चिक , कुम्भ हो तो और उत्तम है।
  3. कलश स्थापना – एक घड़े में शुद्ध जल भर कर मंत्र के नीचे साधारण षट्कोणी श्री चकरा बनाकर उसके मध्य घड़ा रखना चाहिए। इसमें 50 मातृका वर्णों की 50 औषधियों को डालने का निर्देश है; पर इनमें से आज बहुत से दुर्लभ हैं। इसलिए नौ ग्रहों की वनस्पतियाँ पीपल, बरगद, कटहल, मदार, अपामार्ग , गूलर, शमी या बबूल , महुआ आदि जितने मिल सकें उसके फूल फल या पत्ते डालकर इसे लाल कपड़े से ढककर इस pr नारियल रखकर इसे श्री शक्ति मानकर आगे दिए मूल मन्त्रों पूजा करके (मंत्र आगे है। मात्र 21 मन्त्रों से पूजा करें। हर मंत्र पर इस पर ओडहुल का फूल और कुश से जल छींटें ) । ऐसी भावना करें कि कलश में यंत्र की देवी की शक्ति ज्योति है।
  4. प्रतिदिन मन्त्र जप – प्रथम दिन इस प्रकार इस यंत्र की स्थपना करके मात्र 21 मन्त्र जप कर पुहा समाप्त कर लें। अगले दिन से निश्चित समय पर निश्चित संख्या में (अपनी सामर्थ्य के अनुसार) मन्त्र का जाप करें।
  5. सिद्ध और हवन – अक्सर लोग पूछते है कि किसी या इस मन्त्र की सिद्धि कितने दिनों में हो जाएगी। शास्त्रों में सबकी संख्याएं भी दी हुई है , पर चावल कितनी देर में पकेगा, यह उसपर लगने वाली आंच पर निर्भर करता है। आध्यात्मिक सिद्धियाँ मानसिक रूप से मन्त्र और ईष्ट शक्ति में डूबकर मंत्र जपने से मिलती है , संख्या से नहीं। लाखों जपकर भी कुछ नहीं मिलेगा और कुछ हजार में ही अचम्भा होने लगेगा। यह पूर्णतया सत्य है और इसके परिणाम इतने चमत्कारी होते हैं कि अनेक बार मैं भी हतप्रद होकर सोचता हूँ कि यह कैसे हो जाता है?

 

जब पूजा समाप्त करना चाहें, तो जितनी संख्या में मंत्र जपा है, उसके 10% मन्त्र से हवन करें। हवन में क्रमांक 3 की वनस्पतियों की लकड़ी और घी , दूध, मधु , तिल, जौ, चावल, फूल, आदि की सामग्री का प्रयोग करें। नारियल भी किया जाता है। बादाम, फल, मेवा आदि भी। यह शाकाहारी विधि है। तांत्रिक विधि अलग होती अहि और उसमें मांस-शराब-प्याज-लहसुन आदि का हवन किया जाता है।

  1. दीपक – सामान्य घी का दीपक जलाएं ।
  2. दिशा – अपना मुंह उत्तर की ओर रखें।
  3. वस्त्र-आसन – लाल सूती या ऊनी। वस्त्र पूर्णतया ढीला रखें।
  4. न्यास आदि
  • कर शुद्धि मन्त्र – ‘ॐ आं सौ:’ मंत्र से जल द्वारा हाथ धोने के बाद कर तल और कर पृष्ट का क्रमश: स्पर्श करके तीन-तीन बार मंत्र पढना चाहिए
  • अंग न्यास – सिर से प्रारंभ करके (चाँद से) पैरों के पंजों तक प्रत्येक अंग विशेष का स्पर्श ऊपर नीचे के क्रम में तीन बार करें। मन्त्र – ‘ह्रीं श्रीं ऐं …. नमः’ खाली स्थान में अंग का नाम कहें।
  • आवाहन मंत्र और विधि – इसके बाद श्री यंत्र और कलश पर नौ-नौ बार आवाहन मंत्र पढ़ते हुए श्री देवी का आवाहन करें। इनका स्वरुप पूर्ण यौवना राजसी वस्त्रों मुकुट आदि से युक्त सुनहले रंग की युवती है, जो प्रेम-वात्सल्य से भरी मुस्कुरा रही है और दायाँ हाथ वरदान देने की मुद्रा में है। इनके पैरों में भी पायल आदि है और ये कमल पर खड़ी है।

पूजा करनेवाले को यह काम पूर्ण मानसिक एकाग्रता और दृढ कल्पना के साथ करनी चाहिए कि देवी का जगमगाता स्वरुप यंत्र में कलश में अवतरित हो रहा है। फिर नौ मन्त्रों से स्वयं में भी इस आवाहन को करना चाहिए।

गुरु , यंत्र, कलश, स्वयं और मंत्र – इन पाँचों में ‘श्री देवी’ ही हैं , ऐसी कल्पना करके ही जप होता है। जितना इस स्वरुप में डूबेंगे , सफलता उतनी ही तीव्र और शक्तिशाली होगी। जप के समय इसी रूप में डूबें।

 

  • जप मन्त्र – ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्रीं नमः
  • पूजा स्थल – ईशान कोण , पूर्व या उत्तर में होना चाहिए । आसन उत्तरमुखी लगायें।

विशेष – यह पूजा विधि सामान्य गृहस्थयों के लिए है। शास्त्रीय स्वरुप अत्यंत जटिल और आज के युग में असम्भव है। इसलिए इसे अत्यंत सरल और संक्षिप्त किया गया है। यह शास्त्र की ही विधि है, पर इसके मूल वैज्ञानिक और आवश्यक तथ्य ही लिए गये हैं। आज न तो मनुष्य के पास इतना समय है, न ही सामान मिलते हैं , ही वह कलश में नवरत्न डाल सकता है, न ही सारा दिन सुबह से रात तक केवल इसी में लगा रह सकता है। इसलिए इससे सामान्य स्त्री/पुरुष भी पूरा लाभ उठा सके, इस स्वरुप में केवल इसके आवश्यक वैज्ञानिक क्रियाओं को लिया गया है। तामझाम हटा दिए गये है।

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