पारद एवं अन्य शिवलिंगों पर विशेष

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पारद के शिवलिंग बाजार में उपलब्ध होते है। गर्म करने पर ये क्षरित होने लगते हैं। इससे यह तो ज्ञात होता है कि इसमें पारद है; पर वह रासायनिक योग से ठोस बनाया गया है। याह शोधित पारद नहीं होता। शिवलिंग के निर्माण में शोधित पारद की आवश्यकता भी नहीं है। इसका प्रयोग औषधि के क्षेत्र में होता है। सामान्य पारद और इसके पारद में अशुद्धि और साइडइफ़ेक्ट को दूर करने का अन्तर होता है। पारद एक विषैला पदार्थ है। औषधि भस्म आदि में इसे शोधित करके इसके विषैले प्रभाव को दूर किया जाता है। शिवलिंगों में इसकी आवश्यकता नहीं होती।

हमें शिवलिंगों के अंदर छुपे विज्ञान को समझना चाहिए; अंधी आस्था से कोई फल प्राप्त नहीं होता। शिवलिंग चाहे किसी भी मटेरियल का हो, उसका बेस धरती से जुड़ा होना चाहिए। लोग धातु की तस्तरी में रख देते हैं ; पर यह लकड़ी के पीढ़े या पूजा बेस पर रखा होता है। लाभ होता है, पर केवल 25%। होता यह है कि धरती से जुड़े होने पर पृथ्वी की तरगों का गमन इसमें होता है। इससे इसके ऊपर उल्टा दिव्य शिवलिंग का ऊर्जा रूप प्रकट होता है और पॉजिटिव होने के कारण इस पर गिरने लगता है। यह प्राकृतिक सूत्र है। यह बनता गिरता, फिर बनता-गिरता रहता है। इस चढाया जल इस ऊर्जा से आयनित होता है। तन्त्र में इसे शिवसार (शिव वीर्य/ शिव ऊर्जा) कहा जाता है। इसी अमृत ऊर्जा के कारण शिवलिंगों की महिमा है।

अब यदि शिवलिंग सोने का है , तो यह ऊर्जा अलग प्रकार की होगी, चाँदी का है, तो अलग प्रकार की। इसी प्रकार पारद, पत्थर, मिट्टी, ताम्बे, आदि के शिवलिंगों की शक्ति में अंतर आ जाता है।

इन्हें शक्तिकृत करने के लिए हम एक विशेष तकनीकी को अपनाते है, जिससे ये विशेष शक्तिकृत हो जाते है। समस्त धातु से निर्मित शिवलिंगों के लिए, हम इसे पहले पानी में डाल देते है और उसमें चार्जर से 1.5 से 6 वोल्ट तक (साइज़ के अनुसार) 72 घंटे बिजली प्रवाहित करते हैं। इससे इनके अंदर के अणु विशेष स्थिति में आ जाते है और उनका समीकरण बदल जाता है। इसके बाद इन्हें विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है। तब हम इन्हें मंत्र सिद्ध करते हैं। उसमें भी जप करनेवाला पंडित भाव-मन से उसे सिद्ध करनेवला होना चाहिए।

कुछ लोगों को लगता है कि संभवतः मैं इसका व्यवसाय करना चाहता हूँ , पर यह संभव ही नहीं है। एक-बार में एक ही माला या शिवलिंग या यंत्र या मूर्ती प्राण प्रतिष्ठित किये जा सकते अहिं और एक में तीन से पांच दिन लगते हैं। कोई व्यवस्था हो ही नहीं सकता।

व्यवसाय के लिए हम कुछ प्रयोग में लगे हैं। जब ये चमत्कारिक यंत्र (मशीन) बन जायेंगे, तब शायद इनका उत्पादन व्यवसायिक रूप से किया जा सके, पर प्राचीनतम विद्याओं में व्यवसायिक स्कोप की कोई जगह ही नहीं है।

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