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पानी पर पिरामिडों के प्रयोग

सैद्धांतिक खण्ड में हम इसका पूरा विवरण दे आये हैं कि किसी पिरामिड को शीर्ष पर पतला छेद हो और उस पर से पानी बूंदों या पतली धारा के रूप में उसके धरातल के केंद्र में स्थापित शिवलिंग पर गिरने से उस पानी के गुणों में क्या परिवर्तन होता है, पर यह सूत्र एक जटिल प्रयोग से सम्बन्धित है और इसमें कई मानकों का ध्यान रखना पड़ता है, परन्तु सादे प्राकृतिक भूगर्भ या किसी साफ नदी या ताल का पानी लेकर उसको भी पिरामिडों की सहायता से औषधि के चमत्कारिक गुणों से संतृप्त किया जा सकता है |

वस्तुतः पानी पर किया गया यह प्रयोग सूर्य के प्रकाश से पिरामिडों द्वारा अपेक्षित गुणों के दोहन का प्रयत्न है | यह कुछ विशिष्ट प्रकार की ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का रिसीवर बनकर पानी को उससे संतृप्त करता है | यहां स्मरणीय है कि इस सृष्टि की जो भी प्राकृतिक इकाइयां हैं, वे इसी ऊर्जा से विकसित होती है पृथ्वी के जीवन पर (चरजीव) पृथ्वी की तरंगों का भी योग होता है | इसी प्रकार सौरमंडल में यह सूर्य की तरंगों से प्रतिक्रिया करके पुरे सौरमण्डल में एक ऊर्जा क्षेत्र बनाती है | यह ऊर्जा ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की प्रकृति की होती है, पर यह शुद्ध ब्रह्माण्डीय ऊर्जा नहीं है | इसके लाखों वर्गीकृत स्तर हैं और एक-एक में लाखों क्षेत्र हैं |

इन सब अन्तरों के बाद भी सबका निर्माण सूत्र एक है, सबकी संरचना (पॉवर सर्किट) एक है | जीव एवं वनस्पतियों की उत्पत्ति में पिरामिडीय आकृतियों के संयोजन का विज्ञान हमने पुस्कत में अन्य जगह में स्पष्ट किया है | इससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि भारतीय ज्योतिष, सामुद्रिक विद्या आदि में कौन-सा सूत्र काम कर रहा है | आपको विस्मय होगा कि यह सारा विज्ञान पिरामिडीय ऊर्जा संरचना पर ही आधारित है | प्रथम शिवलिंग एक ऊर्जा पिरामिड ही है और यही समस्त सृष्टि का कारण है |

इसी सूत्र पर जब हम किसी पिरामिड का प्रयोग करते हैं, पृथ्वी की तरंगें शंक्वाकार होती हैं और इसके परिणामस्वरूप उसके ऊपर उसी की उलटी प्रतिछवि उत्पन्न होती है | ये दोनों समा जाते हैं और पंप करने लगते हैं | इससे निरंतर ऊर्जा प्रवाह पिरामिड के धरातल के केंद्र में जारी हो जाता है |

सादे पानी पर यह प्रयोग रात-दिन निरंतर २४ घण्टे करना चाहिए | पानी आसवित (डिस्टिल) हो, तो सात दिन तक प्रयोग करने से वह एक तीव्र प्रभावक दवा बन जाती है | इसका विवरण इस प्रकार है :-

शरीर के अंगो के रोग          पिरामिड के रंग स्नायविक/रक्तविकार आदि
सिर श्वेत स्मरणशक्ति, कल्पनाशक्ति
आंखे पीत दय विकार, भावुकता
कान नारंगी उदर विकार, स्थूलता
बाल नीला नख विकार, अस्थि विकार
दांत आसमानी अस्थि विकार, बालनख विकार
गर्दन बैंगनी कंठ विकार, आवाज़ विकार
कंधे तांबई रीढ़ के विकार, हाथों के विकार
छाती सुनहला ह्रदय विकार, श्वास दोष
पेट नारंगी उदर विकार, स्थूलता
कमर हरा क्रियाशीलता, उत्साह
कमर की हड्डी लाल

रक्तविकार, रक्ताल्पता, लाल कणों की कमी  

जनेन्द्रिय गुदा मार्ग नीला+लाल

नपुंसकता, बन्ध्यापन, दांत, बाल, नख बुखार

जंघाएं, नितम्ब नीला  
घुटने और उसके निचे नीला  

 

उपर्युक्त अंगों के सभी दोष इस प्रकार के संतृप्त जल से दूर हो जाते हैं | यह जल ब्रह्ममुहूर्त में पान करना चाहिए, वह भी पवित्र होकर | सादे जल की मात्रा 100 मिo लीटर और आसवित जल की 20 मिo लीटर होना चाहिए |

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