आप यहाँ हैं
धर्मालय > धर्म का ज्ञान क्षेत्र > पंचतत्व का वैज्ञानिक स्वरुप

पंचतत्व का वैज्ञानिक स्वरुप

पंचतत्व का वैज्ञानिक स्वरुप

हमारे एक जिज्ञासु ने फोने करके पूछा है कि अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु और आकाश तत्व नहीं है। फिर इन तत्वों से भौतिक अस्तित्त्व के निर्माण की बात वैज्ञानिक किस प्रकार है? सनातन धर्म का विज्ञान ही विकसित था; तो इतनी अज्ञानता से भरी बातें उसमें कैसे व्याप्त है?

उत्तर – इसे समझने के लिए सबसे पहले ‘तत्व’ की परिभाषा पर ध्यान देना होगा। इसकी परिभाषा है कि ‘ जो खंडित नहीं किया जा सके; वह तत्व है ।’ – आधुनिक विज्ञान ने जिन सौ से अधिक तत्वों की सूची बनाई है; वे सभी खंडित होकर ऊर्जारूप धारण कर लेते है। आधुनिक विज्ञान ऊर्जा को भौतिक न मानकर इन तत्वों को भौतिक रूप से खंडित न होने वाला मानता है; जबकि आइन्स्टीन का E=mc(square) का सूत्र कह रहा है कि इनके खंडित होने पर जो ऊर्जा प्राप्त हो रही है ; वह पदार्थ का ही एक रूप है।

सनातन धर्म का ‘तत्व’ परमात्मा है अर्थात् 0 । एक ऐसा तत्व , जो गुण, धर्म, आकार, रंग, क्रिया से परे है और इसलिए वह भौतिक नहीं है। इस सर्व चैतन्य तत्व में जब इसकी धाराओं से पहले परमाणु की उत्पत्ति होती है ; तो उसमें पहले तीन, फिर पांच पॉवर-पॉइंट बन जाते हैं। इनसे पांच प्रकार की ऊर्जा निकलती है । (ये ही तन्त्र और योग में पांच से 9 में विक्सित होते है) ये पाँचों परमात्म तत्व के बाद पहली भौतिक उत्पत्ति है। इसी से उस परमाणु का शरीर अस्तित्त्व में होता है। इसलिए ये पांच ऊर्जा तरंग – पंचभूत, पंच देवता, पंच तत्व कहे जाते है। चूँकि जो यह पहला परमाणु है , वही ब्रह्माण्ड है , वही इकाई है( संरचना आदि कि दृष्टि से), इसलिए प्रत्येक प्राकृतिक इकाई का, चाहे वह परमाणु हो या तारा – मनुष्य हो या जानवर का अस्तित्त्व इन्हीं पाँचों तरंगों पर निर्भर करता है। ये परमात्म तत्त्व के बाद – पहली स्थूलता है, पहला भौतिक स्वरुप है ‘तत्व’ का । इसलिए इसे भूत अर्थात भौतिक की संज्ञा से विभूषित किया गया है। पहले विशेषण लगाकर ‘तत्व’ जोड़ने का भी मतलब यही है कि ये ऊर्जा रूप खंडित नहीं किये जा सकते । इनके पहले जो ‘तत्व रूप’ है; वह भौतिक नहीं है।

पृथ्वी तत्व – सबसे पहले तो ‘पृथ्वी’ शब्द का अर्थ आप ग्रह से ले रहे है; या मिट्टी मान रहे है; यही गलत है। पृथ्वी का अर्थ ‘ठोस’ है और इस शब्द का अर्थ यह है कि जो तरंगे भौतिक अस्तित्त्व में ठोसतत्व या आधार का निर्माण करती है; वे पृथ्वी तत्व है।

जल तत्व – यहाँ जल का अर्थ तरल है।

वायु तत्व – यहाँ वायु का अर्थ कोई भी गैसीय रूप है।

अग्नि तत्व – किसी भी पदार्थ में जो गर्मी होती है, वह उसके नाभिक से उत्पन्न होती है। यहाँ इसका यह अर्थ है।

आकाश तत्व – यह आकार है। ऐसी तरंगे जो आकार निर्मित करती है। ये पदार्थ के + पोल की ऊर्जा है।

 

यह सनातन धर्म का पदार्थ विज्ञान है; जो कहता है कि किसी भी पदार्थ का अस्तित्त्व इन पांच के उर्जा समीकरणों पर निर्भर करता है। इनके समीकरण पर ही कोई पदार्थ ठोस, तरल, गैस, का रूप बनाती है। इन्ही से उनका फैलाव बनता है और उसके अंदर एनर्जी उत्पन्न होती है।

कहते है कि मूर्खों के सिर पर सिंग नहीं होते। वे देखने में आदमी जैसे ही लगते है। मुर्ख तो वे लोग है; जो सनातन धर्म के सूत्रों की व्याख्या; अपने पारिभाषिक शब्दों से कर रहे है। उन्हें ‘तत्व’ , पृथ्वी , जल, वायु, अग्नि का अर्थ सनातन धर्म से लगाना चाहिए था और वेदों के ऋषियों को देख्गना चाहिए था – ‘ हे मेरे हृदय में निवास करनेवाली अग्नि, तुम मुझे बल दो , बुद्धि दो…।’ किस अग्नि की स्तुति है यह? यह नाभिक की एनर्जी की स्तुति है। इसीलिए सूर्य की पूजा की जाती है और ब्रह्माण्ड के नाभिक को विष्णु कहा जाता है।

संस्कृत के प्राचीन शब्दों का अर्थ अमेरिकन परिभाषा से करेंगे; तो क्या मिलेगा? अरेबियन नाइट्स में पहुँच जायेंगे।….. और यही हम कर रहे है?

 

One thought on “पंचतत्व का वैज्ञानिक स्वरुप

  1. प्रणाम श्री मान,
    sri maan ji kal main aapko ek mail kiya tha apni samsya k bare me aur uska koi upaye janne k liye
    mere mob nbr pr to aaj subh aapka msg mujh ko mil gya tha jisme likha tha ki hmne aapke email address pr mail kr diya hai , pr durbhagye vas meri gmail id pr aapka koi mail mujh ko prapat nhi hua
    sri maan ho sakta hai kisi takniki samsya k chalte na aa paya ho
    sri maan kya aap mujh ko meri samsya k bare me dobara se bta sakte hai aapki ati kripa hogi
    dhanyewad ji

Leave a Reply

Top