नारी की पुरुषों से उच्च सत्ता होती है [ यही तंत्र व्याख्या है ] ब्रहमांड रहस्य

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पहले मुर्गी पैदा हुआ या अंडा ? यह प्रश्न युवा अवस्था में दोस्तों में हास्य का विषय बना रहता था .इस बीच में डार्विन को पढ़ा तो और भी हंसी आई कि आदमी तो बन्दर से पैदा हुआ ,पहला जीव किससे पैदा हुआ ?आम का वृक्ष किससे पैदा हुआ?तब एक नयी जानकारी मिली कि पृथ्वी सूर्य से टूट कर बना है ,और मैं रियक्ट कर गया . ये मूर्ख अपनी ही जानकारियों से भ्रम पैदा कर रहे हैं .भला विस्फोट से कई दिशाओं में चल रहा घूर्णन बल कैसे उत्पन्न हो सकता है ? जो संरचना सौर मंडल की बता रहे हैं वही परमाणुओं में भी बता रहें हैं और यह नहीं बताते कि आकस्मिक विस्फोट से किस प्रकार इनकी उत्पत्ति हो सकती है ?वह क्या है जो मैटर को बनाने का मूल मैटेरिअल बना हुआ है ? जड़ में क्रिया कैसे हो रही है ?चेतना
क्या है ? इन प्रश्नों का कोई उत्तर इन वैज्ञानिक व्याख्याओं में प्राप्त नहीं हुआ .आशा के विपरीत यह प्राप्त हुआ उस निष्कृष्ट कूड़े से , जिसे हमारें बुद्धिमानो ने जादू टोना और अंधी आस्था कह कर गटर की गन्दगी साबित कर दिया है ,और आज हमें इस कथन की सत्यता मालूम हो रही है कि बूड़े वंश कबीर के उपजे पूत कमाल .तन्त्र सनातन धर्म का वैज्ञानिक क्षेत्र है ,जिसके हर क्षेत्र को मान कर मंदिरों में सर पटकना हो रहा है ,पूजा करने में उसी के सूत्रों को अपना कर जीवन सुधरने कका दावा कर रहें हैं ‘दुर्गा आदि देवियों ,शिव लिंग .महान है ;पर तंत्र बहुत बुरी चीज है .वह तंत्र ,जो
यह बताता है कि मैटर का मूल एक इनार्जेतिक चेतन तत्व है जो हर भोतिक इनर्जी से सूक्ष्म है .प्रत्येक पदार्थ ,प्रतेक इनर्जी इसी का परिवर्तित रूप है ..यह तत्व शाश्वत है. न यह पैदा होता है ,न इसका नाश होता है .इसमें एक विस्फोट होता है और एक भंवर उठता है ,जो अर्ध प्याले में एक मीनार के रूप में अस्तित्व में आता है ,फिर इसकी प्रतिक्रिया में इसकी उलटी संरचना इसके उपर बनती है ,और दोनों पर विपरीत आवेश होने के कारन दोनों गुथ जाते हैं और एक पावर सर्किट का जन्म होता है ,जिसमें केवल उस मूल तत्व की धाराएँ होतीं है कोई नया पदार्थ नहीं बनता .यह उत्पत्ति निश्चित नियमो से होती है और निश्चित नियमों से ही यह स्वचालित हो कर अपने जैसी संरचनाओं की उत्पत्ति करता हुआ ब्रह्मांड के रूप में विकसित होता है. इसकी सभी रचना केवल मूल तत्व की धाराओं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं . अनुभूति क्षमता के अनुसार इसे हर प्राणी [इकाई] अपने अपने अनुसार अनुभूत करता है और एक मिथ्या जगत को भोगने में लग जाता है .यही भारतीय सनातन धर्म का ज्ञान है ,और इस उत्पन्न होने वाली संरचना का सिस्टम ही तंत्र के रूप में जाना जाता है ,जो सदासिव यानी परम तत्व या मूल तत्व से उत्पन्न होता है .
यहाँ देख रहें हैं कि सबसे फले योनी रूपा निगेटिव संरचना पैदा होती है .इसे भारतीय सनातन धर्म में आधार शक्ति कहा गया है .इसकी प्रतिक्रिया में ही पाजिटिव उत्पन्न होता है .इससे जो ब्रह्मांड उत्पन्न होता है , यह भी नारी शक्ति है .इसका पुरुष परम तत्व है जो इसके सर के शीर्ष के गड्ढे में अपनी शक्ति डालता रहता है ,जिससे इसका पोषण होता है .इसके अन्दर की सभी इकाई पोजिटिव निगेटिव के क्रम में एक दूसरे से जूडी हुईं हैं प्रत्येक इकाई में भी पोजिटिव निगेटिव क्षेत्र गुंथे हुयें है . यहाँ यह ध्यान रखें की इसका अर्थ निगेटिव उर्जा नहीं है . यह शब्द उन्ही पागलों की बकवास है , जो कहते हैं की एक गोला फट गया ब्रहमांड बन गया. ये जीव के बारे में भी दुनिया को बरगला रहें हैं सनातन धर्म में ब्रह्मांड ही निगेटिव है .इसी लिए इसे महामाया कहा जाता है .यही सदाशिव से उत्पन्न शक्ति है . वस्तुत यह सदाशिव ही है. भेद सापेक्ष है .कोई नया तत्व नहीं बन रहा. नारी आधार शक्ति है .यह प्रत्येक जीव की आधार सकती बनी हुई है . उसकी उत्पत्ति सापेक्ष रूपों में होती है
रिसर्च प्रेम कुमार शर्मा [कहीं भी प्रयोग करें रिसर्चर का नाम जरूर दें . यह विश्व में किसी भी भाषा में इस रूप में डिस्कवर नहीं है ..

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