नारी कभी अबला नहीं थी, न है

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

जिस महिषासुर के विध्वंस से सारा ब्रह्माण्ड त्राहि माम कर रहा था, उसे एक नारी ने मार गिराया। दुर्गा की कहानी ऊर्ध्व नाम्नाय शैव तंत्र के वैज्ञानिक सत्यों के विवरण का एक रूपक है।

इसमें कहा गया है कि मूल तत्व यानी अनंत तक व्याप्त स्वयं चेतन , संप्रभु परम आत्मा यानी शिव ने सर्वत्र स्वयं को ही अनुभूत किया, तो एक से दो होने की सोची और ख्याल आते ही उसमें एक सूक्ष्म विदू पर विस्फोट हुआ । इससे एक संकवाकार भंवर उत्पन हुई, जो प्रथम आद्या थी। परमात्म या शिव तत्व में इस तेज नाचती संरचना के घर्षण के कारण इस पर चार्ज उत्पन्न होने लगे। यह प्रथम निगेटिव संरचना ही पहली उत्पत्ति है, जिस पर भयानक चार्ज बन कर नोक पर संघनित हुई। यही ऊर्ध्व नाम्माय योनि रूपा आद्या है, यही इस सृष्टि रूपी महाकाल की उत्तप्ती बीज है, इसलिए इसे महाकाली भी कहा गया है। अपने भयानक आवेश के कारण यह भयानक भक्षण की भुभुक्षा से ग्रसित थी, इसलिए इसे कामख्या भी कहा गया है।

इसकी प्रतिक्रिया में इसके ऊपर समान पर घनत्व में कम समान गति से नाचती उल्टी शंक्वाकार संरचना की उत्त्पति हुई, जिस पर इसके विपरित आवेश उत्तपन्न हो रहे थे। ये दोनों विपरीत आवेश के कारण खिच कर एक दूसरे में समा गए और पेंदें के किनारे की लहरों से बनने वाले नारंगी के समान खोल में बंद हो गए। इसके मिलते ही चार्ज समाप्त हो गया और ये घूमते हुए थोड़ा अलग हो कर फिर चार्ज हुए और फिर एक दूसरे के पेंदे से टकराए।
एक आटो मोसन क्रिया प्रारंभ हो गई और पहली सृष्टि संरचना की सूक्ष्म परमाणु की उत्त्पति हुई। यही पहला पुरुष है, जिसकी स्तुति ऋग्वेद में की गई है। यही आत्मा है, जिसका अर्थ सार होता है।ऊर्ध्व नाम्नाए में यह पहली देवी महामाया है, जिसके अंदर धूरी पर एक +, एक – , एक नाभिक कि उत्पत्ति हुई। त्रिदेवी त्रिपुरा। वैदिक मार्ग में इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा गया है। यही वामनावतार सृष्टि बीज है। इसके केंद्र में नाभिक के बीच राज राजेश्वर शिव हैं, जो वैदिक मार्ग में विष्णु, देवी मार्ग में कामायनी और अघोर पंथ में काकिनी कहीं जाती है। हमने आधुनिक रूप में इसका नाम पुच्छल तारा रखा है, क्योंकि इस विज्ञान की डिस्कवरी आधुनिक रूप में करने में मुझे ३३ वर्ष लग गए। बहुत कुछ खोया। धनोपार्जन पर ध्यान न देने के कारण घर और नाते रिश्तों में अपमानित भी हुआ। पर मुझे बहुत खुशी यह है कि पत्नी, पुत्र, दोस्तों में कभी न मेरी इज्जत कम हुई, न ही अपनापन। बाहरी दुनिया तो ९ वर्ष की उम्र से इज्जत मां देती रही है। यह दर्द उभरता है, जब इस देश की मानसिक गुलामी में पड़ी युंवर्सितियों और सरकारों के उपहास का सामना करना पड़ा था। कहने को सनातन धर्म और हिंदूवाद है। ये सभी मैकाले के गुलाम हैं। धर्म को प्रयुक्त करतें है, मन से ये अपने पूर्वजों को, सपेरे चरवाहे से अधिक कुछ नहीं समझते।स्क

यही कुछ निश्चित नियमों और क्रियाओं से धूरी पर पहले पांच, फिर नौ ऊर्जा उत्पादन चक्रों को उत्पन्न करती है।
पहले को पांच भूत, पंचतत्व, पंच देवता के रूप में जाना जाता है। दूसरे को नौ रूपों की दुर्गा के रूप में। यह विकसित पुच्छल तारा ही दुर्गा है महामाया है। धूरी ही इसका मेरुदंड है। सुमेरु पर्वत, जिसमें हर देवी देवता हैं।
इसमें एक निगेटिव पवाइंट है, पूंछ जहां से निकलती है। यहां एक भयानक शक्ति रहती है, जो काम, कामना, लालसा, तृष्णा, अहंकार , हिंसा से आवेशित है। यह इस पर आधित्य जमा कर अपनी दासी बनाना चाहती है।
यही महिषासुर है। वैष्णो देवी भी दुर्गा की ही प्रतिलिपि कथा है। यहां महिषासुर को भैरव कहा गया है, क्योंकि तंत्र में यह शक्ति भैरव के नाम से भी प्रसिद्ध है।

हम सब, स्त्री पुरुष इसी महामाया की प्रतिलिपि है, पर नारी तो शुद्ध शक्ति रूप है। हर शक्ति कि जननी। वह केवल जिद्द पर ब्रह्माण्ड से जितनी चाहे शक्ति प्राप्त कर सकती है। अत्याचार और अन्याय से लडने पर आमादा होने की जरूरत है।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *