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ध्यान योग

ध्यान योग( Meditation Yoga)

वास्तव में जिसे ‘योग’ कहा जाता है, वह ध्यान योग ही है। आधुनिक युग में पूरी शताब्दी में बाबा लोग जिस ‘योग’ का प्रचार कर रहे है; वह ‘योग’ नहीं; योगासन है। ये विभिन्न बिन्दुओं का योग करते समय लगाई जाने वाली शारीरिक मुद्राएं है। इन्हें ‘योग’ कहना ऐसा ही है, जैसे पानी के बर्तन को ‘पानी’ कहना।

‘योग’ का अर्थ होता है , जोड़ना । प्रश्न उठता है कि किससे किसको जोड़ना?

वास्तव में यह शरीर के ऊर्जाचक्र को ब्रह्माण्ड की ऊर्जा से जोड़ने की विद्या है। सबके  ऊर्जाचक्र और ऊर्जा तरंगों का वर्गीकरण एक ही सूत्र पर आधारित है, इसलिए ब्रह्माण्ड में वे सारी ऊर्जाएं व्याप्त है; जो हमें चाहिए और यह एक ही ऊर्जातत्व से उत्पन्न होती है। इसे हम प्राप्त करते रहते है; मगर यह हमें छन –छन कर मिलती है। बहुत कम मात्रा में प्राप्त होती है। कारण यह है कि हमारी जितनी आवश्यकता होती है , प्रकृति इसे उतना ही हमें देती है। हमें जरूरत नहीं है, हम पाने का प्रयत्न नहीं करते, इसलिए हमें अपनी सामर्थ्य को जान ही नहीं पाते। ‘योग’ वह शारीरिक मानसिक तकनीकी है, जिसमें ‘ध्यान’ के द्वारा अपनी ऊर्जा-व्यवस्था से ब्रह्माण्ड की ऊर्जा-व्यवस्था को जोड़ा जाता है।

हमारे शरीर के ऊर्जा चक्रों को वातावरण से इस तत्व का ईंधन प्राप्त होता है। सामान्य समय में हमें जितनी ऊर्जा की जरूरत होती है, हमें यह उतना ही प्राप्त होती है, पर यदि हम दौड़ने लगें, तो शक्ति खर्च होने लगती है और अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। इस कमी को पूरा करने के लिए अधिक ईंधन मिलने लगता है, तो उसे जलाने के लिए अधिक वायु की भी जरूरत पड़ती है । इसी कारण हमारी सांसें तेज हो जाती है। यह अभ्यास के साथ हमारी दौड़ने की सामर्थ्य को बढाती चली जाती है।

यह प्रमाणित करता है कि यदि हमारे ऊर्जा चक्रों की क्रिया गति तेज हो जाए , तो हमें अतिरिक्त शक्ति प्राप्त हो सकती है और उसके कारण हम ऐसे कार्य भी कर सकते है, ऐसी बातों को जान सकते है, जो सामान्य अवस्था में असम्भव है।

लेकिन चक्रों की क्रियागति को कैसे तेज किया जा सकता है?

इसी की तकनीकी का नाम ‘ध्यान योग’ है । यह एक पूरी तरह नियम , सूत्र, संरचना पर आधारित वैज्ञानिक विद्या है।

 

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