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ध्यान योग : हमारे ऊर्जा चक्र का विज्ञान

ध्यान योग : हमारे ऊर्जा चक्र का विज्ञान (Meditation Yoga: The Science of Our Energy Chakra)

हमारे शरीर(Body) में 9 मुख्य + 99 सह ऊर्जा चक्र हैं। इन्हें जीव की एक पूरी माला कहा जाता हैं। ये आयुर्वेद के 108 मर्मस्थल हैं। इनमें से मुख्य नौ चक्र रीढ़ की हड्डी(bone) में त्रिकास्थि से सिर के चाँद आयर आज्ञाचक्र तक होते हैं।

ये सारे चक्र 0 से 9 तक एक एक करके नियमबद्ध क्रियाओं से विकसित होते हैं। यह सृष्टि बीज प्रथम सूक्ष्मतम परमाणु में उत्पन्न होने वाले चक्र हैं। वह परमाणु ही विकसित होकर ब्रह्माण्ड बना हैं। यह क्रिया मूलतत्व यानी निराकार अनंत परमात्मा तत्व(God) में होनेवाले एक विस्फोट से प्रारंभ  हुई हैं और यह नियमबद्ध हैं। ब्रह्माण्ड(Universe) की सभी इकाइयों की उत्पत्ति में उन्हीं नियमों(Protocol) एवं क्रियाओं से बंधी हुई हैं। ये नियम ब्रह्माण्ड पर भी लागू है और इनकी इकाइयों पर भी। ब्रह्माण्ड सहित सभी की ऊर्जा संरचना भी एक ही हैं और ये एक ही प्रकार के नियमों से विकास और क्रिया को संचालित कर रहे हैं। 0 से 9 तक के अंक इसी विज्ञान के सूत्र से उत्पन्न हुए हैं और जिस प्रकार 0 से 9 तक से अनंत सांख्यकी की उत्पत्ति होती हैं, उसी प्रकार 0 से 9 प्रकार की ऊर्जा से ब्रह्माण्डीय इकाइयों की अनंत सांख्यकी उत्पन्न हो रही हैं। ये सभी शाश्वत नियमों से शासित हैं।

इन्हीं नियमों को सनातन धर्म कहा जाता हैं। ये परमात्मा से उत्पन्न होते हैं और सब पर लागू होते हैं। यंत्रों और कृत्रिम उपकरणों पर भी।

यह एक हतप्रभ कर देनेवाला सुपर एटॉमिक यूनिवर्सल साइंस हैं; मैंने इसके एक एक परत में समाकर देखा हैं और कंप्यूटर पर सारा ब्रह्माण्ड और हमारी दुनिया को विकसित होते दिखा सकता हूँ।  मुझे उचित मंच नहीं मिल रहा, इसलिए इसे गोपनीय रखना हमारी विवशता हैं। यह बहुत विशाल हैं , इससे विषयांतर भी होगा, इसलिए हमें सीधे अपने शरीर के चक्रों के वैज्ञानिक स्वरुप को समझना चाहिए।

यह शरीर , जो हमारा भी हैं और अन्य का भी, एक डमरू के रूप में हैं।  जिसके नीचे पेंदे पर एक शंकु नीचे की ओर हैं, एक सिर के चाँद में ऊपर की ओर। इसके मध्य एक छेद है और वहाँ एक त्रिशूल जैसी संरचना हैं, जिसके नीचे पूँछ हैं , ऊपर तिन धाराओं में बंटे सांप के फण जैसी ऊर्जा संरचनाएं।

यह मध्य का त्रिशूल ही हमारे रीढ़ की संरचना हैं। हमारी पूँछ गायब हैं, पर धाराएं हैं  और उन्हें हर जीव-जन्तु पेड़ – पौधे में देखा जा सकता हैं। यही पूरी संरचना (शरीर सहित) ऋग्वेद का पुरुष , गीता का विराट विष्णुरूप, शैवतन्त्र का मध्यकाल हैं। त्रिशूल इसका शेषनाग , जिस पर पृथ्वी (ठोस रूप) रुपी शरीर टिका हैं और इस शेषनाग के फणों से फुफकार निकलती हैं। इसी के शरीर में समस्त देवी-देवता हैं।

यह शेषनाग पेड़ों में स्पष्ट हैं। हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएं हमारे ऊर्जा समीकरण के कारण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से सिमट गयी हैं। इसके केंद्र में नाभिक है और नाभिक में ही जो शक्ति उसे क्रियाशील रखें हुए हैं , उसे विष्णु कहा जाता है। उस के ऊपर चार, नीचे चार और ऊर्जा उत्पादक केंद्र होते हैं। इनमें जो शक्तियाँ काम करती हैं; वे ही सनातन देवी-देवता है। सद के देवता , देवीमार्ग की देवियाँ , शिव मार्ग के शिवरूप अघोर मार्ग के घोर रूप।

इन सभी चक्रों की आकृतियाँ वही हैं। यानी शरीर वाली। एक डमरू , डमरू के मध्य त्रिशूल , नीचे पूँछ, ऊपर सांप के फण जैसे फव्वारे। शैवमार्ग इन्हें मुख्य शिवलिंग कहता हैं, देवी मार्ग में यह भैरवी चक्र या श्री चक्र हैं, वैदिक मार्ग में इन्हें विष्णु के कई रूपों के सुदर्शन चक्र कहा जाता है।

बस इतने से ही विज्ञान और धर्म का सत्य सामने  आ जाता हैं। आप स्वयं समझ सकते हैं कि  हमारे देवी-देवताओं और धार्मिक चिन्हों का वास्तविक विज्ञान क्या है।

योग आदि शास्त्रीय रूप में इन्हीं चक्रों की साधना की जाती है । दो को गौण मानकर छोड़ दिया जाता है । सात पर ही अभ्यास किये जाते हैं , पर अष्ट सिद्धि , नौनिधि,  नव दुर्गा आदि के विवरण से यह स्पष्ट है कि ये नौ होते हैं। सिद्धि पहले से 9 तक की जाती है। दूसरे से एक की गिनती होती हैं, इनमें आठ क्षेत्र वर्ग ही होते हैं । इसलिए अष्टसिद्धि कहा जाता है। दस महा विद्या भी इन्ही की शक्तियों का रूप है। दसवीं महा विद्या शीर्ष के  ऊपर होती है।

यहाँ नाम और व्याख्याओं का अन्तर मार्ग और उनके शाखा भेद से हैं। इसने इस विज्ञान को और उलझा दिया है। कोई शैवमार्ग से व्याख्या कर रहा है , तो कोई देवी मार्ग से व्याख्या कर रहा है , किसी की वैदिक व्याख्या है, तो किसी की अघोरपंथ की, कोई भैरव मार्ग से व्याख्या कर रहा है , तो कोई काली मार्ग से और सबकी मान्यता देते हुए भी इन मार्गों में तुलनात्मक अध्ययन का भारी अभाव है, वह है ही नहीं। सभी अपनी-अपनी श्रेष्ठता का राग अलाप रहे हैं । फलतः यह एक ही सनातन शाश्वत विज्ञान अलग-अलग रूपों में भ्रम उत्पन्न करने लग है।

उदाहरण स्वरुप – किसी इकाई के नाभिक को लीजिये। योग में इसे अनाहत चक्र कहा जाता है, ज्योतिष में यह सूर्य है, वेद में भी यह सूर्य है , जिसके नाभिक में विष्णु का वास है। फिर यह सूर्य ही विष्णु के रूप में कन्वर्ट हो गया, क्योंकि विष्णु का वास अनाहत में कहा गया था। शैवमार्ग में यह राज राजेश्वर अर्द्धनारीश्वर शिव है , अघोर मार्ग में काकिनी , देवी मार्ग की कई शाखाएं है, इसे कई नामों से जाना जाता है। कामेश्वरी , भुनेश्वरी , कामायनी आदि।

पर यह चक्र तो एक ही हैं उर इसमें व्याप्त शक्ति भी एक ही। इसकी वैज्ञानिक संरचना भी एक ही है । यहाँ से ‘धूप’ यानी सूर्य की किरणों के समान ऊर्जा का उत्सर्जन होता है और यही किसी इकाई में प्राणऊर्जा की आपूर्ति करता है। उस प्राण ऊर्जा की , जो शीर्ष से दसवीं महा विद्या के रूप में अवतरित होकर सिर के चाँद में गिरती है, जिसे ॐ में बिंदु के रूप में दर्शाया गया है , जो गायत्री , सावित्री, सती , देव गंगा आदि कही जाती है।

सनातन  धर्म का दुर्भाग्य यह है कि धर्म के सभी क्षेत्र के लोगों ने अपनी-अपनी जागीर बना ली है और अंधी आस्थाओं , पौराणिक रूपक कथाओं की फैंटम दुनिया में भटक रहे हैं , क्योंकि अंध श्रद्धा की यह धूलभरी आंधी ही इनकी श्रेष्ठता है । यही इन्हें पूजा दिलवा रहा है। जबकि ये स्वयं नहीं जानते कि इन कथाओं में किन सत्यों को अभिव्यक्त किया गया है। ऐसा क्यों किया गया है , यह श्री मद्भागवत के प्रारम्भ में ही वर्णित हैं। शायद ही कोई कथावाचक इस प्रारंभिक पन्नों की कथा की व्याख्या कर पता हो। मैंने तो आजतक कहानियाँ कहते और जय ‘श्री कृष्ण’ का नारा लगाते ही देखा है।

आश्चर्य यह है कि  हमारे समाज के पढ़े लिखे स्त्री-पुरुष भी इन्हीं आस्थाओं में जीते हैं । वे सर पटकते रहते है , किसी को कुछ भी नहीं मिलता, फिर भी उनको विश्वास है कि नरसिंह आकाश से उतरेंगे और उसके सारे शत्रुओं का संहार कर देंगे। वह मुर्ख मुख से ‘जय नरसिंह’ , ‘जय नरसिंह’ जपता रहता है और भेड़ियों का शिकार बन जाता है । उसे ज्ञात ही नहीं कि ‘नरसिंह’ उसके अंदर ही हैं। उन्हें वैज्ञानिक रूप से समझकर अवतरित करे, तो वह उसे ही ‘नरसिंह’ बना देंगे। सारा विश्व बन रहा है , क्योंकि वह इस सृष्टि के वैज्ञानिक स्वरुप को समझने का प्रयत्न कर रहा है और हमारे पास उनसेलाखों गुणा अधिक ज्ञान का भंडार है , पर हम बिना समझे मन्त्र जप कर रहे है। समझकर करें, तो हमारा शरीर ही महाकाल है। हम कुछ भी कर सकते हैं।

हमारा ध्यान योग इस वैज्ञानिक आधार पर टिका है। अगले पोस्ट में अपने चक्र की पूरी वैज्ञानिक संरचना , ऊर्जा धाराएं समझिये, फिर इनके प्रयोगों का सरल रूप बताया जायेगा। अगली पोस्टिंग

ध्यान योग: हमारी ऊर्जा-संरचना का ब्लूप्रिंट

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