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ध्यान योग : योग क्रिया से पहले

ध्यान- योग(Meditation-Yoga) : योग क्रिया से पहले

आध्यात्मिक(Spiritual) साधनाओं में , चाहे वे तन्त्र मार्ग के हों या किसी भी मार्ग के तीन प्रकार की साधनायें की जाती हैं। यह वर्गीकरण पूजा, अनुष्ठान, ध्यान सभी जगह है। प्राचीनतम काल से साधक , ऋषि, योगी किसी भी साधना आदि की क्रियाओं के इस तीन रूप को अपनाते आये हैं।

शास्त्रीय रूप से इन्हें सृष्टिक्रम , स्थिति क्रम और संहार क्रम कहा जाता है। शास्त्रीय तौर पर गुरु परम्पराओं में इन्हें क्रियात्मकता का वर्णन करके विद्वतापूर्ण  तरीके से समझाया जाता है कि इनमें अन्तर क्या है, मगर आज के वैज्ञानिक जानकारियों के अनुसार समझने का प्रयत्न करें, तो ये तीनों इस प्रकार है –

  1. सृष्टिक्रम – अपने ह्रदय के नाभिक के चक्र यानी अनाहत चक्र के मध्य में ध्यान केन्द्रित करके किसी देवी-देवता-मन- या शक्ति का आवाहन करना और उसके तेज से इसे प्रकाशित करके समस्त शरीर में उस तेज को प्रसारित करते हुए व्याप्त करना। हम पहले कह आये हैं कि इसे आप किसी भी सीमा तक ले जा सकते हैं

चक्रों पर घरेलू पूजा से लेकर समस्त प्रकार की सिद्धि साधनाओ में इसी क्रम को अपनाया जाता है। इसमें प्रारंभ मध्य के बिंदु से किया जाता है। फिर षट्कोण , फिर कर्णिका , फिर कमल दल (डंठल  जड़, मध्य, नोक) , फिर उसके मध्य का रिक्त , फिर चतुरस्त्र का आंतरिक अष्टकोण , फिर दस दिकपालो एवं अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती हैं।

तन्त्र साधना के गुप्त मार्गों में शरीर को ही यंत्र मानकर केवल केंद्र की शक्ति को बढ़ा कर शरीर में व्याप्त किया जाता है।

  1. स्थिति क्रम – यह हृदय केंद्र में ईष्ट का आवाहन करके उसके ध्यान में मग्न उसका दर्शन करते रहना है। इसमें भी मंत्र जप होता है, शरीर मन में उसी समीकरण का तेज व्याप्त होता है। हम जब कोई कीर्तन , पूजा , मंत्र जप सामान्य रूप से करते है , तो वह सामान्यतया इसी क्रम में आता है। अक्सर साधना कार्यों में यह सृष्टि क्रम के साथ लिया जाता है।
  2. संहार क्रम – यह उल्टा स्वस्तिक है।यह क्रम सामान्य साधकों, गृहस्थों के लिए नहीं है। इस पंथ के साधक बहुत कम होते है। वैसे कई मार्ग या पंथ ने परम्परागत रूप से इसे ही अपना रखा है और शिष्यों से लेकर सामान्य लोगों तक में इसी क्रम की क्रियाओं की महत्ता देते है; पर यह क्रम संहार क्रम है। यह मानसिक रूप से विरक्त, जिज्ञासा में समस्त भौतिक आकर्षण से निर्लिप्त होकर सत्य जानने का प्रयत्न करने वाले , मोक्ष, वैराग्य और सन्यास के लक्ष्य को पाने वालों के लिए है।

प्राचीनकाल में इन पंथों में प्रवेश लेना बहुत कठिन था। वैराग्य एक मानसिक अवस्था है। इसे साधनाओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह ज्ञान चिंतन से उत्पन्न होता है और इस चिंतन का स्तर भी बहुत उच्च होता है। अनेक आचार्यों ने कठिन आसनों, कठिन आचारसंहिताओं, तमाम तरह के निषेधात्मक कर्मों का उपहास उड़ाते हुए कहा है कि यह इन पर निर्भर ही नहीं है। उपवास करके , निर्जला रहकर, आसन मुद्राओं में ध्यान लगाकर आप इस मानसिकता को प्राप्त ही नहीं कर सकते। आपको सर्वप्रथम ऐसे ज्ञानी गुरु की संगती करनी होगी, जो आपकी चिंतन शक्ति को सांसारिक सत्य पर विचार करने की ओर मोड़े, पर गुरु भी आपको इस अवस्था तक नहीं पहुंचा सकता।सत्य तो आपको ही मंथन करके जानना होगा। कभी-कभी बिना गुरु के भी एकाएक कोई घटना, विचार भी आपको मंथन के भंवर में डाल सकता है और आप सत्य तक पहुच सकते है। किसी दिशा निर्देश के अभाव में भी, क्योंकि यह अभिषेक उस सदाशिव परमात्मा का होता है, वह स्वयं सब ज्ञान देता चला जाता है यानी वह व्यक्ति अपनी प्रबल जिज्ञासा और विश्लेषण शक्ति से स्वयं ढूंढ लेता है

वैराग्य , मोक्ष, आदि उस परमात्मा को जानने समझने से होता है और ज्ञान मार्ग इसका सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। भक्ति मार्ग से उसे जानना सम्भव नहीं है, हाँ कृपा प्राप्त की जा सकती है।साधना मार्ग से उसे जाना जा सकता है , पर यह मार्ग बहुत ही दुरूह, कठिन और जन्मों में परमात्म ज्ञान तक पहुँचता है। यह सरल नहीं है।

अभिनव गुप्त , सहित सिद्ध योगिनी तन्त्र आदि अनेक प्राचीन ग्रन्थों में प्राचीन महाचार्यों के मत यही है। वैसे सब अपनी विचारधारा में रह सकते है। मैं अपना पंथमत स्थापित नहीं कर रहा। बस जो ज्ञान है, वह दे रहा हूँ।

संहार क्रम में समस्त शरीर की ऊर्जा को मानसिक शक्ति और पंथ विशेष की विशेष तकनीकियों द्वारा केन्द्रियभूत किया जाता है। यानी समस्त प्राण ऊर्जा को अनाहत केंद्र में ले जाकर समाहित करना और उसमें समाधिस्थ हो जाना। इसमें ब्रह्मरंध्र यानी चंद्रमा मध्य भी प्रयोग में आता है। इसका विशाल तकनीकी क्षेत्र है। योग, तन्त्र, तन्त्र के विभिन्न शाखाओं , ब्रह्ममार्ग आदि में इसकी तकनीकियों के अनेक रूप है। यह नाड़ी , श्वाँस , रश्मि (ऊर्जात्मक रश्मियाँ) आदि के विशाल ज्ञान से सम्बन्धित है। यह निरोधात्मक मार्ग है। समस्त वृत्तियों का निरोध करके केंद्रीय भूत होना।

इस क्रम की पूजा बभी चतुरस्त्र मंडल के बाहर से की जाती है। फिर अंदर की ओर चतुरस्त्र के आठों कोण, कमल दल, कर्णिका होते हुए मध्य केंद्र के बिंदु में देवता का आवाहन किया जाता है। यह पूजा भी ज्ञान , मोक्ष, वैराग्य, आदि के लिए होती है।

हम इस क्रम की साधनाओं का वर्णन नहीं करेंगे। एक-दो मार्ग में मैंने कुछ अभ्यास प्रयोग किये है; पर यह सामान्य लोगों के लिए नहीं है और मोक्ष आदि उदेश्यों के लिए मैं व्यक्तिगत तौर पर ज्ञान मार्ग को ही श्रेष्ठ मानता हूँ। जिज्ञासा है, व्याकुलता है , तो चिंतन कीजिये मार्ग स्वयं मिलता चला जाएगा।

हम सृष्टि एवं स्थिति क्रम के प्रयोगों को ही आगे बतायेंगे।

ध्यान योग के दो रूप

हमारे इस शब्द ‘ध्यान योग’ से फिर कोई भ्रम न फैले, इसलिए एक बार फिर मैं कहना चाहता हूँ कि इस क्रिया का प्रयोग हर भौतिक आध्यात्मिक क्रिया में होता है। इसके व्यापक अर्थ है , पंथ विशेष के अर्थ से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। ‘बलात्कार’ शब्द को आप ‘यौन-बलात्कार’ में समाहित कर रहे हैं , तो यह आपकी अज्ञानता है, पर उस शब्द का अर्थ व्यापक है। यहां ध्यान योग का मतलब है अपनी मानसिक शक्ति को किसी लक्ष्य से जोड़ना इस योग से ही प्रकृति की समस्त क्रियाएं होती है। आप पानी में ध्यान को जोड़ेंगे तभी पानी पी पाएंगे, वर्ना भटकते रह जायेंगे। जोड़ेंगे तब जब प्यास की व्याकुलता सताएगी- यही अध्यात्मिक लक्ष्यों के भी नियम है। प्रकृति अपवादात्मक नियम नहीं बनाती।

नियम उस परमात्मा की उपत्ति है। कोई ब्रह्माण्डीय प्राणी नियम नहीं बना सकता। मुर्ख, अज्ञानी, जड़ बुद्धि ही अपने अहंकार में नियमों का नाम लेकर अपनी मूर्खताओं को जीवों पर थोपते हैं।

सनातन धर्म के लगभग सभी प्राचीन आचार्यों ने कहा है कि लौकिक धर्म चाहे किसी क्षेत्र का हो, समय –काल-परिस्थिति-युग के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। शाश्वत तो केवल सनातान धर्म है, जो परमात्मा से उत्पन्न होता है, शेष तो व्यवस्था है और व्यवस्थाएं उपर्युक्त के कारण बदलती रहती है।

ध्यान योग के दो प्राकृतिक रूप है –

  1. ध्यान योग: ऊर्जा चक्र आधारित – यह ऊर्जा संरचना को समझकर अपने ईष्ट का स्थान जानकर या धाराओं की गति , मार्ग आदि को जानकर किया जाता है। सनातन देवी-देवता चाहे किसी भी मार्ग के हों, इन्हीं चक्रों की शक्तियाँ है, इन धाराओं की शक्तियाँ है , इसलिए सभी का स्थान निर्धारित है और उनकी साधना में उनके चक्रों पर ध्यान लगाया जाता है, पर सीधे नहीं। इसकी तकनीकियाँ है।

कुंडलिनी आदि विद्याओं में भी चक्रों धाराओं में ध्यान-योग का प्रयोग होता है। इस विद्या के बारे में भी बहुत भ्रम फैलाया गया है। कुछ हल्का प्रकाश तो हम डाल चुके है।समय मिला तो विस्तार से इस  विद्या को समझाएंगे। यहाँ यह भी समझना समीचीन होगा कि यह केवल योग मार्ग में ही नहीं है। तंत्र के लगभग सभी मार्गों में यह एक अलग-विद्या है।

 

  1. ध्यान योग : भाव आधारित – मूर्ती पूजा की परम्परा का आधार यही रूप हैं। इसका वैज्ञानिक सूत्र है कि आप जिस भाव में डूबेंगे, उस भाव की ऊर्जा समीकरण में जो-जो चक्र या धाराएं आएँगी, स्वयं सक्रिय होकर भाव की गहनता के अनुरूप तीव्र से तीव्रतम होती चली जाएगी और एक सीमा के बाद उस गहनता से आपके शरीर का वह ऊर्जा समीकरण इतना तीव्र हो जायेगा कि आपके ‘औरा’ की प्रभा उसी समीकरण में प्रकाशित होने लगेगी और प्रतिक्रिया में चारों ओर पॉजिटिव उसी समीकरण में उत्पन्न होकर आपके शरीर में आने लगेगा। आपकी उपलब्धि मल्टीप्लाई होने लगेगी और आज्ञाचक्र चूँकि उसी ऊर्जा समीकरण में है, इसलिए आपके चारों ओर व्याप्त समीकरण को केंद्रीभूत करके आपके भाव को प्रत्यक्ष कर देगा।

यह बहुत बड़ी सिद्धि है।

समस्त तांत्रिक साधनाओं चाहे वे वाम मार्ग के हों या दक्षिण मार्ग के हर साधना-हर शक्ति में ध्यान रूप का प्रयोग होता है। इसके बिना किसी भी मार्ग की, कोई पूजा-साधना नहीं होती।

पर यह हैरतअंगेज वैज्ञानिक क्रियाएं भी आज के मुर्ख धर्माध्वजाकारियों ने रूढ़ कर दी है। कथा सुना-सुनाकर याह विश्वास दिला दिया है कि दिव्य लोको में ये समस्त देवी-देवता रहते है और साधना भक्ति से प्रसन्न होकर भक्त को दर्शन देते है। यह सत्य ही है, उपर्युक्त के अनुसार , पर यहाँ सबसे बड़ी मुर्खता यह होती है कि हम उस प्रकट होने वाले को किसी अन्य लोक से अवतरित हुआ प्राणी मान लेते है। वह कोई प्राणी नहीं होता।वह हमारे ही भाव केन्द्रीकरण से बना हुआ ऊर्जात्मक शरीर होता है, जिसमें अपने प्राण नहीं होते, पर वह पॉजिटिव होता है और हमसे हजारों गुणा अधिक शक्ति रखता है। वह हमारे हर प्रश्न का उत्तर देता हाउ, हमारे हर असंभव कामनाओं की पूर्ती में भी चमत्कार करता है, पर वह कोई प्राणी नहीं है।

हमारे अनेक शिष्य कहते है कि आपके इन कथनों से आस्था पर चोट होती है; पर मैंने उन्हें समझाया कि आस्था पर चोट नहीं है यह। यह अज्ञानता पार प्रकाश है। मैं यह तो नहीं काह रहा कि ऐसा नहीं होता, मैं यह बता रहा हूँ कि वह वैज्ञानिक रूप से क्या है?….. यह जानकर सब करोगे, तो हर बुद्धिवादी , भौतिकवादी , वैज्ञानिक सबको उत्तर से पाओगे कि तुम्हारी आस्था का वैज्ञानिक रूप क्या है? इंजन का एक बोल्ट कस दो गाड़ी स्टार्ट हो गयी, पर पूछों कि क्यों, कैसे? तो झेंप कर दांत निकाल दे, तो वह मैकेनिक किसी नयी उलझन को नहीं सुलझा सकता। जानने वाला नचा सकता है।

आप अब भी नहीं समझे? इन शक्तियों को यंत्रों से उत्पन्न किया जा सकता है?

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