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ध्यान योग : मुख्य ऊर्जाचक्र (परिचय और व्याख्या)

रीढ़ की हड्डी में खोपड़ी के चाँद और नाक की जड़ तक शरीर के वे मुख्य ऊर्जाचक्र व्याप्त होते हैं; जिनसे बर्नर फ्लेम की तरह भिन्न-भिन्न प्रकार की ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इनकी सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के समीकरण से ही हमारे शरीर , आकृति , समुद्रिकी लक्षण , प्रवृति , गुण, सोच , बुद्धि , मानसिक दशा आदि का प्रादुर्भाव होता है

ये 9 होते हैं। विशुद्ध चक्र और मूलाधार में एक –एक चक्र को सामान्यतया साधना कार्यों में कई मार्ग छोड़ देते हैं; क्योकि  एक ही से दोनों का काम चल जाता है। ये सीरीज में एक –दूसरे से जुड़े नौ घड़ियों की तरह क्रियाशील रहते हैं; पर स्वतंत्र नहीं होते। एक ही क्रिया दूसरे पर डिपेंड करती हैं।

  1. सहस्त्रार चक्र – हमारे सिर के चाँद का ऊर्जाचक्र है। यहाँ जो शिवलिंग या भैरवी चक्र है, उसका शंक्वाकार सिरा षट्कोण का उर्ध्वकोण इस चाँद के मध्य उठा होता है। उसके मध्य के छिद्र होता है; जिसमें बिंदु रूप शिवतत्व या परमात्मा होता है। उसके चारों ओर जो फ्लेम निकलती है, वह पार्वती का क्षेत्र है और उससे जो तरंग धाराएं निकलती हैं, वे मस्तिष्क की कोशिकाओं के रूप में प्रकट होती हैं।

यह ऊर्जा चाँदनी के रंग की होती हैं। सूक्ष्मता और विरलता के मापदंड पर यह 0 के बाद स्थूल की ओर प्रथम चरण की ऊर्जा है। इसमें शान्ति, वैराग्य, आनंद का गुण होता है।

इस चक्र के उर्ध्व शंक्वाकार शिवलिंग की प्रतिक्रिया में शीर्ष के ऊपर एक अघोरमुखी ऊर्जा कृति उत्पन्न होती है और शरीर में ऊर्जा का उत्सर्जन चूँकि स्पन्दन (पल्स) में चलता है, इसलिए यह बन-बनकर पॉजिटिव होने के कारण चाँद के शिवलिंग पर गिरती रहती हैं।

सनातन विज्ञान इसी क्षैतिज ऊर्जा को जीवन अमृत कहता है। यह गंगा, गायत्री , सावित्री, सती, सोमरस आदि अनेक नामों से संबोधित की गयी हैं। सब मार्गों में उत्पत्ति एवं गुणों की व्याख्या एक ही हैं , जो भिन्न-भिन्न रूप में कही गयी है।

  1. आज्ञाचक्र – मस्तिष्क की कोशिकाएं और पेड़ों के पत्ते, एक ही ऊर्जा संरचना है। इनके तीन क्षेत्र और तीन धाराएं होती है। डंठल की जड़ , मध्य और नोक तीन क्षेत्र हैं। तीन धाराओं में मध्य धारा , उसके ऊपर , उसके ऊपर तीन खोल की संरचना में पूरे अस्तित्त्व में होती हैं। इनके बीच रिक्त स्थान होता है, जहाँ परमतत्व की उपस्थिति होती हैं।जब शरीर के चक्र का आयतन फैलता है , तो यह अंदर की ओर गतिमान होती हैं , जब सिकुड़ता है, तो बाहर की ओर गातिमान होती हैं। इससे इनसे फुफकार निकलती रहती हैं।

जंतु जगत में ये फव्वारे , पत्ते या सर्पफण , जो कह लें , दो हिस्सों में बँटकर आगे मुड़कर एक बिंदु पर मिल जाती हैं। सहस्त्रार इनके बीच में आ जाता है । मिलन   बिंदु ही हमारा आज्ञाचक्र है। यहाँ से जो ऊर्जा निकलती हैं, वह किसी भी ऊर्जा से सूक्षम, अनंत गतिमान और तीव्र चलायमान होती हैं।

तन्त्र  में इसे रूद्र कहा जाता है। शैवमार्ग में इसे गणेश , अघोर मार्ग में यह हाकिनी , योग मार्ग में इसे आज्ञाचक्र कहा जाता है। शाखाभेद से इसे विश्व देवा , प्रणव , मनसा आदि कई नामों से जाना जाता है।

 

यहं से जो ऊर्जा निकलती है , वह चाँदी के रंगत की चमकीली तरंग है। यह उत्पत्ति स्थल पर मोटी आगे पतली होती चली जाती हैं। न इसकी सूक्ष्मता की कोई सीमा हैं, न ही इसकी गति की। इसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं है।

शरीर के अंदर बाहर की समस्त क्रियाओं का संचालक यह है। यह जहाँ अपनी सूंढ़ का सिरा स्थिर करता हैं, वहीँ क्रिया में तीव्रता आ जाती है। शरीर सो जाता है, पर यह हमेशा जगता रहता है। जब  मस्तिष्क इससे अपने नियंत्रण से मुक्त करता है , तो यह दूर-दूर तक गमन करता है और भविष्य में पहुच जाता है। यह अनुभूतियों का सिग्नल अपने प्राकृतिक गुण से मस्तिष्क को भेजता है, पर सुप्त अवस्था में मस्तिष्क की बहुत कम चैतन्यता रहती है। इससे उसके सिग्नल उलूल-जलूल भावरूप में अनुभूत होते है, इसे ही हम स्वप्न कहते हैं।

इसकी उत्पत्ति प्रकृति साधना कार्यों के लिए नहीं करती है कि इसकी साधनात्मक विद्वता पूर्ण व्याख्याएं की जाए। यह जीव की मनोकामना पूर्ती करने के लिए शरीर में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती हैं। जीव प्रकृति में पानी भी पीता है, तो इसके कारण , शिकार भी करता है, तो इसके कारण , विद्वान- वैज्ञानिक , खिलाडी , कलाकार बनकर सफलता प्राप्त करने वाला या मच्छर बनाकर खून पीनेवाला – इसी के कारण अपनी मनोकामना की पूर्ती करता है।

यह एक शक्ति हैं। इसका उपयोग आप सड़े हुए मांस की कामनापूर्ति में करते हैं या खीर खाने में यह आपकी कामना पर निर्भर करता है। इसीलिए अच्छे-बुरे समझे जाने वाले किसी भी काम में रूद्र या गणेश की सिद्धि आवश्यक मानी गयी है।

बिना इसे सिद्ध किये सिद्धि तो क्या आप चाय भी नहीं पी सकते है। यही नियंत्रण में न हो, तो मनुष्य पागल हो जाता है या अनर्थ कर बैठता है।

3.4.- विशुद्ध चक्र – हम अपने शरीर में देखकर पहचाने , तो एक चक्र कंधे और रीढ़ की हड्डी के जोड़ के केंद्र में होता है, एक  खोपड़ी और गर्दन की हड्डी के जोड़ में। इसी के द्वारा वह मस्तिष्क और आज्ञाचक्र को नियंत्रित करता है। इसका एक नीचे का चक्र जीवात्मा के सिग्नल पैटर्न को ग्रहण करता है, ऊपर का चक्र उसे मस्तिष्क तक पहुचाता है और मस्तिष्क आज्ञाचक्र को नियंत्रित करके समस्त क्रिया करवाता है।

इसे हम कंप्यूटर से समझे, तो जीवात्मा हम हैं, माउस यह है, मस्तिष्क कंप्यूटर है और स्क्रीन पर चलने वाला तीर की ऊर्जा आज्ञाचक्र की ऊर्जा है । गाड़ी के अनुसार समझे , तो यह स्टीयरिंग व्हील हैं , मस्तिष्क इंजन है और पहिये आज्ञाचक्र की गति।

आप सोच रहे होंगे कि मैं मशीनों का उदाहरण क्यों दे रहा हूँ? पर सनातन विज्ञान कहता है कि हर उत्पत्ति पर हमारे नियम लागू हैं। चाहे वे कृत्रिम हों या प्राकृतिक। इन नियमों के विपरीत कोई यंत्र काम नहीं करेगा।

यहाँ के शिवलिंग या भैरवी चक्र से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा नीचेवाली नीली और ऊपर वाली आसमानी होती है । नीचे वाली को सरस्वती , तारा, गंधर्व , मधुमती आदि कहा जाता है। ऊपर वाली को सरस्वती , वीणावादिनी, इकतारा , वागिणी आदि। यह हमारे अंदर भाव उत्पन्न करती है , पर उस भाव की प्रकृति जीवात्मा की कामना प्रवृति के पैटर्न पर होती है।

  1. अनाहत चक्र – यह किसी भी इकाई का नाभिक है। इस नाभिक की ऊर्जा को ही ब्रह्माण्ड कहा गया है। इसके अंदर एक बिंदु होता है, जिसमें परमतत्व या सदाशिव होते हैं। इस बिंदु में व्याप्त परमतत्व को ही विष्णु, राज राजेश्वरी शिव, कामायनी , कामेश्वरी , भुवनेश्वरी आदि कहा जाता है। यह सूक्ष्म परमाणु रूप आत्मा का केंद्र है। इसके ऊपर एक शरीर जैसी ही संरचना होती है, उसके बाद एक गैप होता है चारो ओर, इसमें वायुतत्व ऊर्जा होती है इसे तन्त्र में विष्णु का हनुमान कहा जाता है। शिव की कामेश्वरी । इसके ऊपर जीवात्मा का खोल होता है। यह भी उसी संरचना में होता है। उसके ऊपर फिर वायुक्षेत्र होता है। यह जीवात्मा ही नाभिक है। इसे सूर्य भी कहा जाता है। योग का यह अनाहत चक्र है। यहाँ से धूप के रंग की ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। यह हृदय की जड़ के मूल में रीढ़ में होता है।

वास्तविक जीव यह है , क्योंकि जीव इसके केंद्र में बैठा रहता है। यह सूर्य तो उसका किला है। इस सूर्य की ऊर्जा के पैटर्नों को बदलते हुए वह भावचक्र यानी विशुद्ध चक्र के माध्यम से मस्तिष्क और आज्ञाचक्र को नियंत्रिक करके सभी क्रिया कलाप करता है। यह अपना पैटर्न विशुद्ध चक्र को , विशुद्ध चक्र उसके अनुरूप पैटर्न बनाकर मस्तिष्क को और मस्तिष्क पैटर्न बनाकर आज्ञाचक्र  को नियंत्रित करता है और इसी तरह सारे सिग्नल जीवात्मा को प्राप्त होते है।

  1. मणिपूर चक्र – यह चक्र नाभि के मूल यानी जहाँ से नाभि की उत्पत्ति होती हैं, रीढ़ में होता है।यह नारंगी रंग की ऊर्जा का उत्सर्जन करता है , जो स्थूल होती है और इसका प्रसार अधिक नहीं होता। इसका प्रवाह अनाहत की ओर होता है और यह बाहर की ऊर्जा को खींचती है। नाभिक का गट्ठर इसी से उत्पन्न होता है।

इसे कमला , लक्ष्मी , ब्रह्म कमल आदि कहा जाता है। यह अनाहत के विष्णु की ओर प्रवाहित रहती है , इसलिए इसे विष्णु की पत्नी कहा जाता है। यह उनके  नीचे उनके चरण दबाती है। यह संग्रह पोषण की शक्ति है।

स्वाधिष्ठान चक्र – यह उसके नीचे रीढ़ में होता है। यहाँ से सिन्दूरी रंग की तरंग निकलती है। यह सक्रियता और रक्षा की ऊर्जा का उत्सर्जन करती है और समस्त शरीर में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक जीवाणुओं को नष्ट करती है। इस चक्र की शक्ति को दुर्गा कहा जाता है । मार्ग भेद से अन्य नाम भी है।

मूलाधार चक्र – यह कमर और रीढ़ की हड्डी के जोड़ के प्लेट के मध्य बिंदु पर होती है। यहां से लाल खूनी रंग की तरंग निकलती है। शरीर के लाल रक्तकण , हड्डी, मज्जा, बाल, नख की उत्पत्ति में इस ऊर्जा का योग सर्वाधिक है।

इसमें काम , क्रोध, आक्रमकता , अंधी उत्तेजना होती है। इसलिए इसे भैंसे की प्रवृति पर सवार महाकाली रूप कहा जाता है। यह काम कला काली , कामख्या, कामदेव , कम भैरव आदि कई नामों से जनि जाती है। लिंग और योनि की उत्पत्ति इससे होती है। यह शरीर का नेगेटिव पॉइंट है।

मूलाधार -2– इस मूलाधार प्लेट के नीचे एक त्रिकास्थि होती है। वहां से पूँछ की उत्पत्ति होती है। इसके निचले बिंदु से सलेटी रंग की ऊर्जा निकलती है। ये भैरव जी है। याहं बाहर की ओर उत्सर्जन इतना अधिक होता है कि इस बिंदु की धारा को यहाँ से रोकना और उठाना कठिन होता है। इसलिए साधना कार्यों में मूलाधार के शिवलिंग को ही पहला आधार बनाया जाता है।

कुछ स्पष्टीकरण

  1. बहुत से साधक नाभि मूल, लिंग मूल, योनि मूल का अर्थ उसका मध्य मान लेते है। पर यहाँ मूल है यानी वह बिंदु जहाँ से उत्पत्ति हुई है और वह रीढ़ में होता है , नाकि मध्य में । यद्यपि साधना क्रिया इससे भी सम्पन्न होती है, क्योंकि ऊर्जा क्षेत्र का सम्बन्ध होता है।
  2. सभी चक्रों की संरचना शिवलिंग की होती अहि , केवल रंग में अन्तर है। इनके मध्य एक छिद्र होता है और यह ऊपर नीचे की धाराओं में भी नली जैसे व्याप्त होता है , इससे शीर्ष से गिरने वाला सोमरस मूलतत्व लिए इसमें प्रवाहित होता है। सबके मध्य एक गोल बिंदु होता है। इसमें मूलतत्व भरा रहता है। यही सनातन धर्म में इस चक्र के देवी – या देवता के रूप में जाना जाता है।
  3. इन चक्रों से उत्पन्न ऊर्जा की धाराएं समस्त शरीर के रोम-रोम के ऊर्जा चक्रों में प्रवाहित होती हैं। इन सभी ऊर्जा धाराओं के मध्य गैप होता है, जिनसे शीर्ष से प्राप्त सोमरस रोम-रोम में पहुँचता है।
  4. शरीर का डमरू , दो शंक्वाकार ऊर्जा क्षेत्र के विपरीत मुखी मिलन से बनता है और निश्चित क्रिया एवं नियमों से ये स्प्रिंग की तरह खिंचते और छोड़ने पर जैसे शक्ति के साथ टकराते रहते हैं। इसी से शरीर की पम्पिंग चलती है और सोमरस प्राप्त होता है और सभी ऊर्जाचक्र क्रियाशील रहते हैं।

खिंचने के समय ईंधन खींचता हैं और सिकुड़ने के समय ऊपर नीचे के वाल्व बंद हो जाते है , जिसके प्रेसर से सभी चक्र प्रकाशित हो जाते है। इस तरह समस्त ऊर्जा का उत्पादन पल्स में होता है।

  1. हम एक ऊर्जा संरचना के सिवा कुछ नहीं है। इसमें नौ लेयर है। तीन लेयर हमारे नेत्र अनुभूति की सीमा में आते है। 6 इनसे बाहर है। मुख्य जीव और जीवन तत्व नव में के अंदर व्याप्त होता है।

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और यह सब एक तत्व का ही परिवर्तित रूप हैं ।इसमें अन्य कुछ भी निर्मित नहीं है। उसकी ही धाराएं , घूर्णन, घनत्व , मात्रा, दबाब आदि के समीकरण परिवर्तित करके समस्त सृष्टि का मायाजाल फैलाए हुए हैं।

इसीलिए तंत्राचार्यों ने कहा कि शक्ति और शिव में कोई अन्तर नहीं है। शक्ति शिव का ही परिवर्तित रूप है, कोई अलग उत्पत्ति नहीं। वैदिक वेदान्त और आचार्य शंकर का मायावाद भी यही कह रहा है। उपनिषद भी यही कह रहे हैं कि यह ;तत्व’ का मायाजाल है।

इन धाराओं का ज्ञान करके तकनीकी का ज्ञान करके ही सिद्धियाँ की जाती हैं। सिद्धि और साधना का अलग से कोई अर्थ नहीं है। यह शाब्दिक अर्थों में ही है। किसी कार्य, गुण या शक्ति को साधना ही सिद्धि है।

वह बन्दूक चलाने का भी हो सकता है, परमात्मा प्राप्ति का भी। नियम एक ही होंगे। प्रकृति अपवादात्मक नियम नहीं बनाती।

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