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ध्यान योग: भाव का महत्त्व

ध्यान योग: भाव का महत्त्व

हम जब भी किसी बात को स्पष्ट करना चाहते हैं; मूर्खों की तरह शास्त्र पढने वाले अंध आस्थावादियों की अंधी आस्थाएं सामने आ जाती है। मैं बार-बार कह रहा हूँ कि आपकी आस्था है, तो अपनी आस्था को पकड़े रहिये। पर जो लोग या विश्व मानवता का बौद्धिक वैज्ञानिक जगत सनातन धर्म के रहस्यों के प्रति जिज्ञासु है; उनके लिए बताये रहस्यों से आपको क्यों तकलीफ होने लगती है? सनातन धर्म में रूढी , अंधी आस्था , नई व्याख्या या नए तर्क पर बंदिश – जैसी कोई चीज नहीं है। यह इस्लाम या इसाइयत नहीं है।

 

भाव का महत्त्व

आप ध्यान लग रहे हो, या सिद्धि कर रहे हों या न्यास की प्रकिया हो या पूजा एवं मन्त्र जप की प्रकिया हो; सभी की मुख्य शक्ति भाव है। विधि, प्रकिया, यंत्र, मन्त्र जप आदि उसके भौतिक अंग है। जिस प्रकार पेट्रोल के बिना किसी वाहन के सभी अंगों पर की गयी प्रॉपर क्रिया का कोई मतलब नहीं होता, उसी प्रकार भाव न हो; तो सब बेकार है।

परा जगत के आध्यात्मिक क्षेत्र का कोई भी विषय भाव, मानसिक एकाग्रता और अभ्यास पर निर्भर है। कहीं भी , कुछ भी, किसी भी क्षेत्र की क्रियाओं को देखिये ये ही तिन सर्वत्र मुख्य रूप से दिखाई देंगे।

न जाने कितनी बार हम कह आये है कि प्रकृति में परमात्मा ने अपवादात्मक नियम नहीं बनाये है। जिस नियम से एक शराबी अपना समय होते ही , शराब की कामना की पूर्ती करता है, वही नियम देव सिद्धि, मन्त्र सिद्धि, ध्यान सिद्धि , न्यास , संकल्प , गुरु दीक्षा सभी पर लागू है। रूचि यानी भाव की व्याकुलता नहीं है , मानसिक एकाग्रता का अभ्यास के संकल्प साहस नहीं है; तो यह क्षेत्र आपके लिए नहीं है; क्योंकि नियम तो एक ही है, अपर ये अभ्यास परा जगत की सूक्ष्म ऊर्जात्मक रूप पर किये जाते है, इनमें बहुत मानसिक बल लगाना होता है, जो अभ्यास से प्राप्त होता है।

पूजा अनुष्ठान आदि में न्यास आदि क्रियाओं में शरीर पर या मूर्ती के अंगों पर न्यास किया जाता है। पंडित जन यहां मन्त्र पढ़कर स्पर्श करके न्यास कार्य सम्पन्न करते है; पर जब हम पूरे आध्यात्मिक एवं तांत्रिक गुप्त साधनाओ के क्षेत्र को देखेंगे; समग्र रूप में देखेंगे, तो ज्ञात होगा कि यह शरीर के ऊर्जा चक्र का संशोधन है और इसके अनेक रूप है। अघोर मार्ग, देवी मार्ग, भैरवी मार्ग में तो यह इतना स्पष्ट है कि बच्चा भी समझ सकता है कि इसका उद्देश्य क्या है।

अघोर मार्ग में विशेष मुद्रा में अग्निबीज मन्त्र से स्वयं को चिता पर भाव करके भाव में ही अग्नि प्रज्वलित कर अपने शरीर को जलाते हुए , अपने मांस-मज्जा आदि का भक्षण किया जाता है। जब भाव में पूरा शरीर जलकर भस्म हो जाता है, तो वायु मन्त्र से भाव में तेज हवा का आवाहन करके भस्म उड़ाया जाता है। जब सारा भस्म उड़ जाता है, तो वरुण बीज से देव गंगा का आवाहन करके शिव की जटा से गिरती धारा भाव में इस पर डाली जाती है। यानी आत्मा को निर्मल भौतिक मल-विकार –भाव से मुक्त किया जाता है। हर अंग में यही उद्देश्य होता है। कुछ 6 अंगों पर किया जाता है, कुछ 9 चक्रों पर, कुछ 50 मातृका चक्रों पर, तो कुछ केवल सहस्त्रार पर और मूलाधार पर।

यह भाव ही आध्यात्मिक ,भौतिक, परा भौतिक जगत के समस्त क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को सम्पन्न करता है। इसी के केंद्रीय भूत होने से देवी-देवता या शक्ति का प्रत्यक्षीकरण होता है। यह जीवात्मा की मुख्य शक्ति है। यही मानसिक शक्ति और मस्तिष्क को भी नियंत्रित करता है। यही ऊर्जा चक्र को भी विकार विहीन करता है।

अब पत्थर पकड़ के बैठ जाएँ कि हमारे गुरु ने यहाँ कहा था , फलाने शास्त्र में यां कहा गया और हालत यह है कि वह किसी संक्षिप्तकरण में सम्पादित पुस्तक होगी या या गुरु रचित। पर शास्त्रों का तो महा सागर व्याप्त है और जाने कितनी –कितनी प्रकार की व्याखाएं है। उनको रटने से तो ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती, उनके मर्म को समझना होगा , क्योंकि तथ्यात्मक बातें समान नहीं है। विपरीत है।

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