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ध्यान योग; कैसे काम करते हैं; ऊर्जा चक्र

हमारे शरीर की ऊर्जा व्यवस्था एक जटिल संरचना है। यह इतनी जटिल है कि इसे कंप्यूटर पर एक्सपर्ट डिजाईनर के माध्यम से बनाया जाये , तो 6 घंटे प्रतिदिन के हिसाब से 3 महीने लगेंगे। सक्रिय एनीमेशन में तीन आदमी 6 घंटे के हिसाब से तीन महीने। इसे समझना सबके लिए आवश्यक नहीं है। यह महायोगियों से भी ऊपर का ज्ञान है। ध्यान योग में हमें अपने नौ चक्रों की क्रिया को समझना चाहिए। उस क्रिया को जो हमारे सामान्य जीवन की जरूरतों को पूरा करता है। फिर ध्यान योग विद्या का सारा आंतरिक विज्ञान समझ में आ जायेगा।

हम कहाँ है?

शरीर के समस्त चक्रों का स्वामी ‘जीव’ कहा है? वह क्या है?

हम शरीर के अंदर रीढ़ के मध्य अनाहत चके के केंद्र में हैं। हमारे ऊपर एक नारंगी के समान गोल संरचना है, जिसकी पूँछ से जेट धाराएं निकलती है और शीर्ष से फव्वारे। हम शिव के डमरू जैसे हैं, जिसमें एक शंकु ऊपर मध्य में , एक शंकु नीचे मध्य में और इनके मध्य आर-पार छेद है, जो तीन नलियों में एक के  ऊपर एक है। इन्हीं से नीचे जेट , ऊपर फव्वारे छुट्टे है। इस जीव के केंद्र में एक गोल गैप है। बिंदु जैसा। इसमें मूलतत्व/परमात्मा/परब्रह्म/ या सदाशिव तत्व है। यह इस सूक्ष्मतम परमाणु में बंधा , अपना ज्ञान , रूप , शक्ति सब भूल गया है। प्राचीन तंत्राचार्यों ने इसे ‘अणुमल’ कहा है।   क्योंकि यह पर ब्रह्म नलियों , धाराओं के द्वारा ब्रह्माण्ड और उससे परे के अनंत रूप पर ब्रह्म से जुड़ा है, जिसकी सट्टा, शक्ति की कोई सीमा नहीं ; पर यह अपने को उस परमाणु तक ही समझता है।

इस परमाणविक गोले के ऊपर एक वायुतत्व ऊर्जा का घेरा है, जिसमें इसके फव्वारे डूबे हुए है। उसके ऊपर फिर एक डमरू है। इसके मध्य यह परमाणु है। यह भी पूर्ववत गोले , पूँछ, फव्वारे से घिरा है। उसके सतह के चरों ओर फिर एक वायु ऊर्जा है और यह एक तीसरे डमरू में के मध्य है। यहाँ भी यही संरचना है। इसका जो गोला है, उससे जो ऊर्जा फ्लेम निकलती है, उसके चारों ओर भी वायु क्षेत्र है और यही हमारा अनाहत चक्र है।

सभी 9 चक्रों की , बल्कि सूक्ष्म से सूक्ष्म चक्रों की संरचना यही है। जिस शरीर में ये चक्र स्थित है; उस शरीर की भी संरचना यही है।

हमारी ऊर्जात्मक क्रिया

  1. आज्ञाचक्र की तरंग चारों ओर दूर-दूर तक गमन करती है और विभिन्न ऊर्जात्मक इकाइयों से टकराती है। उसका सिग्नल मस्तिष्क में पहुँच जाता है , वहां से वह विशुद्ध चक्रों से होता, नाभिक या अनाहत के केंद्र में जीव तक पहुँचता है। यह ज्यों का त्यों नहीं होता। हर चक्र रिसीव करता है, फिर उसे ओने सिग्नल में परिवर्तित कर देता है। जीव यसे रिसीव करता है। रूचि हुई, तो इन्क्वारी का सिग्नल फिर वैसे ही भेजता है और आज्ञाचक्र की तरंग उसका पालन करती है।यह क्रिया अत्यंत तीव्रता से चलती रहती है। और इसमें जो ऊर्जा की जरूरत होती है, वह अनगिनित समीकरणों में होती है। शरीर के सारे चक्र उस हिसाब से क्रिया करते है।
  2. जिसमें जीवात्मा की रूचि होती है, उन सारी जानकारियों को सहस्त्रार चक्र का चन्द्रमा आपने अंदर संग्रहित करता जाता है, चाहे उसका महत्त्व तत्काल हो या न हो। ज्सिमें रूचि नहीं होती, वह कहीं रिकॉर्ड नहीं होता।
  3. जिसमें जितनी रूचि होती है, वह उतना ही गहरा अंकित होता है और उस समीकरण को प्राप्त करने में समस्त सम्बन्धित चक्रों की तीव्रता बढ़ानी पड़ती है। बार-बार वह रिपीट हो, तो सभी आदी हो जाते है और रूचि होते ही तुरंत वह क्रिया होने लगती है।
  4. मानसिक तरंगों की शक्ति , प्रवृति बार-बार के अभ्यास से बढती है और जैसे- जैसे अभ्यास होता जाता है, वह कार्य सरलता से होने लगता है।
  5. चाहे हम खेत ताम (कुदाल चलाना) रहे हो, या हवाई जहाज उड़ा रहे हों या खेल रहे हो, या बंदूक चला रहे हो, यह अभ्यास ही हमें मंजिल तक पहुचाता है और उस क्षेत्र का एक्सपर्ट बनाता है

यह समस्त प्रकृति की इकाइयों पर लागू है। शेर के द्वारा शिकार करने से लेकर मछली के द्वारा तैरने तक। अचम्भा यहाँ घटता है। यही समीकरण एक सीमा के बाद वंशानुगत हो जाता है। नयी निकाई उसी समीकरण को लेकर जन्म लेती है। यह एक अलग क्षेत्र है और इसका भी वैज्ञानिक कारण है। इस समय यह हमारा विषय नहीं है

अब यहाँ कई प्राकृतिक नियम नियम मिलते हैं

  1. हम जिसमें रूचि लेंगे, उसी समीकरण में हमारे ऊर्जा चक्रों का समीकरण क्रिया करेगा।
  2. हमारी रूचि जितनी तीव्र होगी , ऊर्जाचक्रों के उस समीकरण के सभी चक्रों की तीव्रता भी उतनी ही होगी।
  3. हम जिस समीकरण पर अभ्यास करेंगे , उसी पर सेट हो जायेंगे और वह प्राप्त करना सरल से सरलतम होता चला जायेगा।
  4. इस अभ्यास के लिए हमें पूरी रूचि के साथ बार बार उसे रिपीट करना होगा यानी बार-बार भजना होगा।
  5. एक सीमा के बाद यह अभ्यास स्वयं हमें भजवाने लगेगा।

सारी चाभियाँ इन नियमों में है

ये नियम प्रकृति ने उत्पन्न किये है, ताकि हर जीव अपनी-अपनी कामना पूर्ती कर सके। इन नियमों का ईमानदारी से पालन किया जाए, तो ये सीमाविहीन है। सभी मनोकामनाकी पूर्ती कराने में सक्षम। इसमें असंभव कुछ भी नहीं।

पर इसका यह अर्थ नहीं कि एक मनोकामना के कार्य की सिद्धि कर लेने वाला हर मनोकामना की प्राप्ति उसी प्रकार कर सकता है। उसके लिए बहुत सरलता हो जाएगी, क्योंकि मानसिक तरंग तीक्षण और शक्तिशाली हो गयी है, पर क्षेत्र बदलेगा, तो उसे पुनः अभ्यास करना पड़ेगा, चाहे 20% में ही उसे सफलता मिल जाए। पर ऐसा नहीं है कि जिसने रिवाल्वर पर निशाना लगाना सिखा है , वह राइफल भी हाथ में पकड़ते ही, वैसा ही निशाना लगा लेगा और यदि क्षेत्र ही बदल गया, उसने कवी बनना चाहा, तो उसे पुनः इस पर नया अभ्यास करना होगा, क्योंकि भाव समीकरण सर्वथा विपरीत है।

तब तंत्र योग आदि के आचार्यों ने (ये श्रृंखलाओं में सैकड़ों है, आदि पुरुषों के नाम तक ज्ञात नहीं) सोचा कि यदि सारे चक्रों को असीमित तीव्रता प्रदान की जाए, तो ?

मगर कैसे?

इसी का मार्ग है ध्यान योग

इसकी चाभी है, मानसिक तरंग। मानसिक तरंगों को शक्तिशाली बनाकर कहीं भी, किसी भी भाव में डूबा जा सकता है।

इसे परखा गया और सत्य पाया गया। इस पर बहुत से प्रयोगों को किया गया और मतमतान्तर उत्पन्न हो गये। यह मतांतर विज्ञान के सम्बन्ध और नियमों के सम्बन्ध में नहीं थे।

एक ने कहा कि सिर के चाँद से अमृत प्लावन होता है, इसके छेद को खोल लो, तो ईंधन अधिक मिलेगा और सारे चक्र तेज हो जायेंगे , मृत्यु भी न होगी। न बुढ़ापा आएगा। बस यहीं ध्यान लगाकर प्रयोग करो।

दूसरे ने कहा कि खेत के मेढ ठीक नहीं और नहर का पानी खोल रहे हो? शरीर ही नहीं रहेगा। सारे चक्र भिन्न-भिन्न हो जायेंगे, पहले चक्रों को शक्तिशाली बनाओं । बस मुख्य 9 को बना लो, बाकी सब हो जायेंगे।

यहाँ फिर मतान्तर हो गये। एक ने कहा , ऊपर से शुरू करो। दूसरे ने कहा नीचे से शुरू करो। तीसरे ने कहा तामसी चक्र को निरुद्ध करो। चौथे ने कहा कि शक्ति की प्राप्ति तो उससे ही होती है।निरुद्ध करोगे तो वह निष्क्रिय हो जायेगा। फिर ताकत नहीं मिलेगा किसी चक्र को , तो वह तीव्र क्या होगा?

और यह विज्ञान अनंत शाखाओं में बंटता चला गया। कठिनाई यह हो गयी कि तना और मोटी डालियाँ ज्ञान और उसके आधार लुप्त हो गये। उसे अंधी आस्थाओं के दीमक ने खा लिया और शाखाएं उन दीमकों के जहर से पागल हो गयीं। सब अपनी – अपनी अंध आस्थाओं और सम्प्रदायों को मार्ग बताने लगे, उसे ही सत्य कहने लगे। आज यह विज्ञान प्राचीनतम ग्रथों में भी कहीं उपलब्ध नहीं है।

हमें उन सात रहस्यमय सन्यासियों से दिशा निर्देश न मिलता , तो हम भी इस ब्रह्माण्ड और सनातन धर्म को जानने की प्रबल जिज्ञासा ह्रदय में लिए ही समाप्त हो जाते। मैं उन्हें गुरु नहीं कहूँगा, क्योंकि मैंने उन्हें गुरु बनाने की इच्छा कभी नहीं की थी। मुझे तो उनके बारे में पता भी न था। आज भी नहीं जानता कि वे कौन थे? अब वे नहीं आते।

उन्होंने ही कहा कि भगवान् सदाशिव की इच्छा है कि आधुनिक युग के अनुरूप आप इसे लोगों तक पहुंचाए । मैंने कहा भी कि –“मैं? इस परमाणु शक्ति सम्पन्न महा विद्वानों , महा ज्ञानियों और महान व्यक्तियों के बीच?

मैं हस रहा था , पर वे गम्भीर थे।

 

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