धर्मालय की चमत्कारिक औषधियों का रहस्य

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आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से लाइलाज रोगों का इलाज़

बहुत से लोग हमसे जानना चाहते है कि क्या हमारी औषधियाँ मंत्र सिद्ध होती है? या क्या आयुर्वेदिक होती है? इसी प्रकार के अनेक प्रश्न होते है। हम उत्तर देते है; नहीं। या आधुनिक किसी भी चिकित्सा विधि से निर्मित नहीं होती। इन दवाओं को तांत्रिक विधियों से बनाया जाता है। – पर यहाँ भी एक भ्रम उत्पन्न होता है। तन्त्र-मंत्र का जो निष्कृष्ट , झूठा और पाखण्डी रूप लोगों की नजर में है, वह मानक बन जाता है। और जिनका रोग दूर हो सकता है, हमेशा के लिए अनेक यंत्रणा से मुक्ति मिल सकती है, वह भी हमसे सम्पर्क करके भी हिचकिचाने लगते है।

हम पहले कह आये है कि जो धर्मालय की वेबसाइट पर  है, वह कहीं नहीं है। यह भारत के उस अछूते रहस्यमय प्राचीन विज्ञान की डिस्कवरी है, जो कभी मृत्युंजय औषधियों का निर्माण करता था। और जिसके विज्ञान के विवरण ब्रह्माण्ड के बाहर तक की डिस्कवरी करते है। आईये बताते है कि किसी औषधि में चमत्कार कैसे उत्पन्न किया जाता है और किस प्रकार आधा चावल भर औषधि  प्रतिदिन में उन समस्त रोगों को जड़ से मिटा देती है, जिनको आज की चिकित्सा पद्धति लाइलाज मानती है या उलटे सीधे ढंग से उसे दबाने का प्रयत्न करती है । हमारी कोई भी बात गोपनीय नहीं है। हम केवल उन बातों को गोपनीय रखते है, जिनका दुरूपयोग हो सकता है।

इस पद्धति में औषधियों के कई रूप होते है। भस्म, सूक्ष्म अर्क, और अन्य रूप होते है; पर यह आयुर्वेद की विधि से बनाये नहीं जाते । क्योंकि उन विधियों से अब भस्म या अर्क बनाना संभव नहीं है। जो दावा करता है , वे या तो झूठ बोलते है या फिर जनहित की हानि करते है; क्योंकि सरल तरीके से बनाया गया भस्म लाभ करता नहीं, हानि पहुंचाता है। अर्क में भी शोधन नहीं हो सकता आजकल।

हम क्या करते है?

बहुत सी वनस्पतियाँ ऐसी है; जिनकी जड़ों , तनों, छाल , गुठली में लोहा , ताम्बा, चाँदी गंधक, अम्रक आदि होते है। ब्रिटिश काल में बहुतों के एनालिसिस किये गये थे। तन्त्र में इसे ग्रहों के हिसाब से बताया गया है और ज्योतिषी तक जानता है कि प्रत्येक ग्रह का धातु होता है। बबूल शनि का पेड़ है, तो छाल, जड़, लकड़ी में लोहा होगा। यह पूरा चार्ट है। लाखों वनस्पतियाँ , पहले से ग्रहों में बंटे है।

इस प्रकार वनस्पति का चुनाव रोग के अनुसार या उसके नुस्खों के प्राचीन विवरण को ज्ञात करके उन्हें सुखाकर जला दीजिये। राख को डिस्टिल्ड वाटर में 20% मदिरा मिलाकर घोल दीजिये। प्रातःकाल ऊपर का पानी निथार कर या तो चिकने स्टील या शीशे के चौड़े बर्तन में धूप में रखा दीजिये या धीमी आंच पर गर्म कीजिये। पानी उड़ने के बाद उसमें जो पाउडर बचता है, वह चमत्कारिक भस्म है। जिस रोग के नुस्खें का है, उसमें केवल आधा से एक चावल आप के शरीर के आन्तरिक विकार को दूर करके जिसके कारण वह रोग हुआ है, उस कारण को ही मिटा देगा। किसी स्थूल दवा से आप यह लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यह सीधे खून में मिलता है। इसे शरीर को पचाने की ज़रूरत नहीं होती। हम पहले स्पष्ट कर आये है कि धातक किये-कराये में भी तन्त्र में इन्ही विधियों का अपयोग होता है , पर यह अमृत दान भी है। सूक्ष्म स्तर पर व्याप्त रोगों से लेकर स्थूल रोगों तक में यह रामवाण की तरह काम करती है।

इस विधि में आपको ज्ञात होना चाहिए कि आपके रोग की दवा क्या है और आपके रोग की प्रकृति के अनुसार (कफ, पित्त, वायु या त्रिदोष) उसमें सहभागी कौन –कौन सी चीज होगी। इस सूक्ष्म मात्रा को आपको किस बेस में मिलाना है, ताकि डोज अधिक न हो।

अब आईये अर्क यानी लीकर औषधि में – साधारण सा पौधा अहि एरंड। सभी जानते है। साधारण सी चीज है लहसुन। लहसुन को पानी में 12 घंटे रखिये। देशी एरंड के बीज को छीलकर बराबर मात्रा में डालें। दोनों के 1/8  काली मिर्च लें। छिली लहसुन + एरंड के बीज + काली मिर्च को खरल में डालें और ताजे एरंड की जड़ और पत्ते को हल्का पानी देकर पीसकर निकाला गया (कपड़े से निचोड़ कर) रस डाल-डालकर  12 घंटा घोंटे। (खरल करें)। थोडा-थोडा रस डालकर घोंटते रहे। वह सूखे , फिर घोंटे। इसे 4 गुणा मदिरा में डालकर (शीशे की बोतल कागवाली) खूब हिलाए और रख दें। 7 दिन (न्यूनतम) प्रतिदिन 6 -7 बार उसे खूब  हिलाएं । फिर छानकर बोतल में बंद कर लें। इसे अन्य विधि से इतना चमत्कारिक बनाया जा सकता है, जो आअज की कल्पना से बाहर है।

यह वातरोग की दवा है। वायु के जोर के सभी कष्ट इससे जड़ से दूर होते है। (साथ में एक – दो दवा और हो सकती है या भोजन में कोई विशेष वस्तु हो सकती है)। पेट , छाती, नख, मांस, हड्डी में व्याप्त वायु इससे निकल जाती है और दवा भी कुछ बूंदों में लेनी होती है। यह वात के शूल, हड्डी का दर्द, वायु के कारण शरीर कमर में दर्द, संधियों का दर्द, गठिया – सभी में चमत्कारिक प्रभाव डालकर कष्ट को दूर करता है। इससे शरीर की आंतरिक क्रिया ही सुधर जाती है। यानी रोग मुक्ति । दवा खाने से छुटकारा।

गैगरीन की चिकित्सा – सड़ने वाले घाव यानी गैगरीन में आजकल ऑपरेशन करके मांस हटाया जाता है; पर तन्त्र का एक साधारण नुस्खा प्रयोग कीजिये। मदार (अर्क/आक) के पत्ते, डंठल, जड़ के पीस कर (थोडा पानी डालें) लुगदी बनाये और 8 गुणा पानी में डालकर धीमी आंच पर उबाले। आधा पानी रहे, तो छानकर रख लें। गौ मूत्र से धोकर उस पर मदार का दूध डालें और इस काढ़े का दो चाय चम्मच इतनी ही गाय के घी के साथ दिन में दो बार पीयें। मदार के दूध डालकर मदार के ही पत्तों की लुगदी रखकर कपड़ा बांधे। 9 से 15 दिन में सड़ा हिस्सा निकल जाएगा। और उसमें नया मांस भरने लगेगा। (आँख बचाए, दूध न पड़ें)

इसका भी अर्क उपर्युक्त तरीके से बनाया जाता है । उसी को लेना , उसी से धोना किया जाता है; पर इस प्रकार बिना मूल्य के प्राप्त (केवल मजदूरी पर) इस औषधि की कीमत बहुत हो जाती है, क्योंकि इसमें तब कई चीजे भी मिलाई जाती है। इससे रतौंधी, नेत्रों की कमजोरी, खाँसी, जकड़ा बलगम, चर्म रोग , फोड़े-फुंसी सभी दूर होते हैं। मैंने इससे सूर्य की निर्बलता को भी दूर किया है।

सन्तान बाधा –  इसके लिए कोई पुत्र जीवक ढूंढता है, कोई अन्य जड़ी। कोई कुमारी कन्या से पिसवाने में विश्वास करता है, कोई कपिला गाय ढूंढता है। पर ये सारी औषधियाँ स्त्री के गर्भाशय विकार और एसिडिटी को दूर करती है। इसके सैकड़ों नुस्खे तन्त्र में है और इस सबकी दवा उपर्युक्त तरीके से बनाई जा सकती है। केवल अजमाइन –कालानमक का विशेष विधि से सेवन भी यह काम कर सकता है।

अब मुसीबत यह है कि हमारी निति क्या है?

जो मल्टीनेशनल कंपनी बताये। हमारे यहाँ लाइलाज क्या है? जिनकी दवा मल्टीनेशनल कम्पनीयों ने न बनाई हो। आयुर्वेद का केवल नाम है। उसकी भी पेटेंट दवा बनेगी और आयुर्वेद के डॉक्टर एलोपैथिक औषधियों से चिकित्सा करेंगे। आयुर्वेद में  ऐसा नहीं हो सकता है । किसी रोग की पेटेंट दवा नहीं बन सकती। क्योंकि कारण कम से कम 6 होते है और औषधि के प्रभाव एक दूसरे के विपरीत होती है। पेटेंट से 4 के रोग सुधरेंगे तो 6 के और बढ़ जायेंगे।

अब मुसीबत यह है कि लोगों कि कल्पना में प्रचलित पद्धति है, तो वह तो है ही। फिर आप बीमार क्यों है? कोई जरूरी नहीं कि वनस्पति दुर्लभ हो। जरूरी यह है कि आपको यह ज्ञात हो कि वह किस रोग की दवा है और उसमें चमत्कारिक गुण कैसे उत्पन्न किया जा सकता है। लेकिन हम किसी बात को वैज्ञानिक रूप से नहीं समझना चाहते है। बस सोचते है कि चमत्कार तो मन्त्रों में होता है, पर कोई कहे कि ध्वनि कम्पनावृति में होता है , तो उसे मारने दौड़ेंगे।

 

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4 Comments on “धर्मालय की चमत्कारिक औषधियों का रहस्य”

  1. Iread your Remidies its very Nice.
    Kindly advice , Mari last 5 yrs sai Nas Dabi huai hai left Neck, Solder, Hand & back har samay dard hota rahaita hai. Chest mai aagai ki nas mai bhe dard hota hai. Is ki vajai sai Stomach bhi phhol jata hai , gas banti hai hai kuch samaz mai nahai aaraha.
    (Yeah sab mai aik baar laita hua thaa ot latai latai peechay khisak aur yai nas( Vain ) dab gai aur bahut joor sai dard hua.

    Doctors check up karvaliya kuch aram nahai hai.Neuroligest nai bataya ki nas dab gai hai. Excise batai hai par arram nahai hai.

    Please koi upai/ davai batayan.

    Jitendra Singh
    Age- 45 Yrs.

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