धर्म ज्ञान और मानव -जीवन

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हम इस ‘धर्म’ शब्द का अर्थ समझने में हम सदा भ्रम में पड़ जाते हैं. इस शब्द के सामने आते ही पूजा -पाठ, तिलक-माला, मन्दिर-तीर्थ, देवी-देवता, आदि के दृश्य सामने आ जाते हैं . जो लोग बुद्धिवादी हैं, वे इसका अर्थ ‌मज़हब या रीलिजन लगाने लगते हैं. परन्तु हमारे ‌प्राचीन आचार्यों ने इसे इस संकुचित अर्थ में नहीं लिया है. इसका अर्थ ‘नियम’ है.

यद्यपि बहुत कम प्राप्त होते हैं, परन्तु संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों  में कई स्थान पर यह कहा गया है कि धर्म मुख्य रूप से दो प्रकार के हैं. सनातनधर्म और लौकिक धर्म. सनातनधर्म परमात्मा से उत्पन्न होता है. यह शाश्वत और अपरिवर्तनशील है. यहअविनाशी धर्म है. इसका नाश कभी नहीं होता. यह ब्रह्माण्ड और इसका कण-कण इस धर्म के अधीन है. ये ब्रह्माण्ड के नियम नहीं हैं. ब्रह्माण्ड इनसे शासित होता है. ब्रह्माण्ड नष्ट हो सकता है, पर ये नियम नष्ट नहीं होते. ये परमात्मा में विलीन हो जाते हैं. नये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति इन्हीं नियमों से होती है. यॆ एक एक कर फिर स्थापित हो जाते हैं. इन नियमें से परे कोई नहीं है चाहे वह इन्हें जाने या न जानें .

लौकिक धर्म समयकाल और परिस्थिति के अनुसार बदलता  है. यह समुदाय, संगठन, परम्परा, संस्कार, पर आधारित होता है इसे मनुष्य निमिॆत करते हैं. परिवर्तनशीलता ही इसकी प्रगति है. जड़ता में जड़ा लौकिक धर्म मूखों का होता है. ऐसे लोग जो इस प्रकार के नियमों को पकड़ कर बैठ जाते हैं, अग्यानी हैं, व्यथॆ में ही मन और शरीर को कष्ट देते हैं .

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