देवी-देवता काल्पनिक है , तो पुराण की कथाएँ क्य़ा है?

यह विषय पहले स्पष्ट किया जा चुका है। ऐसे विषयों को जानने के लिए हमारी वेबसाइट धर्मालय www.dharmalay.com  का अध्ययन करें , सभी शक्तियों का अस्तित्त्व , ब्रह्माण्ड की ऊर्जा में  घुला हुआ है , हर इकाई इन शक्तियों को उत्सर्जित करती रहती है। ये नौ प्रकार के मुख्य ऊर्जा समीकरण से बनती है। इन ऊर्जाओं की उत्पत्ति परमात्मा से होती है। जो स्वयं एक ऊर्जामय तत्व है , लेकिन भौतिक नहीं है। ये सारी शक्तियाँ भावना से केन्द्रित होती है और आकर्षित होती है। इन सबही शक्तियों को 9 वर्ग में बांटा जा सकता है क्योंकि ये नौ शक्तियों की ही उत्पत्ति है , जो आपस में मिलकर बनती है। हम जिस भाव में डूबते है , उसकी ऊर्जा हमारे शरीर में उत्पन्न होने लगती है। और वातावरण के सापेक्ष हम एक नेगेटिव इकाई है। हमारे शरीर से जब इस ऊर्जा का उत्सर्जन होता है , तो सनातन नियमों के अनुसार उसके चारों ओर पॉजिटिव बनने लगता है और नेगेटिव यानी हमारे शरीर में समाहित होने लगता है।

 

समस्त सिद्धियों के सूत्र यही है । केवल मन में कल्पना करने से भाव की उत्पत्ति कठिन हो जाती है , उसके लिए कोई दृश्यात्मक मूर्त्त स्वरुप चाहिए।और ऐसे ही स्वरुप हमारे देवी देवता के रूप में मंदिरों में स्थापित है। तन्त्र के जितने भी प्रामाणिक प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध है या जो भी विश्वविद्यालयों में धूल चाट रहे है उनमें स्पष्ट किया गया है कि ऐसे रूपों की कल्पना की जाती है या भावना की जाती है। इनका मूर्त रूप ब्रह्माण्ड में कहीं भी नहीं रहता। जहाँ तक पुराणों की कथाओं की बात है वे रूपक है । कथाओं के माध्यम से आध्यात्मिक सत्यों को कहा गया है , यह स्वाभाविक भी है। क्योंकि सामान्य जनता उस युग में वैज्ञानिक सत्यों को समझने में असमर्थ थी। क्योंकि इस विज्ञान को गुप्त रखा जाता था। आज आधुनिक विज्ञान इतना डेवलप हैं कि उसके द्वारा इसे समझाया जा सकता है , आज का आध्यात्मिक जगत केवल उन कथाओं में घूम रहा है , पर कथाएँ सत्य नहीं है ।कथाओं में कही गयी बात सत्य है , एक  तो कहानी है जिनमें कुछ कहा गया है।  पुराणों की रचना बहुत बाद में हुई है , जब अशिक्षा के कारण सनातन धर्म का विनाश होने लगा था, तो लोगों में इस ज्ञान के प्रचार के लिए कथाओं की रचना की गयी थी।

 

 

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