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दुर्गा जी की सिद्धि कैसे करें?

आजकल यह प्रश्न करनेवाले अनेक लोग है। विशेषकर नवरात्र में ऐसे प्रश्नों की बाढ़ आ गयी है। विशेषकर स्त्रियों के प्रश्न कि माता की कृपा कैसे प्राप्त करें? अनेक कहते है कि मन की मुराद पूरी करने के लिए माता की सब तरह से अर्चना की; परन्तु मुराद पूरी नहीं हुई। कुछ देवी पीठों की यात्रा करके भी कुछ प्राप्त नहीं कर सके। कुछ न अपनी झोलियाँ भर ली!

क्यों?

अंधों की तरह अपनी धार्मिक आस्थाओं और पूजा पाठ आदि को मानियेगा, तो कुछ नहीं मिलेगा। मिलेगा दो प्रकार से। एक कि जो मुराद है, वह वास्तविक है। जैसे चाहते है, धन और भौतिक सुख और कहते है कि सिद्धि चाहते है । क्यों चाहते हैं सिद्धि? आपकी कामना ही झूठी हो गयी । जब सिद्धि कर रहे है, तो उद्देश्य सिद्धि होना चाहिए। उसे प्राप्त करने के बाद ही आप उसके उद्देश्य के बारे में सोच सकते है। हे देवी! शत्रु बहुत तंग करते है; उनका नाश कर दो। वह कर देगी; पर आप सच कह रहे है? शत्रु आपको तंग करते है या आप अपनी किसी महत्त्वाकांक्षा के लिए कुछ को नष्ट कर डालना चाहते है? वास्तव में शत्रु से दुखी होकर व्याकुल मन से केवल एक बार पुकारिए अंतरमन से । वह शक्ति आपकी इच्छा जरूर पूरा करेगी। सब कुछ आपके ही माध्यम से होगा, पर आपको चमत्कार ही लगेगा।

सिद्धि चाहनेवालों को जानना होगा कि दुर्गा जी क्या है? क्योंकि सिद्धि-साधनाओं का क्षेत्र वैज्ञानिक और तकनीकी है।

दूरजा जी स्वाधिष्ठान चक्र की देवी है। यहाँ एक बिंदु रूप शिवलिंग होता है। लाल रंग की आभा से युक्त। उससे एक प्रकाश पुंज (सर्किट फ्लेम ) बनता है।यह भैरवी चक्र होता है। यह भैरवी चक्र उस फ्लेम के मध्य में होता है; जो कमल के पत्तों की तरह चारों ओर फ्लेम फेंक रहा होता है। भैरवी चक्र के चारों ओर एक गोल ऊर्जा वृत्त बन जाता है और उससे निकलनेवाली ऊर्जा उस गोले में फैलकर एक विशेष सर्किट में नाचती है और कवच वृत्त के बाहर ऊर्जा-फ्लेम निकलने लगता है। ये चक्र नौ होते है और सभी की संरचना एक ही प्रकार की होती है; बस शिवलिंग, भैरवी चक्र , फ्लेम के रंगों में अंतर होता है।

इस चक्र के फ्लेमों से जो ऊर्जा निकलती है, वह सिन्दूरी रंग में कुछ कुछ पानी के रंग की होती है।यह ऊर्जा शरीर की तरलता और क्रियाशीलता बनाती है। इसलिए इसे जलज ऊर्जा कहा जाता है। पर ये शुद्ध जल नहीं है। ये जल का निर्माण करने वाली ऊर्जा है। हमारे शरीर में जो किसी भी तरह का प्रवाह होता है; वहां यही शक्तिकाम करती है। ऊर्जा प्रवाह में भी। ये सक्रियता की देवी है और इसकी अधिकता मानसिक चंचलता और अस्थिरता उत्पन्न करती है। इस बकरी के बच्चे जैसी चंचलता पर नियंत्रण किये बिना दुर्गा जी की सिद्धि नहीं होती। इसकी बलि देने का निर्देश है। यानी दुर्गा जी का आवाहन किया है तो इनकी शक्ति को सँभालने की योग्यता भी उत्पन्न कीजिये। यह योग्यता मानसिक अभ्यास से प्राप्त की जाती है। इसलिए सिद्धि दुर्गा की का दर्शन हो जाना या उनकी शक्ति प्राप्त कर लेना भर नहीं है। आपको उन पर नियंत्रण का अभ्यास भी करना होगा यही सिद्धि है।

लोग अज्ञानियों की तरह प्रश्न पूछते है। इन प्रश्नों से लग रहा है कि ये लोग समझते है कि विधियों को जानकर ठीक ढंग से करने पर ही सिद्धि मिल जाएगी। यह क्षेत्र विधि की तकनीकी मात्र नहीं है। विधि-तकनीकी एक ही देवता (देवी) की सिद्धि के हजारों प्रकार की हैं। यह शुद्ध रूप से मानसिक क्रिया है और सिद्धि के इच्छुकों को भौतिक पूजा से पूर्व मानसिक पूजा का निर्देश है। कौन कितने समय में सिद्धि प्राप्त करेगा, यह कहना कठिन है। किसी को बरसों लगे रहने पर भी नहीं होती, कोई तीन बरस में करता है, तो कोई महीनों में। मानसिक एकाग्रता जिद, संकल्प और व्याकुलता पर आधारित होती है।यह व्याकुलता माँ के लिए तड़पते रोते छोटे बच्चे जैसी होनी चाहिए।

दुर्जा जी का बीज मंत्र ‘दुं’ कहा गया है। वैसे अन्य बीज मंत्र भी कहे जाते है। इसमें प्रारंभ में प्रणव तीन बार बीज मंत्र और ‘दुर्गाय नमः’ कहने पर ( ॐ दुं दुं दुं दुर्गाय नमः) एक संशोधित मन्त्र है।


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ध्यान रूप – दुर्गा जी एक विख्यात देवी हैं। सभी किसी न किसी रूप को ध्यान में जानते है। जो जानते है; उसी रूप का ध्यान कीजिये। पंजाब के लोग महिषासुर मर्दिनी रूप ध्यान लगाने की जगह वैष्णों देवी के रूप ध्यान को सरलता से लगा सकेंगे। बंगाल के लोग के लिए वैष्णों देवी रूप ध्यान लगाने की अपेक्षा महिषासुर मर्दिनी का ध्यान लगाना होगा। अंधी आस्था में मत पड़िये। ये ध्यान रूप हैं। भाव पर आधारित कल्पना। आप जिस रूप में रूचि और आस्था रखते है, उस पर ध्यान लगाईये।

तिथि – कार्तिक – चैत के नवरात्रा का समय तो होती ही है। प्रत्येक पंचमी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी चाहे कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की पूजा करके साधना कार्य प्रारंभ करने के लिए उत्तम होता है।

दिशा – ईशान कोण की ओर मुख करके या यहीं इसी कोण पर पूर्व – उत्तर की ओर मुख करके। (इनकी विशेष साधनाएं दक्षिण एवं पश्चिम, अग्नि- वायु – नै ऋत्य कोण में भी की जाती है।

यंत्र – चक्र में बना दुर्गा जी के सिद्ध यंत्र। मन्त्र के सामने पिंडी।

समय – काल-रात्रि (9 से 1); ब्रह्म मुहूर्त (संशोधित)

वस्त्र – आसन – सूती सिंदूरी।

माला – रुद्राक्ष (उद्देश्य से भिन्न-भी)

आचार-व्यवहार

दुर्गा जी की तांत्रिक तामसी साधनाएं अधिकतर कृष्ण पक्ष में की जाती हैं। तन्त्र साधनाओं में चाहे वह शैवमार्ग हो, देवी मार्ग हो, भैरवी मार्ग हो या अघोर मार्ग देवी की पूजा-अर्चना मदिरा , मॉस , मच्छली, भात , खीर, आदि से की जाती है ।पुआ आदि भी। इन मार्गों में उपवास करके देवी की पूजा का विधान नहीं है।

दुर्गा जी की सात्विक साधनाएं हमेशा शुक्ल पक्ष में की जाती है। यह पूजा उपवास करके की जाती है और जो नहीं करते, वे पूजा के बाद फल-दोद्ध आदि का सेवन करते है।

लोग पूछने लगती है कि दोनों में क्या अन्तर है? हमारा उत्तर है। बाघ में दुर्गा का रूप शिकार करने का है और खरगोश में दौड़ने का। वैसे दुर्गा जी तन्त्र मार्ग की ही देवी है। ये वैदिक देवी नहीं । इन्हें आत्मासत किया गया है । सम्भवतः शिव प्रजापति युद्ध के बाद ।

 

11 thoughts on “दुर्गा जी की सिद्धि कैसे करें?

    1. मन्त्र १२५००० का शास्त्रीय निर्देश है . परन्तु यह इस बात पर निर्भर करता है की मानसिक एकाग्रता की स्थिति क्या है .सख्या का इसके बिना कोई मतलब नहीं होता .

  1. में दुर्गा चालीसा का 28 जनवरी से दोनों समय पाठ कर रहा हु कब सिद्ध होगी

  2. गुरुजी प्रणाम, मैं बस आपसे यही कहना चाहता हूँ कि आप जैसे बहुत कम लोग ही बचे हैं जो वास्तविक ज्ञान देने मे सक्षम हैं। पूजा साधना ध्यान तीनो को गहराई से समझने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है।आपके माध्यम से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। यदि कोई साधक सिद्धि प्राप्त कर ले और मानसिक नियंत्रण ना हो तो सिद्धि नष्ट भी हो जाती है।यह हमें पता है। जप करना कठिन नहीं होता, ध्यान करने से ही सिद्धि आकार लेती है।जो ध्यान की बारीकी समझ गया उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं। आपसे विनम्र निवेदन है कि आप वेबसाइट को बंद न होने दीजियेगा और नई नई ज्ञान की बातें अपलोड करते रहिएगा। धन्यवाद। जय महावतार बाबा की।

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