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तुलसी के पत्तों या पौधों पर प्रयोग

तुलसी का पौधा सनातन धर्म में बहुत महत्त्व रखता है | यह आयुर्वेद की भी एक महत्त्वपूर्ण औषधि है | पश्चिमी प्रभाव में लोग यह भूल गये हैं कि इसका चमत्कार क्या है | यदि प्रतिदिन पांच तुलसी के पत्ते और पांच कालीमिर्च को महीन पीसकर या चबाकर प्रात:काल निराहार मुख ताजे जल के साथ उनका सेवन किया जाये, तो शरीर के सभी रोगाणु, विषैले तत्व, रक्तविकार दूर हो जाते हैं | इसके प्रयोग से मस्तिष्क एवं ह्रदय को अपार बल मिलता है |

   इस तुलसी के अन्य प्रयोगों के बारे में आयुर्वेद में विस्तृत वर्णन है | इसे बुखार, सर्दी, खांसी आदि में भी प्रयुक्त किया जाता है | बहुत कम लोगो को ज्ञात है कि यह भूत-प्रेत प्रकोप और ऊपरी बाधा को भी सशक्त ढंग से दूर करती है |

प्रयोग 1- शीशे के श्वेत बिना जोड़ का पिरामिड 21/2 ‘ ‘ के या दो फिट की भुजाओं वाला या गोलाकार बनायें और उसे तुलसी के पौधे के ऊपर इस प्रकार ढकें की केवल वायु अन्दर जा सके | इसे 9 दिन तक छोड़ दें | इसके बाद इसे हटा दें और इस पौधे के पत्तों का रासायनिक विश्लेषण करवायें, तो तुलसी के पत्ते का गुण बहुत बढ़ा हुआ पायेंगे |

यह तुलसी सर्दी या कफ में प्रयुक्त न करें | यह बहुत तेज होती है और इसे चटका देती है | इसका प्रयोग बुखार में, मलेरिया में, प्रतिदिन के प्रयोग में, शरीर पर मालिश करने में, कृमिनाशक के रूप में करने से बहुत लाभ होता है |

प्रयोग 2- तुलसी के पत्तो का अर्क निकालकर या इसका काढ़ा (पीसकर) बनाकर 9 दिन तक पिरामिड के निचे रखने पर इसके औषधीय गुणों में वृद्धि हो जाती है |

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