जीवन और मृत्यु की विचित्र पहेली

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जीव इस संसार में जन्म लेता है, जन्म लेने के बाद एक आकर्षक और मनमोहक जगत को देखता है और उसे भोगने में लग जाता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी अनुभूतियों का दायरा बढ़ता जाता है, इसके साथ ही उसकी भोग की कामना भी बढती जाती है। उसका सारा जीवन भोगों की प्राप्ति के संघर्ष में ही व्यतीत हो जाता है। वह एक क्षण के लिए भी विचार नहीं करता कि वह कौन है और कहाँ से आया है और जिस मनमोहक जगत में उसने जन्म लिया है, वह क्या है, क्यों है?

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मनुष्य स्वयं को इस प्रकृति का सबसे विकसित जीव कहता है। उसका दावा है कि वह पृथ्वी का सर्वश्रेष्ट बुद्धिमान प्राणी है, परन्तु वह भी इन प्रश्नों के बारे में नहीं सोचता। वह स्वयं को सब कुछ समझ लेता है और सारी जिंदगी अपने ‘मैं’ को संतुष्ट करने में लगा रहता है, फिर एक दिन वह शक्तिहीन होकर इस संसार से चला जाता है। उसका ‘मैं’ का अहंकार उसके किसी काम नहीं आता।

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