चेतन मन, अवचेतन मन : बचकानी कल्पना

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आधुनिक विद्वानों का भी कोई जबाब नहीं है। अभी तक ‘मन’ की कोई परिभाषा किसी को ज्ञात नहीं , पर मनोवैज्ञानिक का पूरा शहर खड़ा है। इन लोगों ने न केवल मन के अस्तित्त्व को प्रमाणिक मान लिया है, बल्कि चेतन-अवचेतन मन की व्याख्या भी कर डाली है।

जबकि वास्तविकता यह है कि मन का कोई अस्तित्त्व होता ही नहीं है। यह अनुभूतियों से बनने वाला एक काल्पनिक जगत है , जिसकी उत्पत्ति ऊर्जा चक्रों की क्रिया से होती है। पता नहीं कैसे इन मनोवैज्ञानिकों ने मन का सम्बन्ध मस्तिष्क से जोड़ दिया है, जबकि मस्तिष्क का इससे कुछ लेना-देना नहीं है। वह केवल स्मृतियों को आवश्यकतानुसार देता रहता है।

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