गुरु क्यों चाहिए? गुरु किसे बनाएं? गुरु बनाने के नियम

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हमारी सिद्धि साधनाओं से सम्बन्धित पोस्टों पर ऐसे लोगो की भरमार हो जाती है; जो मुझे गुरु बनकर दीक्षा देने की प्रार्थना हो जाती है। इनका कथन होता है कि ‘बिन गुरु होई न सिद्धि’ ।

यह सत्य है कि गुरु की महत्ता होती है; शास्त्रों में भी बहुत गुणगान किये गये है; परन्तु इन सबका अर्थ थोड़ा मस्तिष्क लगाकर समझना चाहिए। आप पढना सीखते है, तब कोई और गुरु होता है , जब हाई स्कूल में जाते है, तो कोई औ होता है और कॉलेज में कोई और। लोग प्राइवेट से भी केवल पुस्तकों को पढ़ कर डिग्रीया लेते है। इन सबकी महत्ता होती है; पर पहली महत्ता आपकी जिज्ञासा , इच्छा, लगन और अभ्यास की है। विश्वास और संकल्प की है। इनके बिना विश्व का महागुरु भी आपको कुछ भी नहीं दे सकता है। जाने कितने पढ़ाई छोड़कर भाग खड़े होते है।

यही फैक्टर आध्यात्मिक क्षेत्र का भी है। प्रकृति में अपवादात्मक नियम नहीं है। एक शराबी शराब खाने को जिन नियमों से ढूंढता है, उन्ही नियमों से आध्यात्मिक या सिद्धियों की भी प्राप्ति होती है।

प्राचीन युग में सिद्धि एवं साधनाएं भिन्न भिन्न गुरु-सम्प्रदाय की बौद्धिक संपदा होती है। उनका इन पर कॉपी राईट होता है। वे सोच-समझकर पात्रता समझ कर, शिष्य द्वारा सेवा से प्रसन्न होकर इसको बताते थे। दीक्षा गुरु शिष्य का के एग्रीमेंट होता था। कुछ भी गुरु के बिना प्राप्त करना कठिन था; पर असंभव नहीं। एकलव्य का उदाहरण सामने है। तंत्र शास्त्रों में भी गुरु की महिमा है ; पर यह भी है कि जो जानना चाहता है , करना चाहता है; वह बिना गुरु के भी सफल होता है। ज्ञान या प्रयोग गुरु को किसने बताया, उसको किसने बताया?इस कर्म को ढूंढेंगे, तो एक ऐसा सामने आएगा; जिसने उस ज्ञान या सिद्धि को अपने ही प्रयत्नों से प्राप्त की थी। सभी साइंस के स्टूडेंट न्यूटन, आइन्स्टाइन आदि वैज्ञानिकों की व्याख्याएं पढ़ते है; पर उनको किसने बताया? यहाँ ज्ञात होता है कि परमात्मा की कृपा से अक्समात या अपने ही प्रयत्नों से उन्हें यह ज्ञात हुआ। एडिशन इलेक्ट्रिकल के डिप्लोमा होल्डर नहीं थे और न ही आर्के मेंडिज ने किसी महा विद्यालय में थीसिस कम्पलीट की थी।

हमें गर्व है अपने पूर्वजों पर। इस सत्य उन्होंने कई स्थानों पर व्यक्त किया है। जो जाना हुआ बताता है, वह गुरु है। गुरु गम्य ज्ञान है। जो जाने हुए से अधिक नया अपने प्रयत्नों से जानता है, वह पहले से श्रेष्ठ है, पर जो सीधे ‘परमात्मा’ से दीक्षित होता है; उसे सबकुछ अक्समात ही ज्ञात हो जाता है। यह सबसे श्रेष्ठ है। कालांतर में इसी का ज्ञान सभी गुरुओं द्वारा प्रसारित होता है। जाने कितने प्रामाणिक तंत्र- ग्रंथों में ऐसे श्लोक बिखरे पड़े है।

धर्मालय में जो मैं जानता हूँ; बता सकता हूँ , वह स्पष्ट चढ़ा हुआ है। मैंने बताने में कोई बेईमानी नहीं की है। मैं तो ऐसे डिटेल्स भी बता रहा हूँ , जो ‘दीक्षा’ के बाद भी कोई गुरु नहीं बताता। इसके साथ ही उन क्रियाओं और सूत्रों को भी बता रहा हूँ, जिनके कारण ये सिद्धियाँ प्राप्त होती है। उन अंध आस्थाओं पर भी प्रकाश डाल रहा हूँ, जो अनेक सिद्धियों के सम्बन्ध में माना समझा जाता है।

जब भी हम पूजा – अर्चना- साधना से सम्बन्धित प्राचीन व्यवस्था देखेंगे, तो सर्वत्र मिलेगा कि सर्व प्रथम मानसिक पूजा सम्पन्न करना चाहिए। इसके बाद ही क्रियात्मक पूजा का फल मिलता है; पर हम समझते है कि फूल कैसे फेंके और नैवेद्य क्या चढ़ाए, इसका महत्त्व होता है।पूजा-यज्ञ-आदि के बड़े-बड़े अनुष्ठान जिए जाते है , जिसमें मानसिक लगन की जगह माचिस किधर है, घी थोडा कम है, अरे फलाने पंडित आये की नहीं , यह कैसे धोती कपड़ा रंगा हीब भाई?…यह सब होंगे लगता है । भला हंगामा करके आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति हो सकती है? पर लाखों खर्च करके लोग गर्व से कहते है कि उन्होंने तो फलाना अनुष्ठान भी करवाया था, कोई लाभ अन्हीं मिला। लाभ मिल भी नहीं सकता। ‘धर्मालय’ स्पष्ट कहता है कि चन्दन न हो, माला न हो, फूल न हो, हवन सामग्री न हो, आसन-वस्त्र भी न हो, बदन पर मलने के लिए भभूत भी न हो; केवल यह ज्ञान हो कि वह शक्ति यंत्र के किस रूप पर, किन गुणों में सिद्ध होती है और केवल भाव रूप का ज्ञान हो , तो भी सिद्धि प्राप्त हो सकती है। भोजन बनाने के लिए आग-बर्त्तन-अनाज की जरूरत होती है। वह आग कैसे उत्पन्न की गयी, ईंधन क्या था, बर्त्तन का आकार कैसा हो? मिट्टी का हो या ताम्बे का , चूल्हा कैसे बनाये उसको कैसे कितना ऊंचा बनाएं – ये सारी चीजे ऑप्शनल है। न भी हो, तो भी आग-बर्त्तन-अनाज से खाना बन सकता हैं, भले ही परिश्रम थोडा अधिक हो जाए। टमाटर का विधिवत बनाया सूप बहुत अच्छा लगता अहि, पर आग में पकाए टमाटर से बना सूप कुछ और ही होता है।

हम किसी भी साधना से सम्बन्धित छोटी-छोटी बातें भी बता रहे है। हम कुछ भी छुपा नहीं रहे; क्योंकि हम चाहते है कि हमारी प्राचीन विद्याओं से सामान्य स्त्री-पुरुष भी लाभ उठा सकें। इसे गोपनीय –रहस्य के धुंध से निकाल कर सबके लिए सुलभ बनाया जाए। इनके नाम पर चल रहे ठगी, पाखंड और सम्प्रदायवाद से तभी बचा जा सकता है, जब आप इसके वैज्ञानिक रूप से समझें। सिद्धियाँ न तो विधियों में हैं, न ही गुरु में । वह शक्ति आप में है। आप ही ब्रह्म या देवी है। आप अपनी भावना को एकाग्र करके उसमें डूबिये, उसका अभ्यास कीजिये। केवल दो-तीन महीना परिश्रम कीजिये। देखिये क्या होता है? कैसे वह भावना फलित होने लगता है।

पर लोग अपने आपको धोखा देते है। वे साधना इसलिए नहीं करते कि वह शक्ति प्राप्त हो जाए, साधनाकाल में ही इस भाव में डूबे होते है कि उससे क्या –क्या प्राप्त करके कैसे विशिष्ट बन जायेंगे। उस पर संदेह और अविश्वास भी होता है। पता नहीं होता भी है या नहीं?…. तो आपके लिए यह नहीं है।स्वयं भगवन शानाक्र भी गुरु बनाकर आ जाएँ, तो भी कुछ नहीं मिलेगा। क्योंकि ऊपर से आज्ञाकारी श्रद्धावान बने रहकर भी आप उसके बताये पर सनेध करेंगे और कन्फ्यूज्ड को कुछ भी प्राप्त नहीं होता; क्योंकि भाव ही हिलने लगता है। निशाना लगेगा कैसे?

आप थोडा सोचिये। हम चाहकर भी आपके गुरु नहीं सकते। पचास व्यक्ति कर्ण-पिशाचिनी की साधना करना चाहता है (सभी में यही हाल है) ; एक अमेरिका में अहि , एक गुजरात में है, एक पंजाब में है, एक राजस्थान में , एक नेपाल में अहि. एक लन्दन में है, मैं कैसे इन्हें दीक्षा देकर साधना करा सकता हूँ? मैं इनसे कह रहा हूँ कि हम सारा विधि-विधान और इसके सभी विवरण दे रहे है। यन्त्र दे रहे है, माला चाहिए तो वह भी उपलब्ध सिद्ध कराकर दे रहे अहि। हमारे निर्देश को पढने के बाद कोई शंका हो , तो आप ईमेल info@dharmalay.com पर उसे भेज क्र निवारण कर लें।

अन इससे अधिक क्या चाहिए? गुरु बनाना ही चाहते है, तो मेरे ऊर्जा रूप की कल्पना करके चिल्लू में पानी लीजिये और मानसिक कल्पना कीजिये कि वह ऊर्जा रूप आपके शरीर में व्याप्त हो गया है और वह आपको ज्योतिर्मय कर रहा है। जल सिर पर छिड़काव करिए। इन मंत्र के साथ – ॐ गुरु देवाय नमः । यह ज्योतिर्मय रूप आपके अनादर व्याप्त है , यह भाव सदा रखिये। हमारा – आपका सम्बन्ध बन जाएगा । यह ऊर्जा जगत अनेक रहस्यमय नियमों से बंधा है।

सारा भ्रम, अंध आस्था के रहस्यमय कुहरे के कारण है। ये सारे मानसिक वैज्ञानिक प्रयोग है और एक ही शक्ति के लिए जाने कितनी प्रयोग विधियाँ है। अनेक एक –दूसरे से विपरीत प्रकार की है। इन्हें विज्ञानं समझकर इसके सूत्रों – नियमों को समझकर प्रयोग करना हो, तो हमसे समपर्क करें। अंध आस्था पालकर हमारे यहाँ कुछ नहीं मिल सकता।

सम्पर्क करें – 08090147878

Email- info@dharmalay.com

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7 Comments on “गुरु क्यों चाहिए? गुरु किसे बनाएं? गुरु बनाने के नियम”

  1. सनातन धर्म का मंत्र कया है । और कैसे बना है । किन भगवानो का जिक्र है सनातन महामंत्र मैं । साहेब । आखिर कार पब्लिक के और महामंत्र मैं पडदा कयो रखते है । और पडदा कयो रखना चाहीऐ ???!

    1. मंत्र में अद्भुत शक्ति होती है और मनुष्यों में भाँती-भांति के जीव पाए जाते है कोई इसका दुरूपयोग न करे इसलिए मन्त्रों को गुप्त रखा जाता है , यह भी कहना गलत होगा कि मन्त्रों को गुप्त रखा जाता है | मंत्र को सिद्ध करने की विधियों एवं तकनीकियों को गुप्त रखा जाता है| अधिकासं मंत्र सार्जवनिक है , पुस्तकों में पाए जाते है केवल गुप्त तांत्रिक मंत्र गोपनीय होते है | सनातन धर्म का कोई एक मंत्र है यह मैंने आपके ही मुंह से सुना है इसलिए इसपर मैं विशेष कुछ कहने से असमर्थ हूँ |

  2. महाभारत और रामायण ।
    ऐ सही मैं होगऐ थे या फिर कल्पना के आधार पर लिखे गऐ विचार है ???? अगर विचार हीहै तो जो आगे रुशी ओने लिखे है जितने भी विचार ओ उन सभी के कल्पना मात्र ही है ???
    कृपया उत्तर दे ?

    1. praacheen shastra, chahe wo kisi bhi wishay ke ho, unke gyan aur jaroorat ki saamagri par hi dhyan dena chahiye. Ghatnaein ghati thi ya nahi, iska wishleshan bahut kathin hai. Pauranik ghatnaein roopak kathaein hain. Un kathaon mein gyan hai. Par katha gyan nahi hai. jitni bhi gyan ya kisi vigyan ki baat hoti hai, wah sarwapratham kalpana mein hi aati hai. Kalpna se hi uska moort roop awtarit hota hai. Isiliye ise parmaatma pradatt kaha jaata hai. Mahabharat apne mool roop mein nahi hai,. Iske mool roop ka naam ‘Jay’ tha. Phir wah ‘Bharat’ hua aur phir ‘Mahabharat’. Isi prakaar anya granth hain. Kisme kitna satya hai, yah gyan ki peepasa wala apne anuroop chhaant leta hai. Adhaasthawaan bhakti se hi laabhaanwit ho jaate hain.

  3. आपकी बात बिलकुल सत्य है । ऐ ग्रथ कल्पना हो या सत्यघटना । पर है तो ज्ञान वर्धक ही ।

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